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क्या असल मुद्दों से भटक रही है मीडिया

Posted On: 13 Jun, 2012 Others में

खास बातजिंदगी की जद्दोजहद पर आधारित विचार

Jamuna

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radhe maaदेश की बड़ी मीडिया चैनल खासकर हिन्दी मीडिया जब कभी धुन में होती है तो उसे रोक पाना बहुत ही मुश्किल होता है. वह लगातार किसी एक खबर को कई दिनों तक आंख मूद कर चलाती है. बिना उस खबर की मूल्य को और उसकी प्रासंगिकता को समझे टीआरपी की लालच में कई घंटों-कई दिनों तक उस खबर में गोते लगाtती रहती है.


आजकल मीडिया वालों को बाबओं पर ज्यादा प्यार आ रहा है. टेलीवीजन पर बड़ी संख्या में बाबा छाए हुए हैं. उन पर तरह-तरह की खबरे बनाकर जनता को परोशे जा रहे हैं. कुछ दिन तक इन चैनलों पर निर्बल बाबा छाए रहे, अब उनकी जगह एक ‘राधे मां’ ने ले ली है. इसका जादू लोगों के सर चढ बोल रहा है और मीडिया इनको दिखाने के लिए पागल होती जा रही है. चैनल के स्टुडियों में कई-कई घंटों तक इन माताओं और बाबाओं चर्चाए इस तरह होती है मानो ये चैनक इनकी की ही खाते हैं. उन्ही से ही उनकी रोजी रोटी चलती है. कुछ हद तक यह बात सही भी है मीडिया के अधिकतर चैनलों पर इन बाबाओं का पूरी तरह से दबदबा है. सुबह आप उठ जाइए आपको कई रंग रूप में इन बाबाओं और माताओं का दर्शन हो ही जाएगा.


मीडिया वाले पूरी तरह से समझते है कि उनका टारगेट ऑडियंस क्या है. समाज का कौन सा वर्ग किस खबर में ज्यादा रूचि लेता है इसकी गणित मीडिया वाले बखूबी समझते हैं. जनता की रूचि के अनुसार खबरों की रुपरेखा तैयार करते हैं. अब किसी को क्या मतलब है कि देश में नदियां अपने अस्तित्व को लेकर निरंतर जूझ रही है. मतलब तो इस बात से है कि पूनम पांडे को अगली खबर क्या है, अब किसके जीतने पर वह नग्न होने वाली हैं. या फिर सन्नी लियोन ने अगली कौन सी फिल्म साइन की है. हद तो तब हो जाती है जब इन बाबाओं और माताओं का खेल चैनलो पर प्राइम टाइम पर दिखाया जाता है. जिसे आंखे न देखने के बावजूद देखने पर मजबूर हो जाती है.


अब जरूरत है कि मीडिया अपने कार्यक्रमों में पूरी तरह से बदलाव लाए. सरकार की गलत नीतियों और जनता की बेरुखी की बदौलत देश में कुछ मुद्दे ऐसे हैं जो अपने अस्तित्व को खोती जा रही है. ऐसे में मीडिया अपनी सक्रिय भूमिका से ऐसे मुद्दों को उजागर कर सकती है.


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