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पर्वत पर उतरा इन्द्रधनुष

Posted On: 11 Jun, 2014 Others में

अंतर्नादमैंने स्वयं रचा, तुम्हारा अनुभूत सत्य, तुम्हारे लिए ...

Santlal Karun

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पर्वत पर उतरा इन्द्रधनुष


पर्वत पर उतरा इन्द्रधनुष

मैं कैसे रंग बटोरूँ |


धरा नील, नीला अम्बर

गिरि-घाटी नीले-नीले

नयन हो रहे नील-नील

मन नीलकमल-सा झूले

नील निलय की कौंध नील

मैं कैसे नीलम लोढूँ |


हरी दूर्वा दरी चतुर्दिक

दूर-दूर तक फैली

पग सकुचाते, नयन बिछलते

ऐसी रची रँगोली

ऋतु-अभिसारिन सेज-सजी

मैं कैसे प्रीति न जोडूँ |


रूप विविध, आकार विविध

नव रंग नवल आभाएँ

भिन्न-भिन्न आकृतियों में

किरणों की ललित कलाएँ

नव रत्नों के रंगमहल में

कैसे तन-मन घोलूँ |


प्रकृतिमयी श्रृंगार-स्वरूपा

सपनीली-सी दृग-वनिता

खिसकाए कुहरा-पट जागे

मदिर सकामा सुंदरता

ऐसी रचना की श्री को

कैसा सिन्दूर बहोरूँ |


— संतलाल करुण

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