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साथ जीने की सज़ा

Posted On: 21 Aug, 2014 Others में

अंतर्नादमैंने स्वयं रचा, तुम्हारा अनुभूत सत्य, तुम्हारे लिए ...

Santlal Karun

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साथ जीने की सज़ा


चाहतों ने गुलजमीं पे चाँदनी जब छा दिया

आहटों ने बढ़ तराना प्यार का तब गा दिया |


हाथ कैदी की तरह सहमे हुए थे कैद में

कैदख़ाने में किसी ने दिल थमा बहका दिया |


पाँव में थीं बेड़ियाँ, बेदम नज़र, मंजिल न थी

हौसले ने वक्त पे सिर से कफ़न फहरा दिया |


होंठ काँटों के हवाले खूँ से लथपथ थे पड़े

फूल की ख़ुशबू ने टाँके खींचकर महका दिया |


मातमी अंदाज़ में लोगों का जमघट था लगा

साथ जीने की सज़ा ने मौत को झुठला दिया |


— संतलाल करुण

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