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पूरब से ही फिर निकलेगा सूरज

Posted On: 12 Aug, 2013 Others में

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लोकतंत्र में बढ़ी सभी तबकों की हिस्सेदारी

आश नारायण रॉय

(निदेशक, इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस)


हम इस बहस में उलझे रह सकते हैं कि तुम्हारा भ्रष्टाचार बुरा है और हमारा अच्छा है लेकिन हमने अपने लोकतंत्र को रद्दी की टोकरी में नहीं डाला है। यद्यपि कि पश्चिमी देशों में भी लोकतंत्र से मोहभंग एक आम बात हो चुकी है।


गांधीजी ने कहा ‘आजादी देश को मिली है न कि कांग्र्रेस पार्टी को’। राष्ट्रपिता जानते थे कि जिस आदर्शवाद के लिए हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने लड़ाई लड़ी, जल्दी ही उसका क्षरण हो जाएगा। कांग्र्रेस पार्टी के बारे में उस समय कहा गया उनका कथन आज सभी राजनीतिक वर्ग पर लागू होता दिख रहा है। आजादी के शुरुआती दौर में हमारा नेतृत्व उच्च आदर्शवादी था लेकिन हमारे विकास का मॉडल लाखों लोगों को भूखा, अशिक्षित और बिना देखरेख के रखे हुआ था। भारत के पास उत्कृष्ट संसदीय लोकतंत्र था जहां उच्च स्तर की बहसें हुआ करती थीं लेकिन यह अत्यंत संभ्रांतवादी संस्था हुआ करती थी। केवल अमीर और उच्च जाति के लोग ही संसद, नौकरशाही और शैक्षिक संगठनों में पहुंच पाते थे। यहां तक कि कम्युनिस्ट पार्टी के नेता भी अभिजात्य वर्ग से ताल्लुक रखते थे। साल दर साल लोग शिक्षित होते गए और राष्ट्रीय भागीदारी में शामिल होने की मांग करने लगे और इससे उत्कृष्टता का द्वीप सामान्यतया के विशाल सागर में समा गया। यानी आम लोग भी खास तबकों के लिए जाने-जाने वाले पदों और संस्थानों में शोभायमान होने लगे। यह अपरिहार्य था, लोकतंत्र की जड़ों को गहरा करने और अधिक हितधारकों का सृजन इसकी जरूरत थी।


हम भले ही अपने तंत्र को दोष कोसें, उसकी खत्म होती सहजता और सरलता का रोना रोएं, फिर भी भारत दुनिया को अपनी महक से सुवासित करता है। आज वैश्विक मंचों पर भारत की मिसाल दी जाती है कि कैसे विविधता और बहुजातीय होने के बावजूद भी कोई देश अपने संस्थानों के बूते इस स्तर का विकास हासिल कर सकता है। भारतीय अनुभव की विशिष्टता यह है कि यह अपने लोकतंत्र को लगातार गढ़ और पुनर्गढ़ रही है। लोकतंत्र से नए लोग जुड़ भी रहे हैं। संस्थागत नवप्रर्वतन ही इसकी मुख्य वजह है।


भारतीय लोकतंत्र की ताकत उसके संस्थान हैं। स्वतंत्र न्यायपालिका, मुक्त प्रेस और जीवंत सिविल सोसायटी। अच्छी खबर यह है कि भारत ने नीचे से ऊपर उठना शुरू किया। भारत ने एक नया मॉडल पेश किया है। एक स्तर पर इसमें ‘विकास के लाभ’ से हटते हुए देखा जा सकता है और साथ ही अमीरों को दिए जाने वाले वित्तीय लाभ से गरीबों का भी भला किया। इसके अलावा यह समावेशी शासन की तरफ भी बढ़ रहा है। दूसरे स्तर पर भारत को पूंजीवाद से पहले लोकतंत्र हासिल है। अन्य देशों ने इसे दूसरे रास्ते से जाकर किया। भारत के आर्थिक उत्थान को नीचे से इसके लोगों द्वारा गति मिली। अर्थव्यवस्था में तेजी इसकी घरेलू मांग की वजह से है न कि निर्यात के चलते। सेवा क्षेत्र के चलते है न कि मैन्यफैक्चरिंग के बूते और खपत के चलते हैं न कि निवेश के चलते।


भ्रष्टाचार हमारे विकास मॉडल का नकारात्मक पहलू हो सकता है लेकिन उत्कृष्टता को छूते हुए भारतीय उद्यमियों की फौज हमारे विकास गाथा का सकारात्मक पहलू है। आज भारत के पास करीब 30 करोड़ मजबूत मध्य वर्ग है जो तेजी से अपने अधिकार, सड़क, बिजली और सुशासन की मांग कर रहा है।

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पूरब से ही फिर निकलेगा सूरज

उदय प्रकाश

(वरिष्ठ साहित्यकार)


गंभीर हालात व गहरी हताशा के बावजूद सुदूर टिमटिमाते जुगनू जल्द ही किसी बहुत बड़े आलोक के स्नोत बनेंगे। सोचिए, मुश्किल से पैंतीस-चालीस बरस पहले माना जा रहा था कि भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या, जिसने अपने विकास दर में चीन को भी पीछे छोड़ डाला था और किसी टाइम बम की तरह हर सेकंड, हर पल किसी भयावह विस्फोट के साथ अब तक की सारी योजनाओं, भविष्य की समूची गणनाओं का विनाश कर देने की आशंकाओं को जन्म दे रहा था और जिसके लिए 1975 के आपातकाल में ‘नसबंदी’ जैसे बर्बर कदम उठाए गये थे, अचानक लगने लगा कि यह जनसंख्या तो इस देश की वह मानव-पूंजी है, वह महान प्राकृतिक संसाधन, कि अगर उसे नये तकनीकी उद्यमों में निवेश के लायक बना दिया जाय, तो वह इस निहायत पिछड़ते देश को संसार के नक्शे में सबसे ऊपर, शिखर पर बहुत जल्द खड़ा कर सकती है। यानी वही जनसंख्या, जो बोझ थी, विनाशकारी थी, इक्कीसवीं सदी की बदली परिस्थतियों में, भारत में अचानक एक विराट प्राकृतिक ‘मानव पूंजी’ में बदल गई।


चीन ने यही अपने देश में किया और उसने अपने उत्पाद से पश्चिम की अब तक बनी बाजार की सरमायेदारी को इतिहास की सबसे बड़ी चुनौती दी। दुनिया के बड़े और सम्मानित अर्थशास्त्री, जिनमें अमत्र्य सेन भी सम्मिलित हैं, यही कहते हैं। सवा अरब से अधिक की भारत की जनसंख्या, जो पृथ्वी की समूची मानव-आबादी का छठा हिस्सा है और जो दुनिया के सबसे विशाल राजनीतिक लोकतंत्र को परिभाषित करता है और जो इस समय संसार का तीसरा या चौथा सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार बन चुका है, जिस पर तमाम देशों के कार्पोरेट्स की निगाहें टिकी हैं, वह ऐसी पूंजी है, जिसे कोई भी योग्य शासन-प्रशासन विकास के हित में अद्भुत ढंग से इस्तेमाल कर सकता है।


दुर्भाग्य से ऐसा अभी नहीं हो पा रहा है। भ्रष्टाचार और अनापशनाप, अवैध तरीकों से धन कमाने के लोभ ने इस विराट प्राकृतिक पूंजी को हाशिये पर डाल रखा है। कोयले, अल्युमीनियम, बिजली और लकड़ी से भी कम कीमत मानव संपदा की हो गई है। जनसंख्या के आंकड़े संकेत करते हैं कि बहुत जल्द, बस अबसे कुछ ही साल के बाद, भारत बूढ़े होते संसार का सबसे नौजवान देश होगा। दक्षिण भारत में जहां शिक्षा की दर और स्त्री-पुरुष अनुपात आधुनिकता के समस्त पैमानों पर पश्चिमी देशों के बराबर ही नहीं बल्कि कई मायनों में बेहतर सिद्ध होते है, वहां इसे संभव होते देखा जा सकता है। सिलिकान वैली से लेकर आणविक तकनीकी विकास और अंतरिक्ष तकनीकी प्रगति में वह दक्षिण की जन-पूंजी है, जिसे पश्चिम अपने आउटसोर्सिंग से लेकर सॉफ्टवेयर और संचार तकनीकी के लिए किसी ऑक्सीजन की तरह देख रहा है।


कहा जाता है कि किसी भी देश के विकास के दो मॉडल होते हैं। एक ऊध्र्व-मुखी, लंबवत, ऊपर की ओर किसी रॉकेट की तरह अंतरिक्ष की ओर जाता हुआ, जिसमें बस कुछ चंद जाति और वर्ग के लोग सवार हों और उनकी सफलताओं-आर्थिक विकास का औसत निकाल कर, उसे सारे देश का विकास घोषित कर दिया जाय। और दूसरा है देश के सारे मानव सतह पर फैला हुआ, विस्तृत क्षैतिज, दिशाव्यापी सर्व समावेशी विकास। इस ‘सार्वजनिक विकास’ के लिए सिर्फ  फूड-सिक्योरिटी बिल या मिड-डे मील या फिर दो रुपये किलो चावल की चैरिटी या दान-दक्षिणा से काम नहीं चलेगा। सभी बुनियादी जरूरतें बिना भेदभाव सबको उपलब्ध करवानी होंगी।


एक रोशनी आ रही है युवाओं की ओर से। दिल्ली के भयावह बस-बलात्कार कांड के विरोध में जिस तरह युवाओं की भीड़ उमड़ी और जिसे देख कर बहुतों को लगा कि जैसे यह मिस्र के ताहिर चौक का वह दृश्य दिल्ली में निर्मित हो रहा है, या फिर म्यांमार की वह विख्यात ‘अट्ठासी-पीढ़ी’ (88 जेनेरेशन), जिसने आठवें दशक में वहां के फौजी शासन को लोकतांत्रिक तरीके से हराकर आंग सान सू की को एक प्रतीक-नायिका बना दिया था। या फिर जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में गुजरात-बिहार से उभरी वह छात्र-नौजवान पीढ़ी, जिसने देश की राजनीति के हाशिये में फेंक दिए गए जेपी को ‘लोकनायक’ बना दिया था। अभी दुर्गा शक्ति नागपाल जैसे बिल्कुल युवा प्रशासनिक अधिकारी का मामला सबके सामने है, जो इसी युवा शक्ति के उभरने का संकेत है।


2025 अब बहुत दूर नहीं है, जब भारत बूढ़ी हो चुकी दुनिया का सबसे नौजवान देश होगा। और तब तक अगर 7-8 प्रतिशत की यह विकास दर जारी रही, और कुशासन पर लगाम लगी तो यह छियासठ साल का डगमगाता हुआ देश, पूरब से सूर्योदय को सचमुच संभव कर सकेगा।


मनमर्जी के मुताबिक रहने का अधिकार ही स्वतंत्रता है।

-इपिक्टीटस

(यूनानी दार्शनिक)


स्वतंत्रता धरती की आखिरी सबसे अच्छी आशा है

-अब्राहम लिंकन

(अमेरिकी राष्ट्रपति)


अत्याचारी कभी स्वेच्छा से स्वतंत्रता नहीं देता है, उत्पीड़तों द्वारा इसकी मांग की जानी चाहिए

-मार्टिन लूथर किंग जूनियर

(अमेरिकी अश्वेत नेता)


स्वतंत्रता बेहतर होने का एक अवसर है

-अल्बर्ट केमस

(फ्रांसीसी दार्शनिक)


† कोई भी मेरी अनुमति के बिना मुझे कष्ट नहीं पहुंचा सकता लोगों की व्यक्तिगत आजादी को छीनकर किसी समाज की बुनियाद रखना संभव नहीं है आजादी एक जन्म के समान है। जब तक हम पूर्ण स्वतंत्र नहीं हैं तब तक हम दास हैं

-महात्मा गांधी


स्वतंत्रता दी नहीं जाती है, इसे हासिल किया जाता है

-नेताजी सुभाषचंद्र बोस

(भारतीय स्वधीनता सेनानी)

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मेरे सपनों का भारत

आजादी के दीवानों ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारत के लिए जो सपना देखा, बुना उसकी एक बानगी बहुत साल पहले हमने भाग्य से एक सौदा किया था और अब उस प्रतिज्ञा को पूरी तौर पर तो नहीं लेकिन काफी हद तक पूरी करने का समय आ गया है। जब आधी रात के घंटे बजेंगे, जब सारी दुनिया सो रही होगी, तब भारत जीवन और स्वतंत्रता प्राप्त कर जागेगा। इतिहास में यदा-कदा ही ऐसा दुर्लभ क्षण आता है, जब हम पुराने को छोड़कर नए जीवन में प्रवेश करते हैं, जब एक युग का अंत होता है और लंबे समय से दबी-कुचली राष्ट्र की आत्मा आवाज पाती है। इसलिए इस निर्णायक क्षण पर हम भारत और उसके लोगों और उससे भी बढ़कर मानवता के हित के लिए सेवा-अर्पण करने की शपथ लें। अपने इतिहास की शुरुआत से ही भारत ने अपनी अनंत खोज आरंभ की। अनगिनत सदियां इसके प्रयासों और सफलताओं एवं असफलताओं की गाथा से भरी हैं। अच्छे या बुरे दौर में उसने इस खोज को आंखों से ओझल नहीं होने दिया और न ही उन आदर्शों से भटका जिनसे उसको ताकत मिलती है। आज हम दुर्भाग्य के एक दौर को खत्म करते हैं और भारत ने अपने आप को एक बार फिर खोजा है। आज जिस उपलब्धि का हम जश्न मना रहे हैं वह महज एक कदम है जो हमारी बाट जोह रही भावी बड़ी विजयों और उपलब्धियों के लिए अवसरों की शुरुआत है। क्या इस अवसर को ग्रहण करने और भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए हमारे पास पर्याप्त साहस और पर्याप्त बुद्धि है?


14-15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि को पंडित नेहरू का भाषण

हमारी मान्यता है कि अन्य व्यक्तियों के समान यह भारतीय जनों का भी अधिकार है कि वे अपनी मिट्टी के फलों का आनंद लेने और जीवन की अनिवार्यताएं पाने के लिए स्वतंत्रता का आनंद उठाएं ताकि उन्हें वृद्धि के पूरे अवसर मिल सकें। हमारी यह भी मान्यता है कि यदि सरकार किसी व्यक्ति को इनसे वंचित रखती है और दमन करती है तो लोगों को इसे परिवर्तित करने या हटाने का अधिकार है। भारत में ब्रिटिश शासन ने भारतीय जनों को न केवल स्वतंत्रता से वंचित रखा है बल्कि जन समूहों का शोषण किया है तथा पतन के साथ भारत पर शासन किया है । अब इसे समाप्त करने के साथ पूर्ण स्वराज प्राप्त करना चाहिए।


लाहौर कांग्रेस, 26 जनवरी, 1930 की घोषणा

जब मैं भारत के अलंकृत कुलीन तबके की तुलना करोड़ों गरीब लोगों से करता हूं तो उन समृद्ध जनों से यह कहना चाहता हूं कि जब तक आप इन आभूषणों को उतारकर देशवासियों का विश्वास अर्जित नहीं कर सकेंगे तब तक भारत की मुक्ति संभव नहीं है।


– महात्मा गांधी का चार फरवरी, 1916 को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में दिया गया भाषण

मेरा विश्वास है कि विश्व के इतिहास में स्वतंत्रता के लिए लोकतांत्रिक संघर्ष हमसे ज्यादा वास्तविक किसी का नहीं रहा है। मैंने फ्रांस क्रांति के बारे में पढ़ा है और पंडित नेहरू ने रूसी क्रांति के बारे में कुछ बताया है। लेकिन इनसे मेरी यही धारणा बनी है कि हिंसा के दम पर इन संघर्षों को लड़ा गया है इसलिए लोकतांत्रिक आदर्शों को फलीभूत नहीं कर सके। मैंने जिस लोकतंत्र की कल्पना की है उसकी स्थापना अहिंसा से होगी। उसमें सभी को समान स्वतंत्रता मिलेगी। हर व्यक्ति खुद का मालिक होगा। इस तरह के लोकतंत्र के संघर्ष के लिए मैं आपका आमंत्रित करता हूं।


भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा के समय महात्मा गांधी का भाषण

यह हमारे देश के लिए महान दिन है। भारत का सुदीर्घ और उतार-चढ़ाव भरा इतिहास रहा है, जिसके कुछ हिस्से में बादल हैं तो कुछ हिस्सा चमकीला और सूर्य की रोशनी से ओत-प्रोत है। लेकिन अपने इतिहास के सबसे गौरवशाली दौर में भी पूरा देश एक संविधान और एक शासन के अधीन नहीं रहा है… आज हम पहली बार पूरे देश में विस्तृत संविधान का अंगीकार कर रहे हैं और ऐसे राज्यों वाले संघीय गणराज्य का जन्म हो रहा है जिनकी अपनी संप्रभुता नहीं है एवं एक संघ और एक प्रशासन के वास्तविक सदस्य हैं।


26 जनवरी, 1950 को डॉ राजेंद्र प्रसाद के देश के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेने के बाद उनका दिया गया भाषण


11  अगस्त को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘अहा आजादी ! कठिन राह पर चलना है मीलों‘ पढ़ने के लिए क्लिक करें.

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