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गीत - अकुलाहट की फांस चुभी है

Posted On: 11 Feb, 2014 Others में

शंखनादयदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत | अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् || परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् | धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ||

कुमार गौरव अजीतेन्दु

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अकुलाहट की फांस चुभी है
मन में टीस उठाती है
.
ऊँचाई को तरस रहा दिल
पंछी रोज बुलाते हैं
पंखहीनता के पिंजरे में
अरमां गुम हो जाते हैं
लाचारी डायन सी बैठी
मंद-मंद मुस्काती है
.
घायल भावों की गठरी का
बोझ बढ़ा ही जाता है
उठा-उठा के शब्द थके हैं
छलक पसीना आता है
लंबा रस्ता अजगर दिखता
मंजिल लगे चिढ़ाती है
.
पास लगा है जीवन-मेला
इच्छाएं बलखाती हैं
सवारियाँ जातीं जो उसतक
भरी-भरी सब आतीं हैं
पीड़ा कुछ दिल में रह जाती
कुछ आँखों तक आती है

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