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तरुणाई का जोर दिखाना, तनय गये कैसे तुम भूल॥

Posted On: 16 Jan, 2013 Others में

शंखनादयदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत | अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् || परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् | धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ||

कुमार गौरव अजीतेन्दु

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हिम्मत से घर में घुस कर के, रिपुओं ने घोंपे शर-शूल।
तरुणाई का जोर दिखाना, तनय गये कैसे तुम भूल॥
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जितना चाहा लूट गये वो, धन-दौलत संगे सम्मान।
पुरखों को भी न छोड़ा जो, पाते थे जग से गुणगान॥
दुस्साहस तो देखो तिसपे, नर्तन में सब थे मशगूल।
तरुणाई का जोर दिखाना, तनय गये कैसे तुम भूल॥
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बल के मद में चूर सभी थे, चाहे था उनका अभिमान।
वीरों की पहचान वही है, लड़ जाते जो ले के आन॥
देखो तो अपने दर्पण को, जमा गये हैं मोटी धूल।
तरुणाई का जोर दिखाना, तनय गये कैसे तुम भूल॥
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जंग लगा दी भालों में भी, याद नहीं बरछी-करवाल।
रणवीरों के पूत बताना, हुआ भला क्यों ऐसा हाल॥
जो कल तक थे डरते अब वो, कहते भय सारा निर्मूल।
तरुणाई का जोर दिखाना, तनय गये कैसे तुम भूल॥

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