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समाधान की समिति या टालने का हथियार

Posted On: 29 Aug, 2011 Others में

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जागरण मुद्दा

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जन लोकपाल विधेयक को लेकर टीम अन्ना और सरकार के बीच गतिरोध टूटने के आसार भले ही दिख रहे हों, लेकिन लंबे समय से जारी इस रस्साकसी के बीच मिनी संसद नाम से चर्चित संसद की स्थायी समिति अचानक महत्वपूर्ण भूमिका में आ चुकी है। इससे पहले भी कानून बनाए जाते रहे हैं लेकिन इस समिति की तब इतनी महत्ता सामने नहीं आई। कई बार बिल को बिना स्थायी समिति में भेजे ही पारित करा लिया जाता है।


कानून और संविधान के कई विशेषज्ञों का मानना है कि संसद की इस स्थायी समिति को कभी-कभी अपनी जरूरत के मुताबिक सरकार हथियार के रूप में भी इस्तेमाल करती है। कई महत्वपूर्ण विधेयकों समेत ज्यादातर विधेयक इस समिति को भेजे ही नहीं जाते हैं। जिस विधेयक को सरकार को लटकाना होता है उसे ही यहां भेजा जाता है। हालांकि ऐसे भी दृष्टांतों की कमी नहीं है जब स्थायी समिति में जाकर विधेयक को धार मिली है।


सांसदों के वेतन-भत्ते संबंधी बिल और ऑफिस ऑफ प्रॉफिट जैसे कई महत्वपूर्ण बिल बिना यहां आए ही राष्ट्रपति के पास पहुंचकर कानून बन गए। हमारे माननीयों ने ऐसे कई बिलों को आनन-फानन में पारित करा लिया। क्या इन बिलों पर जनता, बुद्धिजीवियों व विशेषज्ञों की राय लेने के लिए इस समिति के पास भेजा जाना आवश्यक नहीं था। ऐसे में किसी कानून के बनाए जाने को लेकर स्थायी समिति को भेजे जाने की अनिवार्यता बड़ा मुद्दा बन जाती है।


संसदीय कार्य के भार को कम करने के लिए मिनी संसद नाम से बनाई गई संसदीय समितियों का गठन 1993 में किया गया। वर्तमान में विभिन्न मंत्रालयों और विभागों से संबंधित 24 ऐसी समितियां अस्तित्व में हैं। इन समितियों का मुख्य काम इनके पास भेजे गए विधेयकों की जांच-पड़ताल करना है। इन समितियों में सभी दलों के सदस्यों का प्रतिनिधित्व होने के चलते ये ‘लघु संसद’ नाम से भी मशहूर हैं।


अपने पास आए विधेयकों की जांच के तहत यह समिति जनता से सुझाव मांगती है। इसके अलावा संबंधित विधेयक के विषय में यह विशेषज्ञों और हितधारकों की भी राय ले सकती है। जांच पड़ताल के आधार पर यह समिति इस विधेयक के विभिन्न प्रावधानों पर अपनी सिफारिशों के साथ एक रिपोर्ट तैयार करती है। जिसे बाद में सदन के पटल पर रखा जाता है।


जन लोकपाल बिल को लेकर सरकार और सिविल सोसाइटी के बीच जारी रस्साकसी में स्थायी समिति यकायक चर्चा का विषय बन गई। जहां टीम अन्ना के सदस्य इस बिल को बिना स्थायी समिति में भेजे पारित करवाने की बात कह रहे हैं वहीं सरकार इस प्रक्रिया को संसदीय परंपरा का महत्वपूर्ण अंग बता रही है।


कानून के कई जानकार मानते हैं कि सरकार जिस बिल को लटकाना चाहती है, उसे स्थायी समिति के पास भेज देती है। इनके अनुसार कभी-कभी संसद में पेश विधेयक बिना चर्चा के वहीं पारित हो जाते हैं। हालांकि स्थायी समिति के पास लंबित विधेयकों के आंकड़ें भी इन आरोपों की पुष्टि करते हैं।


संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार अधिकांश बिलों को संसद की स्थायी समिति के पास भेजे जाने का प्रावधान है लेकिन किसी बिल को पारित कराने से पहले यह आवश्यक जरूरत नहीं है। इसके अलावा इस समिति की सिफारिशें भी बाध्यकारी नहीं हैं। संसद के दोनों सदनों के सदस्य की भूमिका ही अहम होती है। ये लोग समिति की सिफारिशों में संशोधन करने में सक्षम होते हैं। इन संशोधनों पर वोटिंग द्वारा बिल को अंतिम रूप दिया जा सकता है। ऐसे में किसी बिल को इस समिति में भेजे जाने की अनिवार्यता वाली सरकार की दलील गैरतार्किक सी लगने लगती है।


स्थायी समिति के पास कई विधेयक काफी समय से लंबित हैं। समिति द्वारा रिपोर्ट देने की समयसीमा तय किए जाने को लेकर भी कई बार मसला उठा है। लोकसभा अध्यक्ष के अपने कार्यकाल में सोमनाथ चटर्जी ने भी इस मसले को प्रमुखता से उठाया था। इस समिति के समक्ष लंबित कई अहम बिलों पर पूर्व लोकसभा अध्यक्ष ने इसके द्वारा दी जाने वाली रिपोर्ट की समयसीमा तीन महीने निर्धारित किए जाने पर विचार किया था। इस समिति द्वारा किसी बिल की रिपोर्ट पेश किए जाने की कोई निश्चित सीमा अवधि नहीं है।


स्थायी समिति के चेयरमैन की यह जिम्मेदारी होती है कि वह उचित समय के भीतर रिपोर्ट पेश करे। सोमनाथ चटर्जी ने अपने इस प्रस्ताव के संबंध में एक दिशानिर्देश जारी करने का विचार भी किया था जिसके तहत सभी स्थायी समितियों द्वारा तीन माह के भीतर रिपोर्ट पेश करने में असफल होने पर लोकसभा अध्यक्ष संबंधित विधेयक को स्थायी समिति से वापस लेकर सदन में विचार के लिए रखने में सक्षम होता।- [अरविंद चतुर्वेदी]


संसद में पेश विधेयक कभी-कभी बिना चर्चा के वहीं पारित हो जाते हैं। विधेयक को स्थायी समिति के पास भेजे जाने से कोई मकसद पूरा नहीं होने वाला है। विधेयक को इस समिति के पास केवल इसलिए भेजा जाता है, जिससे उसे लटकाया जा सके।’ -प्रशांत भूषण


आंदोलनकारी यकीन क्यों नहीं करते और स्थायी समिति को एक मौका क्यों नहीं देते। क्या पता यह समिति कोई चमत्कार करने में सफल रहे। और लोकपाल बिल को लेकर कोई चौंकाने वाला नतीजा लाने में कामयाब हो जाए।’ -अभिषेक मनु सिंघवी (अध्यक्ष-संसद की कार्मिक, लोक शिकायत, कानून एवं न्याय मामलों की संसदीय समिति)


28 अगस्त को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “संसदीय समितियां”  पढ़ने के लिए क्लिक करें.

28 अगस्त को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “परदेस में ओम्बुड्समैन”  पढ़ने के लिए क्लिक करें.

28 अगस्त को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “महत्वपूर्ण हैं संसद की स्थायी समितियां!”  पढ़ने के लिए क्लिक करें.


साभार : दैनिक जागरण 28 अगस्त  2011 (रविवार)

नोट – मुद्दा से संबद्ध आलेख दैनिक जागरण के सभी संस्करणों में हर रविवार को प्रकाशित किए जाते हैं.

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