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स्वस्थ शिक्षा और रिसर्च से मिलेगी निजात

Posted On: 11 Jul, 2011 Others में

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जागरण मुद्दा

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drugदेश में पहली बार हुए राष्ट्रमंडल खेलों और उसके बाद चीन के ग्वांग्झू एशियाई खेलों में मिली स्वर्णिम चमक को डोपिंग के दंश ने स्याह कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय खेल में भारत के बढ़ रहे रुतबे पर भी अब प्रश्न चिन्ह लग गया है। सोचने पर विवश होना पड़ रहा है कि क्या यह स्वर्णिम सफलताएं प्रतिभा और दमखम की देन नहींथीं, बल्कि उनके लिए फूड सप्लीमेंट का सहारा लिया गया। हमने पिछले दो वर्र्षों में खेलों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता का नया मुकाम हासिल किया है। अब अगर हमें यह सफलता बरकरार रखनी है तो जल्द से जल्द इस डोपिंग के दंश से अपने खिलाड़ियों को बचाना होगा। इससे बचाने के लिए खिलाड़ियों को स्वस्थ और सही शिक्षा देने के साथ एसोसिएशन और सरकार को भी अपनी रिसर्च तकनीक एडवांस करनी होगी।


क्यों फंसते हैं खिलाड़ी


प्रदर्शन में सुधार और जल्द रिकवरी के लिए फूड सप्लीमेंट आजकल अंतरराष्ट्रीय खेल परिदृश्य में अत्यंत आवश्यक है। सोवियत संघ के विभाजित होने के पूर्व ओलंपिक खेलों में रूस का जलवा रहता था। इसकी वजह यही फूड सप्लीमेंट थे। सही मायने में इन कृतिम साधनों का जनक रूस ही है। धीरे-धीरे यह यूरोप से होते हुए अमेरिका और फिर वहां से एशिया पहुंचा।


इस बारे में अंतरराष्ट्रीय कुश्ती महासंघ द्वारा सर्वश्रेष्ठ प्रशिक्षक के पुरस्कार के नवाजे गए भारत के फ्रीस्टाइल कोच यशवीर सिंह ने बताया कि अब फूड सप्लीमेंट के बगैर पावर गेम (कुश्ती, भारोत्तोलन, मुक्केबाजी और एथलेटिक्स) में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतना तो दूर प्रतिस्पर्धा भी बेमानी है। ओलंपिक पदक विजेता सुशील कुमार के मुख्य प्रशिक्षक यशवीर के अनुसार फूड सप्लीमेंट जरूरी तो हैं लेकिन हमें इसके लिए समुचित व्यवस्था बनानी होगी। हमारी एसोसियेशन, कोच और डाक्टरों को वाडा और नाडा की प्रतिबंधित दवाओं की लिस्ट पर हमेशा ध्यान रखना होगा। वाडा हर माह नेट पर प्रतिबंधित फूड सप्लीमेंट की अपडेट सूची डालती रहती है। उन्होंने उदाहरण दिया राष्ट्रमंडल खेलों के पहले  पहलवान राजीव तोमर और मौसम खत्री जिस प्रतिबंधित दवा के सेवन के मामले में फंसे थे वह खाने वाले तेल में भी पाई जाती है। कई बार तो हमें खुद भी नहींपता होता कि किस चीज में कौन सी प्रतिबंधित दवा मिली रहती है। इसलिए कोच और डाक्टर के साथ-साथ खिलाड़ियों को भी हमेशा सतर्क रहना चाहिए। उन्हें इस बात एहसास हर वक्त होना चाहिए कि उनकी एक गलती से उनका सारा कैरियर चौपट हो सकता है।


कैसे मिलेगा का छुटकारा


हर समस्या का समाधान होता है। उसी तरह डोपिंग के दंश से भी छुटकारा मिल सकता है। भारतीय भारोत्तोलन संघ के महासचिव सहदेव यादव की माने तो अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर  प्राकृतिक चीजें जैसे दूध, घी और बदाम खाकर पदक नहींजीते जा सकते। इसलिए जिनसे मुकाबला करना है उन्हींकी तरह हमारे लिए भी फूड सप्लीमेंट अनिवार्य है।


जरूरत सिर्फ इस बात की है कि खिलाड़ियों, एसोसिएशन, प्रशिक्षकों और डाक्टरों को एकजुट होकर काम करना होगा। सबसे जरूरी है कि खिलाड़ियों को समुचित शिक्षा दी जाए और रिसर्च प्रक्रिया को और एडवांस बनाया जाए। हम रिसर्च के मामले में बहुत पीछे हैं। खेल की दुनिया के सभी शीर्ष देश रिसर्च पर आधारित फूड सप्लीमेंट खिलाड़ियों को देते हैं। कहने का अर्थ यह है कि प्रत्येक खिलाड़ी की शरीरिक क्षमता के अनुसार फूड सप्लीमेंट मुहैया कराएं जाएं। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि सरकार फूड सप्लीमेंट के लिए निश्चित धनराशि 250 रोज से बढ़ाकर 500 रुपए करे। यही वजह है कि खिलाड़ियों को पैसा खत्म होने पर अपने पैसे से बाहर से यह सप्लीमेंट खरीदने पड़ते हैं। जिसकी वजह से उन्हें, एसोसियेशन और देश को कलंकित होना पड़ता है।



10 जुलाई को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “क्या है डोप” पढ़ने के लिए क्लिक करें.

10 जुलाई को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “अपनी टोपी उसके सिर” पढ़ने के लिए क्लिक करें.

10 जुलाई को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “शक की सोच विदेशी कोच” पढ़ने के लिए क्लिक करें.

10 जुलाई को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “डोपिंग का दंश” पढ़ने के लिए क्लिक करें.


साभार : दैनिक जागरण 10 जुलाई 2011 (रविवार)



नोट – मुद्दा से संबद्ध आलेख दैनिक जागरण के सभी संस्करणों में हर रविवार को प्रकाशित किए जाते हैं.


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