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राजनीति में बढ़ता धनबल

Posted On: 9 Apr, 2012 Others में

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जागरण मुद्दा

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राजनीति यानी राज की नीति। जनता की भलाई के लिए सत्ता द्वारा बनाई जाने वाली नीति। आधुनिक लोकतंत्र में इन नीतियों के बनाने वाले होते हैं हमारे राजनेता। जनता द्वारा चयन किए जाने के बाद ये लोग सत्ता में पहुंचते हैं। फिर ये राजनीति यानी जन कल्याणकारी नीतियां बनाकर और जनता के हितों की रक्षा कर राजनेता बनते हैं। शुरुआती दौर में समाज सेवा रही राजनीति कालांतर में एक पेशे का रूप अख्तियार करती जा रही है। राजनीति निहित तमाम स्वार्थों के चलते लोग साम-दाम-दंड भेद के बूते राजनीति में आना चाहते हैं। जन सेवा की भावना अब गौण हो चली है। सियासत में बढ़ती तिजारत की प्रवृत्ति से यहां ‘पैसे का खेल’ एक लाइलाज बीमारी बनता जा रहा है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय संस्था ग्लोबल इंटीग्रिटी द्वारा जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि राजनीति में धनबल को रोकने में हम फिसड्डी साबित हुए हैं। इसका ताजा उदाहरण झारखंड राज्यसभा चुनाव है। यहां चुनाव के दौरान खुलेआम धनबल का इस्तेमाल देखा गया। चुनाव आयोग ने सख्त कदम उठाते हुए भले ही राज्यसभा चुनाव पर रोक लगा दी हो और हाई कोर्ट ने सीबीआइ जांच का आदेश दे दिया हो, लेकिन इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता है कि धन के बगैर इस राजनीति में सफलता अपवाद ही है। राजनीति में बढ़ते धनबल की प्रवृत्ति आज हम सबके लिए बड़ा मुद्दा है।

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-जगदीप एस छोकर (संस्थापक सदस्य, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स)
-जगदीप एस छोकर (संस्थापक सदस्य, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स)

राजनीति में बढ़ता धनबल

हालिया झारखंड राज्यसभा चुनाव मतदान के कुछ घंटे पहले रांची शहर के बाहरी इलाके में एक कार में 2.15 करोड़ रुपये का मिलना एक बार फिर हमारे लोकतंत्र की राजनीतिक कार्यप्रणाली में पैसे के खेल की भूमिका को बताता है। इस ताजातरीन घटनाक्रम का संज्ञान लेते हुए झारखंड हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग को विस्तृत जांच करने के आदेश दिए हैं। यद्यपि इससे पहले ही चुनाव आयोग ने उस चुनाव को रद कर दिया।


अब यह रहस्य किसी से छुपा नहीं है कि हमारी राजनीतिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली में धनबल की बड़ी भूमिका है लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह खुलकर सामने आ गया है। सुप्रीम कोर्ट में झारखंड मुक्ति मोर्चा केस, संसद में प्रश्न पूछने के बदले धन का मुद्दा और लोकसभा में रुपये की गड्डियां लहराने जैसी घटनाएं राष्ट्रीय शर्म का विषय बनी हैं। हालिया वर्षों में राजनेताओं ने भी इसको स्वीकारना शुरू कर दिया है और यहां तक कि तर्कसंगत बनाने का प्रयास भी किया है।


इससे भी ज्यादा हैरतअंगेज तथ्य लोकसभा चुनाव 2009 में 6,753 प्रत्याशियों के हलफनामों की पड़ताल से उजागर हुए हैं, जिनका विश्लेषण एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स और नेशनल इलेक्शन वॉच ने किया है। इतने सारे प्रत्याशियों में से केवल चार ने यह घोषणा करते हुए बताया कि उन्होंने निर्धारित तय सीमा से ज्यादा खर्च किया। केवल 30 लोगों ने यह घोषित किया कि उन्होंने तय सीमा का करीब 90-95 प्रतिशत खर्च किया। जबकि कुल 6,753 में से 6,719 यानी 99.5 प्रतिशत ने घोषणा करते हुए कहा कि उन्होंने केवल तय सीमा का 40-45 प्रतिशत खर्च किया है। 2009 में खर्च की तय सीमा 16 लाख थी। जबकि चुनाव से पहले और बाद में  तय सीमा को कम मानते हुए लगभग एक सुर में जोर-शोर से यह मांग की जा रही थी कि इस सीमा को बढ़ा दिया जाना चाहिए।


चुनाव में खर्चे की तय सीमा को बढ़ाए जाने की इस मांग के बीच 99.5 प्रतिशत प्रत्याशियों ने घोषणा करते हुए कहा कि वह तय सीमा का आधा ही खर्च कर सके। इस आश्चर्यजनक तथ्य से ही सहज ही विरोधाभास का अंदाजा लगाया जा सकता है। अब चुनावी खर्चे की वह तय सीमा बढ़ाकर 25 लाख रुपये कर दी गई है। इसके बावजूद अधिकांश राजनीतिक दलों के नेता टीवी बहसों में कहते दिखते हैं कि यह सीमा भी कम है और इसको और अधिक बढ़ाए जाने की जरूरत है।


चुनावी खर्चे के मामले में निर्वाचन आयोग एक सलाहकारी निकाय है। इस संबंध में निर्णय अंतिम तौर पर सरकार ही लेती है। ऐसे में प्रत्याशियों के हलफनामे को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि चुनावी खर्चे की तय सीमा को बढ़ाने की बजाए घटा दिया जाना चाहिए।


राजनीतिक प्रक्रिया में धनबल का यह एक पहलू है। एक बार जब एक प्रत्याशी बड़ी मात्रा में अघोषित पैसा चुनाव में लगाता है तो वह जीतने के लिए इसको ‘निवेश’ की तरह इस्तेमाल करता है। इसी का नतीजा होता है कि चुनाव जीतने के बाद सार्वजनिक धन का बड़े पैमाने पर गबन किया जाता है। ऐसे मामले कभी-कभी कुछ महीनों में सामने आते हैं तो कुछ वर्षों बाद उजागर होते हैं।


दरअसल यह प्रक्रिया चुनाव शुरू होने से पहले ही शुरू हो जाती है। राजनीतिक दलों द्वारा ‘टिकटों के बंटवारे’ की प्रक्रिया से ही यह शुरू होती है। हर राजनीतिक दल द्वारा टिकटों का बंटवारा एक केंद्रीकृत बॉडी द्वारा किया जाता है जिसको ‘हाई कमान’ कहा जाता है। यह बॉडी पार्टी के सदस्यों से लेकर निर्वाचक तक किसी के प्रति जवाबदेह नहीं होती है। भारतीय राजनीति की यह सबसे बुनियादी समस्या है।


यह एक विचित्र स्थिति है कि हम लोग अपने को लोकतांत्रिक देश कहते हैं जोकि ऐसे राजनीतिक दलों द्वारा चलाया जा रहा है जिनकी आंतरिक कार्यप्रणाली आनुवांशिक और पूर्ण रूप से अलोकतांत्रिक ढंग से काम कर रही है। राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली में लोकतंत्र में कमी और एकाधिकारवादी प्रवृत्ति के कारण ही राजनीतिक प्रक्रिया में धनबल का प्रभाव बढ़ता जा रहा है।


राजनीतिक दलों की आंतरिक कार्यप्रणाली में लोकतंत्र और वित्तीय मामलों में पारदर्शिता होनी चाहिए। वित्तीय मामलों की अनिवार्य रूप से ऑडिट नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) द्वारा की जानी चाहिए। यही एकमात्र रास्ता है जिससे देश की राजनीतिक प्रणाली में धनबल के बढ़ते प्रभाव पर अंकुश लगाया जा सकेगा।


ज्यादा धन, चुनाव जीतने की अधिक संभावना


आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि जिस उम्मीदवार के पास ज्यादा संपत्ति होती है उसके चुनाव जीतने की अधिक संभावना होती है। पांच करोड़ या उससे अधिक की संपत्ति घोषित करने वाले एक तिहाई उम्मीदवारों को विजय मिली है। दूसरी तरफ 10 लाख से कम संपत्ति घोषित करने वालों में से एक फीसदी से भी कम उम्मीदवारों को ही सफलता मिली है। इस तरह ऐसा लगता है कि धनबल चुनावी नतीजों को अत्यधिक प्रभावित करता है


संपत्ति उम्मीदवारों की संख्या सांसदों की संख्या विजयी सांसदों का प्रतिशत
अत्यधिक (पांच करोड़ या अधिक) 343 112 32.65
अधिक (50 लाख से पांच करोड़) 1592 294 18.47

मध्यम (10 लाख से 50 लाख) 1911 120 6.28

कम (10 लाख से कम) 3964 17 0.34

संपत्तियों के हिसाब से 2004 और 2009 के लोकसभा चुनाव की तुलना

2009 लोकसभा के चुनाव में संसद पहुंचे 543 सांसदों में से 315 करोड़पति हैं। यह पिछले लोकसभा चुनाव जीतने वाले करोड़पति उम्मीदवारों की संख्या में 102 प्रतिशत वृद्धि के बराबर है। 2004 के लोकसभा चुनाव में करोड़पति सांसदों की संख्या 156 थी।


विवरण
लोकसभा में लोकसभा में
2004 2009

वृद्धि प्रतिशत

करोड़पति सांसदों की संख्या
156.00 315.00

159.00 102

सांसदों की औसत संपत्ति (लाख में)
186.30 456.62

270.32 145

चुनाव क्षेत्र के सबसे धनी उम्मीदवार

इस तालिका में निर्वाचन क्षेत्र में संपत्ति के आधार पर उम्मीदवार की पोजीशन और उसके जीतने की संभावना को दिखाया गया है। उदाहरण के लिए 184 चुनाव क्षेत्रों (कुल लोकसभा चुनाव क्षेत्र का 34 प्रतिशत) में जिस उम्मीदवार ने सर्वाधिक संपत्ति की घोषणा की थी, वही विजेता बना।

संपत्ति के आधार पर चुनाव क्षेत्र में पोजीशन कुल सांसद

विजयी सांसदों का प्रतिशत
1 184 34
2 131 24
3 108 20
4 43 8
5 29 5
6 19 3
7 9 2
8 6 1
9 8 1
10 1 0
11 3 1
12 1 0
24 1 0
कुल 543 100

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