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बाढ़-सूखे का इलाज है पाल-ताल-झाल

Posted On: 26 Apr, 2011 Others में

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जागरण मुद्दा

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राजेन्द्र सिंह (मैगसेसे पुरस्कार प्राप्त जल विशेषज्ञ)

पाल: बरसात के पानी को रोकने के लिए किसी क्षेत्र के चारों ओर ऊंची दीवार उठाना। धीरे-धीरे यह पानी धरती के अंदर जाकर जल स्तर की वृद्धि में सहायक होता है.

ताल: वर्षा जल को रोकने के लिए परंपरागत तौर पर मौजूद ताल-तलैये.

झाल: ऊंचा स्थान। बाढ़ की स्थिति में यहां जाकर बचा जा सकता है.

बारिश से पहले पाल बांधने वाला समाज आज बांधों के भंवर में फंस गया है। इसीलिए बिहार का तैरने वाला यह समाज अब डूबने लगा। सूखे को झेलने वाला बाड़मेर (राजस्थान) बाढ़ की चपेट में डूब रहा है। अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में आने वाली इन नई प्राकृतिक आपदाओं का इलाज है। पहले सामुदायिक जल प्रबंधन के तहत लोग बारिश की बूंदों को सहेजने के लिए अपने घर की छत के जल को नीचे एक कुंड में साफ-सुथरे तरीके से एकत्र करते थे। बरसात का पानी खेत की फसल की जरुरत पूरी करने के के साथ अन्य क्षेत्रों के जल के साथ पास के तालाब में इकट्ठा होता था। बाद में इस जल से खेती और घरेलू जल की जरूरतें पूरी की जाती थी। रेगिस्तानी रेत में करीब पांच छह फुट नीचे चूने की परत बरसाती पानी को रोके रहती थी। बाद में इसका इस्तेमाल पेयजल व अन्य कामों के लिए किया जाता था। इस तरह सूखे की मार से ये पाल-ताल समाज को बचाकर रखते थे। अब हम इस तरह के सामुदायिक जल प्रबंधन को भूलकर राज्य या भारत सरकार के बनाए बांधों की ओर देखने लगे हैं। ये बांध जहां नदियों को बांधकर उनकी हत्या करते हैं, वहीं दूसरी तरफ बाढ़ लाकर कहर बरपाते हैं।

बंधे बनने से सामान्य वर्षों में जनता को सुकून मिलता है किन्तु बाढ़ ज्यादा आने पर पानी बंधे को तोड़ता हुआ एकाएक फैलता है। कभी-कभी इसका प्रकोप इतना भंयकर होता है कि यह चंद घंटों में ही 10-12 फुट बढ़ जाता है और जनजीवन एकाएक अस्त-व्यस्त हो जाता है। बंधे बनाने से सिल्ट फैलने के बजाय बंधों के बीच जमा हो जाती है। इससे बंधे के क्षेत्र का स्तर ऊंचा हो जाता है। इससे समतल इलाके में नदी का पाट बगल की भूमि से ऊंचा हो जाता है। जब बंधा टूटता है तो यह पानी वैसे ही तेजी से फैलता है जैसे मिट्टी का घड़ा टूटने पर। बंधों से पानी केनिकास के रास्ते अवरुद्ध हो जाते हैं। दो नदियों पर बनाए गए बांधों के बीच का 50 या 100 किलोमीटर क्षेत्र कटोरानुमा आकार धारण कर लेता है। बांध टूटने पर पानी इस कटोरे में भर जाता और इसका निकलना मुश्किल हो जाता है। इससे बाढ़ का प्रकोप शांत होने में काफी समय लग जाता है।

इन समस्याओं के चलते बंधे बनाने से परेशानियां बढ़ी हैं। जाहिर है कि बंधे बनाने की वर्तमान पद्धति कारगर नहीं है। सामुदायिक जल प्रबंधन नहीं होने के कारण पाल-ताल बनने बंद हो गए, जिससे अब हमें हर साल बाढ़ की विभीषिका को झेलना पड़ता है।

एक अन्य प्रमुख समस्या बंधों केबीच नदी के पाट केऊंचा हो जाने की है। इसका एक संभावित हल यह है कि बंधे के स्थान पर ताल-पाल-झाल बनाई जाए। बाढ़ आने पर नदी अक्सर नया रास्ता बना लेती है जैसा कि कोसी ने 160 किलोमीटर हट कर नया रास्ता बना लिया है। ऐसे में नदी को नए रास्ते पर बहने दिया जाना चाहिए और नदी के जल ग्रहण क्षेत्र में जहां पानी दौड़ता है, वहां उसे चलना सिखाने हेतु छोटे-छोटे एनीकट, चेकडैम बनाए जाए जिससे पानी धरती के पेट को भरके और नदियों को समय-समय बहने वाली बना दे।

सरकार को चाहिए कि अंधाधुंध बंधे बनाने की वर्तमान नीति पर पुनर्विचार करे। तीन विकल्पों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाना चाहिए। पहले विकल्प में नदियों के पर्यावरणीय प्रवाह को बरकरार रखा जाना चाहिए। दूसरा विकल्प ऊंचे और स्थायी बंधे बनाने की वर्तमान नीति का है। तीसरा विकल्प प्रकृतिप्रस्त बाढ़ के साथ जीने के लिए लोगों को सुविधा मुहैया कराने का है। इसमें फ्लड रूफिंग के लिए ऊंचे सुरक्षित स्थलों का निर्माण, सुरक्षित संचार एवं पीने के पानी की इत्यादि की व्यवस्था शामिल है, जिससे लोग बाढ़ के साथ जीवित रह सके। धरती के ऊपर बड़े बांधों से अति गतिशील बाढ़ का प्रकोप बढ़ने लगा है। इसे रोकने के लिए जल के अविरल प्रवाह को बनाए रखना होगा। इस काम से ही जल के सभी भंडारों को भरा रखा जा सकता है। चूंकि बाढ़ और सूखा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, इसलिए इन दोनों के समाधान जल का सामुदायिक जल प्रबंधन ताल-पाल और झाल से ही संभव है।

कैद में हैं नदियां

15 अगस्त 1947 को मिली आजादी में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जिस आजाद भारत की परिकल्पना की थी, उसमें प्रकृति को कैद करने की ख्वाहिश और छवि शामिल नहीं थी। राष्ट्रपिता के सपने में एक ऐसे भारत की परिकल्पना थी, जो देश की प्रकृति और उसके साथ जीने वाले ग्रामीण समाज को उसका स्वराज और सुराज दोनों दिलायेगा। एक ऐसा भारत… जहां समाज प्रकृति को अपनी जरूरत की पूर्ति करने वाले उपहार के तौर पर देखेगा, न कि लालच की पूर्ति करने वाले खजाने के तौर पर। लेकिन पिछले 64 वर्ष के आजाद भारत के सफरनामे में ऐसा नहीं हुआ।

जिस देश में नदियों को कैद करने के लिए दिन-प्रतिदिन एक नई कोशिश चल रही हो। बिजली, पानी और विकास के नाम पर बंध-तटबंध और मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे एवं बस्तियां बसाना नदियों को कैद करने का ही काम है। क्या उस देश की आजादी टिकी रह सकती है? नहीं! ऐसे में 15 अगस्त के दिन स्वतंत्रता दिवस मनाना एक रस्म अदायगी से ज्यादा कुछ नही है।

यदि भारत की आजादी को टिकाऊ और गौरवशाली बनाकर रखना है, तो हमें अपनी नदियों के प्रवाह को शुद्ध-सदानीरा, नैसर्गिक और आजाद बनाना होगा। नदियों की आजादी का रास्ता नदी तट पर फैली उसकी बाजुओं की हरियाली में छिपा है। भारत की आजादी, बाघ और जानवरों की आजादी रखने वाले जंगल बचाने और नदियों के स्वच्छंद बहाव से ही कायम रहेगी। नदियों के किनारे सघन और स्थानीय जैव विविधता का सम्मान करने वाली हरित पट्टियों के विकास से ही संभव है। लेकिन यह तभी हो सकता है जब नदियों की भूमि अतिक्रमण और प्रदूषण से मुक्त हो। नदी भूमि का हस्तानान्तरण एवं रूपांतरण रुके।

उत्तराखंड में भागीरथी पर बांध, दिल्ली में यमुना में खेलगांव-मेट्रो आदि निर्माण, उत्तर प्रदेश में गंगा एक्सप्रेस वे नाम का तटबंध, बिहार और बंगाल में क्रमश: पहले से बंधी कोसी और हुगली… सब नदियों को कैद करने का ही काम है। नदी भूमि की मुक्ति के लिए पिछले कई वर्षों से संघर्ष जारी है।

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साभार : दैनिक जागरण 24 अप्रैल 2011 (रविवार)
नोट – मुद्दा से संबद्ध आलेख दैनिक जागरण के सभी संस्करणों में हर रविवार को प्रकाशित किए जाते हैं.

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