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सूख गए मधुवन

Posted On: 23 Jun, 2014 Others में

अंतर्नादमैंने स्वयं रचा, तुम्हारा अनुभूत सत्य, तुम्हारे लिए ...

Santlal Karun

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सूख गए मधुवन


सूख गए मधुवन जीवन के

आशाओं की संध्या उलझी, शून्य क्षितिज के सूनेपन से |


नभ के चल घनश्याम घनेरे

चन्दा-मुख चूमते निगोड़े

झंझा के आते सब सपने, बिखर गए अपलक नयनन के |


विद्युत-बान गँसीले खिंचते

खिंचते ही मन-मृग जा बिंधते

कहाँ छिपे हृद-रेख गहन दे, वे संधान चपल चितवन के |


अंचल पावस-ऋतु बरसाते

गिरि-घाटी रस-पीन सुहाते

ओझल हो गए चटकीले-से, उगते ही सुरधनु उपवन के |


धरती धुलती जावक-जैसी

झड़ी रिमझिमी नूपुर-ध्वनि-सी

उचट गए बरखा के मेले, सच होते सपने सावन के |


— संतलाल करुण

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