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जरा खिड़की तो खोलिए मी लॉर्ड

Posted On: 24 Jul, 2010 Others में

जन जागरणबेहतर न्याय लाएगा बदलाव

Jan Jagran

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माला दीक्षित, नई दिल्ली

सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता को अब तो कानून और तकनीक का भी सहारा मिल रहा है। फिर भी न्यायपालिका की इस बहस से दूरी बहुतों को खटक रही है। सूचना का अधिकार, न्यायाधीशों के लिए संपत्ति की घोषणा और जजों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे पारदर्शिता के नए मुद्दों से दोस्ती में न्यायपालिका को वक्त लग रहा है। सूचना के अधिकार से पहला झटका न्यायपालिका को ही लगा है। केंद्रीय सूचना आयोग का आदेश था कि मुख्य न्यायाधीश अन्य जजों की संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक करें। सुप्रीम कोर्ट को यह आदेश हजम नहीं हुआ। उसका मानना था कि चीफ जस्टिस का कार्यालय सूचना कानून से बाहर है।

मामले को रजिस्ट्रार के जरिए हाईकोर्ट में चुनौती दी गयी। दलीलें चलीं आखिर में हाईकोर्ट ने फैसला सुना दिया कि भारत के मुख्य न्यायाधीश के दफ्तर पर सूचना कानून लागू होता है। फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने अपने यहां ही अपील की है। सुप्रीम कोर्ट के पास सूचना के अधिकार से बाहर रहने के तर्क भले ही हों, लेकिन पारदर्शिता के दबावों की अनदेखी नहीं हो सकी। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने स्वेच्छा से वेबसाइट पर अपनी संपत्ति घोषित करने का फैसला लिया। कई उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों ने भी ऐसा ही किया, लेकिन यह पारदर्शिता आधी है क्योंकि संपत्ति की घोषणा स्वैच्छिक है। इसके पीछे कोई कानूनी बाध्यता नहीं है और संपत्ति घोषणा का प्रारूप भी तय नहीं है। संपत्ति घोषणा के पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में भी पारदर्शिता ही है। यह बहस न्यायाधीश (संपत्तियां व दायित्व) विधेयक 2009 से शुरू हुई थी। इसकी धारा छह विवादित थी क्योंकि संपत्तियों की घोषणा पर जजों से सवाल जवाब का प्रावधान नहीं था। संपत्ति का खुलासा भी विशेष परिस्थितियों में संभव था। इसलिए कानून पारित नहीं हुआ और बहस जारी है।

न्यायाधीशों को अभिव्यक्ति की आजादी की बहस भी अब गरम है। कर्नाटक हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश ने ब्लॉग पर अपने ही मुख्य न्यायाधीश के आचरण पर टिप्पणियां की। तो न्यायपालिका ने ब्लॉगर जज को आचरण की सीमाएं याद दिला दी। यानी जजों को न तो सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेना चाहिए, न लेख लिखने चाहिए और न ही ब्लॉग। जजों को सिर्फ अपने फैसलों के जरिए ही बोलना चाहिए। वैसे अदालतों में पारदर्शिता पर सरकार भी असमंजस में ही दिखती है। कानून मंत्री वीरप्पा मोइली कहते हैं कि अदालत के कुछ हिस्सों को छोड़कर बाकी कामकाज में तो पारदर्शिता होनी ही चाहिए।


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