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"तुम कहाँ चले गए?"

Posted On: 13 Feb, 2012 Others में

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वाहिद काशीवासी

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शब्द के मोती भाव-लड़ी में आज पिरो कर लाया हूँ

हृदय पुष्प की वास में भीगा गीत सुनाने आया हूँ

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फिर से क्यूँ आ गया है, ये मौसम अजीब सा,

वो हो गया है दूर जो था क़रीब सा,

तुम कहाँ चले गए – तुम कहाँ चले गए;

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अब तो है ऐसा लगता, मैंऽऽ हूँ कहीं,

दिल है कहीं मेरा और, मेरे पास कुछ नहीं,

तुम कहाँ चले गए – तुम कहाँ चले गए;

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जाने क्यूँ मुझको अब भी, होता है ये एहसास,

जितनी भी दूर जाता हूँ तुम आते हो उतना पास,

तुम कहाँ चले गए – तुम कहाँ चले गए;

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नज़रों से होके गुज़रे, कितने हसीं मगर,

कैसे करूँ बयां के, तुम दिल में गए उतर,

तुम कहाँ चले गए – तुम कहाँ चले गए;

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कृपया रचना का वास्तविक आनंद उठाने के लिए संलग्न विडियो में मेरे स्वर में गीत अवश्य सुनें.

सूचना: यह गीत एवं इससे आबद्ध सभी सामग्री लेखक द्वारा स्वरचित एवं अधिकृत हैं एवं बिना अनुमति इनका किसी भी रूप में उपयोग वर्जित है|

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