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मैं भी अन्ना,तू भी अन्ना.

Posted On: 30 Mar, 2012 Others में

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jyotsnasingh

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अन्ना ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक आन्दोलन चलाया और बहुत सारे लोग जिनके पास फालतू समय था,कुछ दिखने को तमाशा था,और तमाशबीन,अन्ना टोपी लगा कर मैदान में डट गए- मौसम अच्छा था,अवकाश था या मिल गया था,चाय,नाश्ते,खाने का २४घन्ते बढ़िया प्रबंध था.और सबसे ऊपर टी.वी पर आने का,हाथ हिलाने का,और मुंह खोलने का चांस मुफ्त की पुब्लिसिटी भी मिल रही थी .बस फिर क्या था लोग चल दिए पिकनिक मनाने..
क्या होती है सरकार-लोग ही तो,कौन बनते हैं अफसर लोग ही तो ,कौन होते हैं व्यापारी-लोग ही तो.तो भ्रष्ट कौन हुआ? लोग ही तो,लोग ही तो जनता होते हैं,और जनता में से ही बनते हैं नेता,अफसर और व्यापारी. तो भ्रष्ट कौन हुआ?
जब हम अपना काम इमानदारी से नहीं करते तो हम भ्रष्ट ही हैं.सिर्फ रिश्वत लेना ही भ्रष्टाचार नहीं होता-अनुशासन हीनता,हठधर्मिताऔर बांह मरोड़ के काम करवाना भी भ्रष्टाचार है.यहाँ तो जिसका दाव लग जाए वाही है सिकंदर
अन्ना जी तो किसी और की बात सुनने के लिए तैयार ही नहीं.क्यों भाई? अगर लोकपाल ही भ्रष्ट हो गया तो?उसे क्या आप स्वर्ग से उतार कर लाओगे?
क्या आपने सुना नहीं “पॉवर कोर्रुप्ट्स एंड अब्सोलुते पॉवर कोर्रुप्ट्स अब्सोलुत्ली”अन्ना जी ब्रश्ताचार तभी समाप्त होगा जब हर व्यक्ति ये संकल्प लेगा की वो कभी भ्रश आचरण नहीं करेगा. अगर ये संभव है तो ही भ्रष्टाचार का उन्मूलन संभव हो सकता है. और ये तभी संभव है जब हम शुरुआत अपने आप से करें-हर व्यक्ति-एकनाथ और चाणक्य जैसे और हर व्यापारी-गुरु नानक देव जैसा आचरण करे.नहीं तो ऐसा न हो अन्ना जी कि नाक बंद करने से मुंह तो खुले और खुले का खुला रह जाए.

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