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आँखों वाला न्याय चाहिए, अंधा प्रतिशोध नहीं

Posted On: 25 Jan, 2016 Others में

जितेन्द्र माथुर

Jitendra Mathur

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दिसंबर 2012 में सम्पूर्ण राष्ट्र की चेतना को झकझोर देने वाले निर्भया कांड के एक अभियुक्त को अपनी आयु के आधार पर विधि-व्यवस्था के अंतर्गत अवयस्क की श्रेणी प्राप्त होने के कारण कारागृह से छोड़ क्या दिया गया कि देश में चहुँओर कोहराम मच गया । भावुकता में डूबे निर्भया के माता-पिता को साथ लेकर उन्मादी भीड़ सड़कों पर उतर आई और दंडनीय अपराधों हेतु वयस्कता की वैधानिक आयु घटाने वाला विधेयक तथाकथित लोकतन्त्र के मंदिर अर्थात संसद में बिना किसी विचार-विमर्श के आनन-फानन में पारित कर दिया गया । तो क्या निर्भया के साथ न्याय हो गया ? या इससे देश में अन्याय की पीड़ा झेलती असंख्य निर्भयाओं को न्याय मिल गया ? या उस एक अभियुक्त का छूट जाना ही ऐसे समस्त अन्यायों का प्रतीक है ? जागरण जंक्शन सहित विभिन्न मंचों पर मैंने इस संदर्भ में अनेक विचार पढ़े और यह पाया कि उनमें से अधिकांश और कुछ नहीं वरन भीड़ की उन्मादी मानसिकता के ही उत्पाद थे । चातक जी के आलेख ‘निर्भया के असली गुनाहगार’ को मैंने सबसे पृथक और बेलाग पाया जिसमें न्यायपालिका सहित देश की सभी व्यवस्थाओं को कठघरे में खड़ा किया गया था । लेकिन जो प्रश्न मैंने ऊपर उठाए हैं, वे सर्वत्र अनुत्तरित हैं ।  संभवतः इसलिए कि उनके उत्तरों का आकांक्षी कोई है ही नहीं । निर्भया जैसी पीड़िताएं भी नहीं ।

निर्भया किसी की पुत्री थी । प्रत्येक पीड़िता किसी न किसी की पुत्री होती है । प्रत्येक पुत्री की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि सभी माता-पिता प्रत्येक पीड़िता को अपनी पुत्री की भांति समझें, उसकी व्यथा को अनुभूत करें और किसी भी अन्य पुत्री के पीड़िता बनने की संभावना को रोकने के लिए प्राणपण से प्रयासरत रहें । निर्भया का मामला बहुचर्चित बन गया जिसके शोर में न केवल देश के विभिन्न भागों में आए दिन ऐसी पीड़ा को भोगने के लिए अभिशप्त असंख्य निर्भयाओं की आहें गुम हो गईं वरन अनेक ऐसे ज्वलंत प्रश्न भी अनदेखे कर दिए गए जिनके उत्तर उतने ही प्रासंगिक हैं जितनी कि निर्भया की पीड़ा । निर्भया के साथ दुराचार के अवयस्क आरोपी को जीवन भर के लिए कारागृह में बंद कर देने या मृत्युदंड दे देने से उन सहस्रों पीड़िताओं को न्याय नहीं मिल सकता जिनकी पीड़ा को सुनने, देखने और अनुभूत करने वाला कोई नहीं ।

क्या अपने बहुमूल्य जीवन का अधिकांश भाग मरणासन्न अवस्था (कोमा) में रहकर बिताने वाली अरुणा शानबाग की पीड़ा (जिसका अपराधी सस्ते में इसलिए छूट गया क्योंकि उस पर वास्तविक अपराध के आरोप लगाए ही नहीं गए और हलके आरोपों को लगाकर हलकी सज़ा सुना दी गई) या हरियाणा में डीजीपी कार्यालय के सामने अपनी जान दे देने वाली सरिता की पीड़ा (जिसके अपराधी पुलिस वाले ही थे) किसी भी रूप में निर्भया की पीड़ा से कम थी ? उन्हें तो मरने के बाद भी न्याय नहीं मिला । बिहार के जसीडीह थाना-क्षेत्र के पड़रिया गाँव की पीड़ा तो तीन दशक से अधिक पुरानी हो चुकी है लेकिन मरहम से वंचित घाव आज भी हरे हैं । पुलिस वालों ने उस  गाँव की बहू-बेटियों को सामूहिक रूप से पाशविकता का शिकार बनाया था और उनके परिवार के पुरुषों पर वहशियाना अत्याचार किए थे । उसका दूरगामी परिणाम यह निकला कि पड़रिया के लड़कों के विवाह-संबंध होने में ही रुकावट आ गई क्योंकि लोगों ने उस गाँव में बेटी देना ही बंद कर दिया । जिस आदिवासी किशोरी मथुरा के दुराचार का मामला सत्तर के दशक में देश भर में चर्चा का विषय बन गया था और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय ने देश भर में संबंधित विधान में सुधार के लिए एक लहर उत्पन्न कर दी थी, उसके अपराधी भी पुलिस वाले ही थे । क्या दुराचारियों को गोली मारने की बात करने वाले दिल्ली पुलिस के बड़बोले महानिदेशक भीम सेन बस्सी अपने ही विभाग के ऐसे दरिंदों को गोली मारने का नैतिक साहस रखते हैं ? निर्भया कांड के समय दिल्ली पुलिस के महानिदेशक के पद पर चौकड़ी जमाकर बैठे नीरज कुमार ने दिल्ली में महिलाओं को सुरक्षा देने में अपनी विफलता पर परदा डालने के लिए शीघ्र ही क्रिकेट मैच फ़िक्सिंग के नाम पर कुछ बलि के बकरे पकड़ लिए और अब सेवानिवृत्ति के उपरांत वे निर्भया कांड की चर्चा से बहुत दूर रहते हुए भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड के सलाहकार बनकर उससे मोटा पारिश्रमिक झटक रहे हैं ।

बाल विवाह के विरुद्ध समाज को जागरूक बनाने में लगी साथिन भंवरी देवी की पीड़ा को क्या निर्भया के नाम पर सुर्खियाँ बटोरने वाले अनुभूत कर पा रहे हैं जिसे अपने सत्कर्म का पुरस्कार अपनी देह के साथ जघन्य दुष्कर्म के रूप में मिला ? पश्चिम बंगाल के बीरभूम ज़िले में पंचायत के आदेश पर सार्वजनिक रूप से सामूहिक दुराचार की शिकार आदिवासी युवती की पीड़ा क्या निर्भया की पीड़ा से हलकी है ?  ऐसे आदेश हमारे देश की विवेकहीन और संवेदनहीन पंचायतें आए दिन देती ही रहती हैं जिनकी भुक्तभोगी बनती हैं निर्दोष बालाएं । निर्भया के बलिदान की आँच पर अपने निहित स्वार्थ की रोटियाँ सेकने और बढ़-चढ़कर बोलने वालों के कानों तक क्या ऐसी अभागियों की सिसकियाँ पहुँच पाती हैं ? क्या हमारे वोटों के भिक्षुक राजनेता ऐसी मध्ययुगीन परपीड़क मानसिकता वाली पंचायतों को समाप्त करना तो दूर उन पर कठोर कार्रवाई करने का विचार भी कर सकते हैं ?

भारतीय दंड विधान और दंड संबंधी अवधारणाओं की विडम्बना यह है कि वे प्रतिशोध की भावना पर आधारित हैं – अपराधी व्यक्ति से समाज का सामूहिक प्रतिशोध । लेकिन प्रतिशोध प्रायः अंधा होता है । देश में एक सदी से हो रहे क़ौमी दंगे इस बात का ठोस सबूत हैं जिनमें दोनों ही तरफ़ के लोग अपनी तरफ़ के बेगुनाह शिकारों का बदला दूसरी तरफ़ के बेगुनाहों से लेते हैं और असली मुजरिम साफ़ बच निकलते हैं । और अत्यंत कटु तथा पीड़ादायी सत्य यह भी है कि ऐसी कार्रवाइयों में दोनों ही पक्षों की पूर्णतया निर्दोष अबलाओं को  निर्भया के साथ हुए अनाचार की ही भांति आततायी पुरुषों के हाथों घृणित अत्याचार झेलने पड़ते हैं । क्या ऐसा अंधा प्रतिशोध एक अन्याय की प्रतिक्रिया में किया गया दूसरा अन्याय नहीं होता है ? एक अन्याय की क्षतिपूर्ति दूसरा अन्याय कैसे कर सकता है ? इसीलिए क़ौमी नफ़रतों की आग कभी बुझती नहीं, और भड़कती ही है । अतः न्याय के मूल में प्रतिशोध नहीं होना चाहिए क्योंकि प्रतिशोध की आँखें या तो होती नहीं या होती भी हैं तो वास्तविकता को देखने के लिए खुलती नहीं ।

भारत में कारागृहों तथा बाल (एवं नारी) सुधार-गृहों की हालत अत्यंत दयनीय है जिनमें अपराधियों का सुधारना असंभव के तुल्य कठिन होता है । उनमें कानून के रक्षकों द्वारा कथित अपराधियों के साथ ऐसे-ऐसे अन्याय एवं घृणित अत्याचार किए जाते हैं कि उनके व्यक्तित्व में अगर थोड़ा-बहुत सत्व का तत्व रह गया हो तो वह भी समाप्त हो जाए । ज़मीं पर दोज़ख का दर्ज़ा रखने वाली ऐसी जगहों में कुर्सियों पर बैठे कानून के रखवाले इन मुजरिमों से भी बड़े मुजरिम होते हैं लेकिन किसी भी सज़ा के मुश्तहक़ नहीं समझे जाते क्योंकि उनके ज़ुल्म-ओ-सितम और ज़रायम की कहानियाँ कभी बाहर ही नहीं आतीं । ऐसी जगहों के बाशिंदे किस्मत से कभी बाहर निकल भी पाते हैं तो तब तक उनमें अच्छाई का नाम-ओ-निशान तक बाकी नहीं रहता और वे पहले नहीं भी रहे हों तो अब समाज के कट्टर दुश्मन बन चुके होते हैं । निर्भया कांड के अवयस्क अपराधी की उस कांड में भूमिका कितनी थी, यह तो स्वर्गीय निर्भया को ही सही-सही मालूम था लेकिन उसके छूट जाने से कोई कयामत नहीं आने वाली । सच तो यह है कि उसके छूट जाने के बाद समाज को उससे कोई खतरा हो न हो, उसे समाज में घूम रही अंधी, अविवेकी, उन्मादी भीड़ से पूरा-पूरा खतरा है । तिहाड़ जेल में निर्भया कांड के सज़ायाफ़्ता मुजरिम राम सिंह ने ख़ुदकुशी कर ली तो क्या निर्भया की रूह को चैन मिल गया, इंसाफ़ हो गया निर्भया का ? राम सिंह को जेल के भीतर ही अप्राकृतिक दुष्कर्म का शिकार बनाया गया था । क्या वह इसलिए न्याय पाने का अधिकारी नहीं क्योंकि वह निर्भया का दोषी था ?

दंड के निमित्त वयस्कता की आयु कम करना देश के विधि-विधान में उपस्थित ऐसी विसंगतियों को बढ़ाने का ही काम करेगा, घटाने का नहीं । हमारे यहाँ पुलिस से अधिक भ्रष्ट और विकृत विभाग कोई नहीं जिनमें उन्हीं अपराधों को करने का वर्दीरूपी अनुज्ञापत्र लिए घूमते लोग भरे पड़े हैं जिन अपराधों की रोकथाम का नैतिक और विधिक दायित्व उन पर डाला गया है । इसीलिए भारतीय जनमानस में पुलिसियों की छवि वर्दी वाले गुंडों सरीखी ही है जिनके लिए प्रत्येक नया कानून अपनी ज़ेबें भरने और अपनी पाशविक प्रवृतियों को तुष्ट करने के लिए बलि के बकरे पकड़ने के साधन से इतर कुछ नहीं होता । किसी किशोर ने जाने-अनजाने या कुसंगति के परिणामस्वरूप एक अपराध कर दिया तो क्या उसे सुधरने का एक भी मौका दिए बिना इन भेड़ियों के हवाले कर दिया जाए ? क्या यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त के अनुकूल होगा ? क्या ऐसा करके भावी पीढ़ियों के लिए एक बेहतर समाज का निर्माण किया जा सकता है ? क्या एक निर्भया को तथाकथित न्याय दिलाने के नाम पर बनाए गए  इस कानून के माध्यम से हज़ारों निर्दोष किशोरों के लिए संकट खड़ा नहीं किया गया है ? साधन-सम्पन्न और दबंग परिवारों के किशोरों के लिए तो कानून के हत्थे चढ़ने के बाद भी बच पाने की गुंजाइश रहती है क्योंकि उनके माता-पिता वकीलों की कतार खड़ी कर देते हैं न्यायालयों में लेकिन दुर्बल पृष्ठभूमियों से आने वाले अभागे किशोरों को कौन बचा सकता है पुलिस की हिरासत, जेल और कथित सुधार-गृहों में किए जाने वाले रोंगटे खड़े कर देने वाले भयानक अत्याचारों से जिन्हें करने वाले सरकार के ही कर्मचारी होते हैं जिनके वेतन-भत्तों और सुविधाओं का भार जनता वहन करती है ? हमारी जेलों में हज़ारों विचाराधीन अपराधी दोष-सिद्धि तो दूर सुनवाई तक के बिना सालों से सड़ रहे हैं । उनकी बेबसी का फ़ायदा उठाने के लिए कानून के नुमाइंदे तो खम ठोककर खड़े हैं लेकिन कानून के पास उनके लिए इंसाफ़ तो दूर दो बूंद आँसू भी नहीं हैं । क्या देश के भावी कर्णधारों पर अत्याचार करने के लिए हमारी हृदयहीन पुलिस को एक और शक्तिशाली अस्त्र नहीं दे दिया गया है ? पुलिस तो जिसे पकड़ ले, वही अपराधी । पकड़ा गया निर्दोष किशोर यदि साधनहीन है तो उसे कौन बचाएगा ?

अपराध दंड की कठोरता से नहीं रुकते, वरन उसकी सुनिश्चितता से रुकते हैं । हमारे दंड-विधान की मूल दुर्बलता यही है कि साधन-सम्पन्न और चतुर अपराधी दंड से बच निकलने में स्वयं को सक्षम पाते हैं और किसी मामले में पीड़ित के साथ न्याय हो भी पाता है तो इतने विलंब से कि वह न्याय अपना अर्थ ही खो चुका होता है । साधन-सम्पन्न वादी अपने वकीलों के माध्यम से मुकदमे को इसीलिए लंबा खिंचवाते हैं ताकि इंसाफ़ हो भी तो बेमानी बनकर हो क्योंकि देर ही अंधेर है । न्याय में विलंब तो न्याय से वंचित करने की सबसे सुगम रीति है । भारतीय व्यवस्थाओं में अन्याय करना सरल इसीलिए होता है क्योंकि अन्याय को तुरंत कार्यान्वित किया जा सकता है जबकि न्याय पाने में पीड़ित का सम्पूर्ण जीवन व्यतीत हो सकता है और उसके उपरांत भी न्याय मिलने का कोई ठोस आश्वासन नहीं होता । न्याय पाने की यह कठिनाई ही अन्यायियों को अन्याय करने की सुविधा प्रदान करती है । अतः शीघ्र, अल्पमूल्य तथा शुद्ध-सच्चा न्याय ही भावी अन्यायों को रोक सकता है, नए विधि-विधान या वर्तमान विधि-विधानों में बिना सोचे-विचारे किए गए तर्कहीन संशोधन नहीं ।

भारतीय संसद ने बाल न्याय (बाल संरक्षण एवं सुरक्षा) अधिनियम में दंड हेतु आयु घटाने वाला संशोधन बिना किसी चर्चा के ही पारित कर दिया, इसमें आश्चर्य क्या ? हमारे निकम्मे एवं अनुत्तरदायी सांसद बिना चर्चा के एकमत होकर या तो अपने वेतन-भत्ते बढ़ाने के विधेयक पारित करते हैं या फिर ऐसे विधेयक जिनके पीछे वोट डालने वाली भीड़ का दबाव हो क्योंकि वे तो देश के नागरिकों को वोट बैंकों के रूप में ही देखते हैं । वो समय तो कभी का जा चुका जब संसद में जवाहरलाल नेहरू, राम मनोहर लोहिया, मधु लिमये और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे प्रबुद्ध लोग विभिन्न विधेयकों पर गहन अध्ययन करके उनके गुण-दोषों पर सार्थक विचार-विमर्श किया करते थे । अब तो संसद में या तो निरर्थक होहल्ला होता है या फिर विधेयकों का बिना सोचे-विचारे पारण । उन्हें ठीक से पढ़ने का श्रम क्यों किया जाए और उनके विभिन्न पक्षों तथा दूरगामी परिणामों को सूक्ष्मता से समझने के लिए मस्तिष्क पर ज़ोर क्यों डाला जाए जब उद्देश्य केवल सड़कों पर उतरी भीड़ को संतुष्ट करके वापस भेजना हो  ? अपना वक़्ती सरदर्द टलना चाहिए, देश और समाज आगे चलकर भुगते तो भुगते, हमें क्या ?

क्या अपराध के दंड की आयुसीमा को घटाने जैसा महत्वपूर्ण निर्णय किसी एक मामले की बिना पर लिया जाना चाहिए ? यदि ऐसा कोई और मामला फिर हो गया जिसमें किसी अपराधी की आयु इस नई आयुसीमा से भी कम हुई तो क्या इस विधान में पुनः संशोधन करके इस आयु को और भी घटाया जाएगा ? राष्ट्र की न्याय-व्यवस्था प्राकृतिक न्याय के सनातन सिद्धांतों के आधार पर चलनी चाहिए, भीड़ की इच्छाओं के अनुरूप नहीं । हमारे देश में वातावरण उत्तरोत्तर ऐसा होता जाता रहा है कि न्यायालय भी अब भीड़ की इच्छाओं के अनुरूप लोकलुभावन निर्णय देने (और संदर्भहीन किन्तु लोकरुचि को भाने वाली टिप्पणियाँ करने) में ही अधिक रुचि लेने लगे हैं । देश के भविष्य के लिए यह कोई शुभ संकेत नहीं ।

यदि अल्प आयु के बालक अपराध कर रहे हैं तो इसका कारण है उनके चरित्र-निर्माण का अभाव । आजकल बालकों को कमाऊ बनने की सीख सभी देते हैं, चरित्रवान बनने की कोई नहीं देता । अब चरित्र-निर्माण के संस्कार न उन्हें घर से मिल रहे हैं, न शिक्षण-संस्थानों से । नशे के साधन और चरित्र को पतित करने वाली अश्लील सामग्रियां सर्वत्र धड़ल्ले से उपलब्ध हैं । ऐसे में अपराध कैसे रुकेंगे जब बालकों की मानसिकता ही भ्रष्ट हो गई हो ? हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि धन गया तो समझो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य गया तो समझो कुछ गया और चरित्र गया तो समझो सब कुछ चला गया । इसलिए मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि भारत की विभिन्न समस्याओं का दीर्घकालिक समाधान बालकों और बालिकाओं का चरित्र-निर्माण ही है । क्या निर्भया के नाम पर होहल्ला मचाकर और बाह्य दबाव बनाकर संसद को उतावली में विधेयक पारित करने पर विवश करने वाले कथित जागरूक नागरिक इस बात को समझते हैं ? क्या वे अपने परिवार के बालकों को अच्छे संस्कार देने में रुचि लेते हैं ताकि वे किसी बाला के निर्भया बनने का कारण न बनें ? निर्भया और उस जैसी हज़ारोंलाखों पीड़िताओं का अभीष्ट वस्तुतः तर्क एवं विवेक सम्मत आँखों वाला न्याय है, न कि अंधा प्रतिशोध जिसकी उपलब्धि शून्य हो ।

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