blogid : 12407 postid : 847408

दिल के आँसू पे यों फ़ातिहा पढ़ना क्या

Posted On: 5 Feb, 2015 Others में

अंतर्नादमैंने स्वयं रचा, तुम्हारा अनुभूत सत्य, तुम्हारे लिए ...

Santlal Karun

63 Posts

1122 Comments

दिल के आँसू पे यों फ़ातिहा पढ़ना क्या


दिल के आँसू पे यों फ़ातिहा पढ़ना क्या वो न बहते कभी वो न दिखते कभी

तर्जुमा उनकी आहों का आसाँ नहीं आँख की कोर से क्या गुज़रते कभी |


खैरमक्दम से दुनिया भरी है बहुत आदमी भीड़ में कितना तनहा मगर

रोज़े-बद की हिकायत बयाँ करना क्या लफ़्ज़ लब से न उसके निकलते कभी |


बात गर शक्ल की मशविरे मुख्तलिफ़ दिल के रुख़सार का आईना है कहाँ

चोट बाहर से गुम दिल के भीतर छिपे चलते ख़ंजर हैं उसपे न रुकते कभी |


जिस्म का ज़ख्म भर दे ज़माना मगर ज़ख्म दिल का कभी भी है भरता नहीं

रूह के साथ जाते हैं ज़ख्मेज़िगर सफ्हए-ज़ीस्त से वो न मिटते कभी |


आँसुओं की लड़ी टूट जाने पे भी जो गए याद उनकी है जाती नहीं

याद जलती है सीने में जब बाफ़ज़ा रातें होती नहीं दिन न ढलते कभी |


दर्द ऐसी जगह जो परीशानकुन दिल के दरम्यान ही घर बनाता कहीं

वक्त की चादरों से ढका बेतरह पर ख़लिश से दिलोदम न बचते कभी |


— संतलाल करुण

शब्दार्थ :

सफ्हए-ज़ीस्त = जीवन-पृष्ठ

बाफ़ज़ा = वातावरण पाने पर, माहौल के साथ, खुलापन मिलने पर

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading...
  • Facebook
  • SocialTwist Tell-a-Friend

अन्य ब्लॉग