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जजों का कुनबा न्याय को तरसा

Posted On: 4 Aug, 2010 Others में

जन जागरणबेहतर न्याय लाएगा बदलाव

Jan Jagran

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विकास सहाय, इलाहाबाद

नाना की खरीदी जमीन को लेकर शुरू हुई न्याय की लड़ाई में नाती अर्जुन है और 37 साल बाद भी लड़ाई जारी है। मामला बनारस में सिगरा स्थित एक बीघे भूमि का है। फरियादी निर्मला वर्मा (अब स्वर्गीय) पूर्व मुख्य न्यायाधीश स्व. शशिकांत वर्मा की पत्‍‌नी हैं। शशिकांत यूपी के कार्यकारी राज्यपाल भी रहे थे। निर्मला के ससुर यानि शशिकांत के पिता स्व. कमलाकांत वर्मा भी यूपी व राजस्थान में मुख्य न्यायाधीश रहे। ससुराल पक्ष प्रभावी था तो मायके का प्रभुत्व भी कम नहीं था। पिता स्व. महावीर प्रसाद बिहार में 20 साल से अधिक समय तक महाधिवक्ता रहे। इन्हीं महावीर प्रसाद ने सिगरा में एक बीघा जमीन खरीदी। 1965 में पिता की मृत्यु के बाद इकलौती संतान होने के कारण निर्मला वारिस हुईं। हालांकि वह इस जमीन पर कब्जा नहीं पा सकीं। पता चला कि किसी समिति ने उसे कई और लोगों को बेच दिया है। अंतत: 1973 में निर्मला वर्मा ने ओरिजिनल सूट दायर किया। इसके बाद से ही उनका मामला अदालती कार्यवाहियों की पेंचीदगियों का शिकार हो गया। तमाम अपीलें हुईं। 1989 में निचली अदालत के आदेशों के खिलाफ यह प्रकरण इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा। यहां से सेकेंड अपील 20 साल बाद 2009 में निस्तारित हुई। इसके साथ ही कुछ वाद बिंदुओं के निस्तारण के लिए मामला वापस भेज दिया गया। हाईकोर्ट ने कहा कि छह माह के भीतर वाद बिंदु निस्तारित कर दिए जाएं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। फिर याचिका दाखिल हुई जिसके बाद निचली अदालत ने वाद बिंदु निस्तारित करते हुए मामले को खारिज कर दिया। इस बीच निर्मला वर्मा का निधन हो गया और उनके बेटे हाईकोर्ट अधिवक्ता नीरज कांत वर्मा ने कानूनी लड़ाई की जिम्मेदारी संभाल ली। वह अब फिर अपील की तैयारी कर रहे हैं। यह है न्यायिक किलेबंदी का तिलस्मी सफर। नाना की जमीन, मां ने मुकदमा लड़ा, 55 साल का बेटा अभी लड़ रहा है और निस्तारण कब होगा, अभी अनिश्चित है। फैसला किसके पक्ष में जाता है, यह दीगर बात है। 37 साल से चल रही यह लड़ाई कब सिरे पहुंचेंगी, कहा नहीं जा सकता।

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