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ढोल गंवार शूद्र पशु नारी

Posted On: 24 Jul, 2016 Others में

jlsजो देखता हूँ, वही लिखता हूँ

jlsingh

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ढोल गंवार शूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी. गोस्वामी तुलसीदास ने बहुत पहले ही कह दिया था. रामायण में भी जगज्जननी सीता की अग्नि परीक्षा के बाद भी धोबी के द्वारा लांछना देने पर राजमहल से निर्वासित कर जंगल में भेज दिया गया, वह भी गर्भावस्था में. अहिल्या प्रकरण से भी हम सभी परिचित हैं. द्रौपदी के साथ क्या हुआ, हम सभी वाकिफ हैं. पुराणों के समय से महिलाओं और शूद्रों की अवहेलना होती रही है. इतिहास में भी महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी नहीं रही है. इतिहास में भी महिलाओं के साथ बहुत भद्रता से पेश नहीं आया गया. सती प्रथा उन्मूलन, विधवा विवाह प्रारंभ और बाल विवाह उन्मूलन आदि कार्यक्रम महिलाओं की ख़राब स्थिति को देखते हुए ही चलाये किये गए. काफी वेश्याएं मजबूरीवश ही यह पेशा अपनाती हैं. कोठे पर जानेवाले तो शरीफ और खानदानी होते हैं. पर वेश्याओं को कभी भी अच्छी नजर से नहीं देखा गया. कमोबेश आज भी स्थिति वही है.
हालांकि पहले भी और आज भी महिलाएं सम्मान और सम्मानजनक पद भी पा चुकी है. पहले भी देवियाँ थी और आज भी वे पूज्य हैं. आज भी अनेकों महिलाएं कई सम्मानजनक पद को सुशोभित कर चुकी हैं. प्रधान मंत्री, राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, मुख्य मंत्री से लेकर कई पार्टियों की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं. इसके अलावा कई जिम्मेदार पदों पर रहकर अपनी भूमिका का सफलतापूर्वक निर्वहन का रही हैं. प्रधान मंत्री रह चुकी इंदिरा गाँधी को विश्व की ताकतवर हस्तियों में गणना की जाती रही है. पर लांछन लगानेवाले उनके भी चरित्रहनन से बाज नहीं आये. सोनिया गाँधी पर भी खूब प्रहार किये गए. एक दिवंगत भाजपा नेता ने उनकी तुलना मोनिका लेवेस्की से कर दी थी. वर्तमान सरकार के मुखर मंत्री भी सोनिया गाँधी पर अमर्यादित टिप्पणी कर चुके हैं. महिला हैं, यह सब सुनना/सहना पड़ेगा. महिलाओं, वृद्धाओं, बच्चियों के साथ हो रहे घृणित कर्मों से समाचार पत्र भरे रहते हैं. निर्भया योजना, महिला सशक्तिकरण, बेटी बचाओ, बेटी पढाओ आदि योजनाओं के होते हुए भी महिलाओं पर ज्यादती हो रही है और कब तक होती रहेगी कहना मुश्किल है. भाजपा की वर्तमान सरकार की पूर्व मानव संशाधन विकास मंत्री (वर्तमान कपड़ा मंत्री) पर भी बीच-बीच में फब्तियां कसी जाती रही हैं. हालाँकि वे स्वयम मुखर हैं और वे अपना बचाव करती रही हैं.
वर्तमान सन्दर्भ है, मायावाती को भाजपा के उत्तर प्रदेश के पार्टी उपाध्यक्ष श्री दया शंकर सिंह ने उन्हें सार्वजनिक सभा में वेश्या कहा. मायावती ने इसका पुरजोर विरोध किया. संसद में खूब दहाड़ी और अपने कार्यकर्ताओं को भी एक तरह से ललकार दिया कि वे सड़कों पर उतर आयें और विरोध प्रदर्शन करें. हालाँकि दयाशंकर सिंह ने माफी मांग ली पर उनपर कई धाराएं लगाकर प्राथमिकी दर्ज कर दी गयी है. उन्हें गिरफ्तार करने के लिए यु पी पुलिस ढूंढ रही है, पर वे तो अंडरग्राउंड हो गए. हालाँकि एक प्रेस को उन्होंने साक्षात्कार भी इसी बीच दे दिया है और फिर से माफी मांग ली है और यह भी कहा है कि उनकी गलती की सजा उनकी पत्नी और बेटी को क्यों दी जा रही है? उल्लेखनीय है कि मायावती की शह पाकर बसपा कार्यकर्ताओं की भीड़ ने दयाशंकर की पत्नी और उनकी १२ वर्षीय बेटी को भी अपमान जनक शब्दों से नवाजा. दयाशंकर की बेटी सदमे में हैं और उनकी पत्नी स्वाति सिंह उत्तेजित. उन्होंने मायावती और उनके कार्यकर्ताओं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करा चुकी हैं. धरने पर बैठने की तैयारी में थी, पर शायद बेटी की तबीयत ज्यादा ख़राब हो गयी इसलिए फिलहाल धरने का कार्यक्रम टाल दिया है. पर मीडिया में वह भी मायावती पर खूब हमला कर रही है. स्वाति जी सुशिक्षित, LLB और पूर्व लेक्चरर भी हैं भाजपा प्रदेश के उपाद्ध्यक्ष की पत्नी हैं. इसलिए मायावती पर वह भी जमकर प्रहार कर रही हैं. उनका आक्रोश भी खूब झलक रहा है. वह मायावती और उनके कार्यकर्ताओं पर हमलावर हैं, पर अपने पति के द्वारा प्रयुक्त शब्द पर उनका जवाब रक्षात्मक ही है. कुछ लोग उनमें राजनीतिक नेत्री की छवि भीं देख रहे हैं. क्योंकि दयाशंकर के पार्टी से ६ साल के निष्कासन पर उनकी जगह वही भर सकती हैं और एक खास वर्ग के वोटों की हकदार हो सकती हैं.
रविवार, २४ जुलाई को मायावती का प्रेस कांफ्रेंस हुआ उसमें मायावती ने भाजपा पर जमकर प्रहार किया साथ ही दयाशंकर की माँ, बहन और पत्नी को भी दोहरी मानसिकता की शिकार बताया. जबकि बसपा नेता नसीमुद्दीन सिद्दकी का बचाव करती नजर आयीं. मायावती के अनुसार नसीमुदीन ने कोई गलत शब्द का इस्तेमाल नहीं किया था. वे तो दयाशंकर को पेश करने की मांग कर रहे थे. गुजरात के ऊना में दलितों के साथ हुए प्रताड़ना का मुद्दा भी उठाया. रोहित वेमुला केस को भी उन्होंने कुरेदा और यह अहसास करवाया कि भाजपा दलित विरोधी पार्टी है. बसपा एक राजनीतिक पार्टी के साथ एक सामाजिक परिवर्तन की भी पैरोकार है. मायावती ने सपा और भाजपा की मिलीभगत की तरफ भी इशारा किया. क्योंकि अब तक दयाशंकर की गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई है? इस मामले में प्रधान मंत्री की चुप्पी भी विपक्ष को प्रश्न उठाने का मौका दे देता है.
जाहिर है मामला राजनीतिक है और इसे दोनों पार्टियाँ अपने-अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं. भाजपा प्रवक्ता प्रेम शुक्ला ने कहा कि मायावती खुद दलित विरोधी हैं और उन्हें चुनाव के समय ही दलितों की याद आती है. भाजपा भी दलितों के घर खाना खाकर, बाबा साहेब अम्बेडकर की १२५ जयंती के उपलक्ष्य में विभिन्न कार्यक्रम करके बसपा के वोट बैंक दलित समाज में सेंध लगाने की कोशिश कर रही हैं. अब तो चुनाव परिणाम ही बताएगा कि दलित वोट किधर जाता है?
उधर आम आदमी पार्टी के विधायक अमानुतल्ला खान को एक महिला की साथ बदसलूकी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है. ख़बरों के अनुसार अबतक आम आदमी पार्टी के नौवें विधायक गिरफ्तार हो चुके हैं. शाम तक आम आदमी पार्टी के एक और विधायक नरेश यादव को भी पंजाब में विद्वेष फ़ैलाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. आम आदमी पार्टी पर कानून का शिकंजा शख्ती से लागू होता है. पर भाजपा के पदाधिकारी को पुलिस ढूढ़ ही नहीं पाती है. एक और बिहार भाजपा के पार्षद(एमएलसी) टुन्ना पाण्डेय पर किसी १२ वर्षीय लड़की के साथ ट्रेन में छेड़छाड़ का आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. उसे भी भाजपा ने तत्काल पार्टी से निलंबित कर दिया. इससे यह जाहिर होता है कि भाजपा फिलहाल अपनी छवि को बेदाग रखना चाहती है.
अब थोड़ी चर्चा मानसून की कर ली जाय. इस साल पहले से ही अच्छे मानसून की भविष्यवाणी की जा रही थी. मानसून अच्छी हो भी रही है. कहीं-कहीं खासकर उत्तर भारत में अतिबृष्टि हो रही है. अतिबृष्टि से जान-माल का भी काफी नुकसान हो रहा है. बिहार झाड़खंड में देर से ही सही पर अभी अच्छी वर्षा हो रही है. खरीफ की अच्छी पैदावार की उम्मीद की जा सकती है. पर वर्तमान में दाल और सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं, इस पर सरकार का कोई खास नियंत्रण नहीं है. सब्जियों और खाद्य पदार्थों के प्रसंस्करण और रख-रखाव के मामले में भी अभी बहुत कुछ करना बाकी है. किसानों को उनकी लागत के अनुसार दाम नहीं मिलते, इसलिए वे खेती-बारी की पेशा से दूर होते जा रहे हैं. उपजाऊ जमीन या तो बेकार हैं या वहाँ अब ऊंचे ऊंचे महल बन गए हैं. गाँव में भी शहर बसाये जा रहे हैं. विकास के दौर में कृषि का अपेक्षित विकास नहीं हो रहा है. भारत गांवों का देश है, अभी भी लगभग ७० प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है. कृषि और कृषि आधारित उनका पेशा है पर वे गरीब हैं. ऋण ग्रस्त हैं. इसलिए वे असंतोष की आग में आत्महत्या करने को भी मजबूर हैं. सच कहा जाय तो दलित और पिछड़ा वही हैं. कब मिलेगी उन्हें इस दलितपने और निर्धनपने से आजादी! पूरे देश को खाना खिलानेवाला वर्ग आज स्वयम भूखा नंगा है. खोखले वादों से तो कुछ भला नहीं होनेवाला. जमीनी स्तर पर काम होने चाहिए. सामाजिक समरसता और समान वितरण प्रणाली से ही सबका भला होगा. तभी होगा जय भारत और भारत माता की जय!
– जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.

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