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रोटी के लिए खरी-खोटी

Posted On: 21 Oct, 2013 Others में

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Dainik Jagran Mudda

रोटी के लिए खरी-खोटी

साईं इतना दीजिए जामे कुटुम्ब समाय, मैं भी भूखा न रहूं साधु न भूखा जाय

-कबीर दास (भारतीय विचारक)

हम जानते हैं कि दुनिया में लंबे समय तक शांति नहीं रह सकती है क्योंकि एक तिहाई अघाए लोग हैं तो दो तिहाई भूखे

-जिमी कार्टर (पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति)


एक भूखा व्यक्ति सही या गलत नहीं देख सकता है। उसे सिर्फ भोजन दिखाई देता है

– पर्ल एस बक (विश्व प्रसिद्ध लेखिका)


आज के बाद हम सिर्फ यही चाहेंगे कि लोगों को पेट भरने का अधिकार मिले

-पाब्लो नेरुदा (नोबल विजेता चिली के साहित्यकार)


भगवान ने जो कुछ तुम्हें दिया है उसमें से जरूरत भर तुम ले लो। बाकी हिस्से की औरों को जरूरत है

– संत अगस्टाइन


यदि हम अंतरिक्ष पर विजय प्राप्त कर सकते हैं तो हम बच्चों में भुखमरी की समस्या को भी जीत सकते हैं

-बज एल्ड्रिन (चंद्रमा पर उतरने वाले दूसरे इंसान)


किसी को खाना देने पर लोग मुझे संत कहते हैं, लेकिन जब मैं भोजन न होने का कारण पूछता हूं तो वे मुझे वामपंथी कहते हैं

– आर्कबिशप डोम हेल्डर कामारा

…………


आमूलचूल बदलाव की जरूरत

देविंदर शर्मा

(कृषि व खाद्य मामलों के विशेषज्ञ)

हमें भुखमरी के संरचनात्मक कारणों को खत्म करना होगा। इनमें से अधिकांश कृषि और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन से जुड़े हुए हैं। अजीब विडंबना है। भुखमरी सूचकांक पर 63वें स्थान पर मौजूद देश को भूखे पेट विकासशील अर्थव्यवस्था वाली उपाधि से नवाजा जा सकता है।


दरअसल सदिच्छा के साथ नर्क का रास्ता प्रशस्त किया गया है। भुखमरी केवल भोजन की अनुपलब्धता का मसला नहीं है, यह हमारी नीतियों (सदिच्छा) की भी परिणति है। हालांकि जरूरतमंदों को खाद्यान्न मुहैया कराने में असफल रहने का हम बहुत संताप कर चुके हैं। मैं इसे इस समस्या की मूल वजह नहीं मानता हूं। जिस खाद्य कूपन प्रणाली से अमेरिका जैसा देश अपने भूखों की क्षुधा शांत करने में असफल रहा है। उसी प्रणाली को अपनाकर भारत तंत्र को दुरुस्त करने और भ्रष्टाचार के खात्मे का सपना संजोए हुए है। अब यह समझना जरूरी है कि हर महीने लोगों को एक निश्चित मात्रा में अनाज मुहैया कराकर भुखमरी को नहीं दूर किया जा सकता है।


भुखमरी को दूर करने को लेकर हमारे दृष्टिकोण में कुछ भयानक विसंगति है। खाद्य एवं कृषि मंत्रालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, ग्र्रामीण विकास मंत्रालय और बाल एवं महिला कल्याण मंत्रालयों द्वारा 22 राष्ट्रीय स्कीमें और कार्यक्रम इसके उन्मूलन को लेकर चलाए जा रहे हैं, फिर भी स्थिति संभलने की बजाय बढ़ रही है। पहले से ही चल रहे ऐसे प्रभावी कार्यक्रमों और हर साल उनके मद में किए जाने खर्चों में बढ़ोतरी के बावजूद गरीब भुखमरी की चपेट में हैं। इसलिए कुछ और ऐसी ही योजनाओं की शुरुआत निश्चित रूप से भूखे लोगों का भला करने वाली नहीं साबित हो सकती है।


भुखमरी के खात्मे के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली द्वारा मुहैया कराए जाने वाले राशन से कुछ ज्यादा किए जाने की जरूरत है। हमें इसके संरचनात्मक कारणों को खत्म करना होगा जो इसका चेहरा और बिगाड़ रहे हैं। इनमें से अधिकांश कृषि और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन से जुड़े हुए हैं। हमें अपने बुजुर्गों की बातों को नहीं भूलना चाहिए जो कहते थे कि ‘यदि आप किसी एक आदमी को एक दिन भोजन कराना चाहते हो तो उसे मछली दो लेकिन अगर किसी को जीवनभर भोजन कराना चाहते हो तो उसे मछली पकड़ना सिखाओ।’


यहीं पर हम विफल रहे हैं। प्रत्येक परिवार को प्रति माह 25 किग्र्रा अनाज देकर हम उन गरीब और भूखों को भुखमरी से लड़ने में आत्मनिर्भर नहीं बना रहे हैं। यहीं पर समस्या से निपटने को लेकर हमारे दृष्टिकोण में मूल रूप से बदलाव की जरूरत है। जब तक खाद्य सुरक्षा कृषि से नहीं जुड़ेगी और जब तक खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ग्र्रामीण विकास, जल प्रबंधन और विज्ञान व तकनीक से संबंधित नीतियां नहीं अपनाई जाएंगी, भुखमरी को इतिहास नहीं बनाया जा सकेगा।


एक खास कार्ययोजना के द्वारा ब्राजील 2015 तक भुखमरी को खत्म करने जा रहा है। अब समय आ चुका है। भारत को भी शून्य भुखमरी कार्यक्रम को प्रतिपादित करना चाहिए। यह केवल अलग दृष्टिकोण अपनाकर ही संभव है। हमें इसमें कोई कारण नहीं समझ में आता कि गांव में किसी को क्यों भूखे रहना पड़ रहा है, जहां साल दर साल देश के लिए पर्याप्त खाद्यान्न का उत्पादन किया जा रहा है। स्थानीय स्तर पर सामुदायिक खाद्य अनाज बैंक स्कीम को अपनाकर हमारे 6.5 लाख गांव खाद्य सुरक्षा के मामले में आत्मनिर्भर हो सकते हैं। मैं ऐसे सौ से ज्यादा गांवों को जानता हूं जहां ऐसी ही योजना के बूते भुखमरी को पूरी तरह से खत्म करने में मदद मिली है। केवल जल संरक्षण से ही महाराष्ट्र की हिब्रे बाजार एक सूखाग्र्रस्त गांव से आज एक चमकते बाजार केंद्र में तब्दील हो चुका है। आज अकेले इस गांव में 60 करोड़पति पैदा हो चुके हैं। ऐसी व्यवस्था में स्थानीय उत्पादन, स्थानीय भंडारण और स्थानीय वितरण होता है। यह केवल तभी संभव है जब गांव के समुदायों को वहां की जमीन और जल जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण हासिल होता है।


शून्य भुखमरी के लिए प्रस्तावित छह सूत्रीय कार्यक्रम

† किसी भी कृषि योग्य जमीन का गैर कृषि वाले उद्देश्यों की पूर्ति के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

† कृषि को टिकाऊपन के आधार पर पुनर्जीवित करने की जरूरत है।

† न्यूनतम समर्थन मूल्य को शामिल करते हुए किसानों को हर महीने एक निश्चित आय मुहैया कराया जाना चाहिए। गरीब परिवार के लिए छोटे ऋणों पर कम ब्याज दर वसूली जानी चाहिए।


† अंत्योदय परिवारों को छोड़कर सार्वजनिक वितरण प्रणाली को भंग कर देना चाहिए। इसके स्थान पर बिहार और पूर्वी भारत के गांवों में चलाए जा रहे परंपरागत खाद्यान्न बैंकों की प्रणाली अपनायी जाए

† खाद्यान्न निर्यात की अनुमति तभी दी जाए जब देश के सभी लोगों का पर्याप्त रूप से पेट भरा हुआ हो।

† मुक्त व्यापार समझौतों समेत अंतरराष्ट्रीय व्यापार को घरेलू कृषि और खाद्य सुरक्षा के साथ खिलवाड़ की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। खाद्यान्न का आयात बेरोजगारी के आयात जैसा होता है।


20 अक्टूबर  को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘भुखमरी पर किरकिरी‘ कठिन राह पर चलना है मीलों’ पढ़ने के लिए क्लिक करें.

20 अक्टूबर  को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘महाशक्ति और भुखमरी‘ कठिन राह पर चलना है मीलों’ पढ़ने के लिए क्लिक करें.

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