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परछाई

Posted On: 13 Aug, 2014 Others में

जिन्दगीमेरी अभिव्यक्ति

kantagogia

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एक बार मैंने
वक़्त के दायरे में सिमटी
एक ‘तस्वीर’ देखी
मैंने उसे छूना चाहा
मगर वह एक परछाई थी,
मैं उसे पाना चाहा-
मगर वह एक हक़ीक़त थी,
मैंने उसे प्यार करना चाहा –
मगर वह बर्फ की तरह सर्द थी
शायद इसी का नाम
मौत है
जो एक सर्द परछाई है
सदा साथ हमारे रहती है
मगर हक़ीक़त है
मैं आज भी
वक़्त के इन सुनसान
गलियारों में भटक रही हूँ
और
ये सर्द परछाइयाँ
मेरी जिंदगी की
हक़ीक़त बनकर
मेरा पीछा कर रहीं हैं.

-(c) कान्ता ‘दीप’ (१४.६.१९९४)

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