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मिस्त्री की बेटी बनी चैंपियन

Posted On: 23 May, 2013 Others में

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जागरण मुद्दा

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Women Power

पिछले महीने हांगकांग में आयोजित इंटरनेशनल वुशु प्रतियोगिता में झारखंड की अमिशा बारला ने स्वर्ण पदक जीत देश का नाम रोशन किया। आर्थिक रूप से कमजोर अमिशा ने बिना किसी आर्थिक मदद के अपने बलबूते वुशु में राष्ट्रीय पहचान बनाई है। वह पिछले तीन साल से सीनियर नेशनल में रजत पदक जीतने में सफल हो रही है। प्रशिक्षण के लिए कई किलोमीटर पैदल आना और बिना कुछ खाए अभ्यास करते रहना, उसकी नियति बन गई थी। बावजूद इसके वह हतोत्साहित नहीं हुई। अपने अभियान में लगी रही। नतीजा, आज वह राज्य में वुशु की नंबर एक खिलाड़ी है।


पिता सोमरा बारला पेशे से राजमिस्त्री हैं। वे मुश्किल से घर वालों के लिए दो जून की रोटी की व्यवस्था कर पाते हैं। इन विपरीत परिस्थितियों से जूझते हुए अमिशा ने सफलता की राह पकड़ी। खेल के प्रति उसका लगन देख झारखंड वुशु संघ के महासचिव शिवेंद्र दुबे ने उसे प्रशिक्षण देना शुरू किया। प्रशिक्षण सुबह और शाम में होता था। प्रशिक्षण स्थल से अमिशा का घर लगभग आठ किलोमीटर दूर था। पैसा नहीं रहने के कारण वह कई बार पैदल ही कैंप पहुंच जाती थी। चूंकि शाम में उसे वापस फिर आना पड़ता था इसलिए कई बार वह बिना कुछ खाए दिन भर वहीं रह जाती।

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Women Power: बाधाओं को किया पार

मुजफ्फरपुर जिले के पटियासा गांव के एक निर्धन परिवार में जन्मीं अनिता कुशवाहा (24) ने मधुमक्खी पालन का व्यवसाय कर गरीबी दूर करने का प्रयास शुरू किया। 2002 में दो बक्से से मधुमक्खी पालन का कार्य शुरू किया। इस व्यवसाय में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया। इसके लिए समस्तीपुर के पूसा स्थित राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय से मधुमक्खी पालन का विधिवत प्रशिक्षण लिया। नई तकनीक से अनिता अब तक सैकड़ों महिलाओं को रूबरू करा चुकी हैं। उनको विश्वविद्यालय की ओर से सर्वश्रेष्ठ मधुमक्खी पालक का पुरस्कार भी मिला है।


व्यवसाय की शुरुआत में 10,000 रुपये का लाभ हुआ था। लेकिन आज वह प्रति वर्ष 200 से 300 क्विंटल तक मधु का उत्पादन कर रही हैं। इससे प्रति वर्ष तीन से चार लाख रुपये का लाभ हो रहा है। इलाके के लोग अनिता को ‘हनी गर्ल’ के नाम से बुलाते हैं। 2006 में उनकी झोली में प्रसिद्धि तब आई जब यूनिसेफ ने मुलाकात कर उनकी सफलता की कहानी पर रिपोर्ट जारी की। बीबीसी भी उन पर फिल्म बना चुका है। आज उनकी सफलता की कहानी एनसीआरटी की कक्षा चार में पढ़ाई जा रही है।

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Women Power: जीने की राह

लड़कियों- महिलाओं की कामयाबी के किस्से उत्साहित भी करते हैं और सुनहरे कल का आभास भी कराते हैं, लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि ऐसे किस्से अभीअपवाद स्वरूप ही अधिक सामने आ रहे हैं। इसका मतलब है कि स्त्री शक्ति को अभी अपनी सामथ्र्य दिखाना शेष है। इस शेष की पूर्ति तब होगी जब हर स्तर और विशेषकर समाज के स्तर पर अनुकूल हालात पैदा किए जाएंगे और लड़कियों-महिलाओं को आगे बढ़ने के अवसर देने में हिचक के बजाय गर्व का अनुभव किया जाएगा।अगर पुरुष प्रधान भारतीय समाज इस मामले में अपनी जिम्मेदारी का अहसास कर सके तो एक नए और सबल भारत का निर्माण कहीं अधिक तेजी से होते हुए देखा जा सकता है।

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Women Power: गूंथी कामयाबी की माला

अलीगढ़ शहर के छोटे से मोहल्ले दुबे के पड़ाव में रहने वाले कालीचरन फूलों की मालाएं बेचकर घर के खर्चे चलाते थे। 2005 में उनकी असमय मृत्यु हो गई। घर में पत्नी फूलवती और बेटा जीत सैनी व रिचा सैनी ही बचे। रिचा तब सातवीं और बेटा नौंवी में पढ़ रहे थे। घर के मुखिया का साया उठने से परिवार के आगे दो जून की रोटी का संकट आ गया। मां फूलवती ने आस-पास काम शुरू किया। रिचा ने भी नौंवी से ही ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया। आखिरकार कड़ी मेहनत के बाद पिछले साल नवंबर में वो पल भी आया जब रिचा ने आगरा में डा. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में ओवरऑल बीएससी, बीएससी फाइनल में गणित और बीएससी सांख्यिकी में टॉप करने पर तीन गोल्ड हासिल किए। अब   रिचा गणित की प्रोफेसर बनना चाहती हैं।

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Women Power: सपनों को किया साकार

नाम है पारुल पाल। पिता राम किशोर पाल सीतापुर में ब्रेड बेचने का काम करते हैं। कमाई बमुश्किल दो सौ रुपये रोजाना। परिवार का खर्च चला पाना टेढ़ी खीर। कठिनाइयों में जिंदगी जीने की कला पारुल ने अपने पिता से ही सीखी। वेटलिफ्टिंग और पॉवर लिफ्टिंग की ओर रुझान हुआ तो उसने उसको जीने का मकसद बना लिया। शहर के रोटीगोदाम मोहल्ले की रहने वाली पारुल बताती है कि टेलीविजन पर वेटलिफ्टिंग और पावर लिफ्टिंग का कार्यक्रम उसे बहुत अच्छा लगता था। मन होता था कि वह भी यह करे लेकिन घर की माली हालत उसे इसकी इजाजत नहीं देती थी। सन् 2007 में आरएमपी डिग्री कॉलेज में वह बीए कर रही थी। उस दौरान स्टेडियम में वेटलिफ्टिंग की कोच जमुनागुरुंग से मुलाकात हुई। वह कॉलेज में लोगों को खेल के प्रति जागरूक करने आई थीं। उनसे मुलाकात हुई। उन्होंने ऐसा तराशा कि वर्ष 2011 तक राष्ट्रीय पदक हासिल कर लिए।  अब वह खेल शिक्षक बनने की तैयारी कर रही है।


19मई को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘अबला नहीं अब सबला कहिए’ पढ़ने के लिए क्लिक करें.

19मई को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘हरियाणा लिख रहा नई इबारत‘ पढ़ने के लिए क्लिक करें.


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