blogid : 3669 postid : 788

"फ़सल ख़्वाब की"

Posted On: 15 Nov, 2011 Others में

सांस्कृतिक आयामभारतीय संस्कृति को समर्पित ब्लॉग © & (P) All Rights Reserved

वाहिद काशीवासी

24 Posts

2210 Comments

नींद के खेतों में हम हरदम

फ़सल ख़्वाब की बोते थे,
माँ की गोद में सर रख कर हम
सारी रातें सोते थे;


आज नहीं है कोई सपना रातें
ख़ाली-ख़ाली सी,
बचपन की छोटी रातों में

सपन सजीले होते थे;


अंतरतम में प्यास दहकती किस विधि
तृप्त करूँ इसको,
ओस की बूंदों से हर सुबह हम

बोझिल पलकें धोते थे;


हर ख़्वाहिश पूरी है लेकिन फिर भी सुकूँ
नहीं अब दिल को,
तब दिल इतना बड़ा था कि हर

छोटी ख़ुशी संजोते थे;


आज ये आलम के काटो तो किसी भी
रग में ख़ून नहीं,
छोटी सी झिड़की पर तब हम
घंटों-घंटों रोते थे;


प्यार के बादल का छोटा सा टुकड़ा भी
द्रष्टव्य नहीं,

जिसकी बारिश में हम सबको

सारा वक़्त भिगोते थे;


कहाँ गई वो पौध स्नेह की, कहाँ प्रेम
की हरियाली,
कई बरस तक जिनकी ख़ातिर ये
बंजर खेत भी जोते थे;


लौट नहीं पाया वो बचपन, यौवन लक्ष
हुए क़ुर्बान,
जब घर में राहत पाकर हम
सारे रंजो-ग़म खोते थे;

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (12 votes, average: 4.67 out of 5)
Loading...
  • Facebook
  • SocialTwist Tell-a-Friend

अन्य ब्लॉग