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सबकुछ पाना असंभव है

Posted On: 12 Feb, 2017 Others में

शंखनादयदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत | अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् || परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् | धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ||

कुमार गौरव अजीतेन्दु

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हम जब किसी व्यवस्था (सिस्टम) से जुड़ते अथवा जुड़ना चाहते हैं तो हमें उसकी मर्यादा/ अपेक्षाओं का भी पालन करना ही पड़ता है। हर संबंध भी अपनेआप में एक व्यवस्था ही है अतः वही बात यहाँ भी लागू होगी। अब ये निर्णय करना अपने हाथ में है कि हम किस या किनमें सहज हो सकेंगे। हर व्यक्ति को अपनी प्राथमिकता समय रहते निर्धारित कर लेनी चाहिए क्योंकि “सबकुछ” एकसाथ पाना असंभव है, हाँ इसका भ्रम अवश्य रखा जा सकता। कुछ मिलेगा तो कुछ छोड़ना भी पड़ेगा। आसपास से लेकर अखबारों तक में अक्सर ऐसी घटनाएँ आँखों के सामने आतीं हैं जहाँ बाहरी तत्वों जैसे “दोस्त” के कारण परिवार टूट जाते हैं। इसका दोषी कौन है? अपने जिस दोस्त के लिए आपने जीवनसाथी को छोड़ा, क्या वह सारी जिंदगी आपको उसकी कमी पूरी कराता रहेगा? यदि हाँ तो फिर वह दोस्त ही आपका जीवनसाथी क्यों नहीं बनाया गया? और अगर नहीं तो उसके लिए अपने जीवनसाथी को छोड़ना क्या आपकी हठधर्मिता नहीं कही जाएगी? एक आम सी बात जो कि फिल्मों से ली गयी है, दुहराई जाती है कि मेरा जीवनसाथी मुझपर शक करता है जब मैं किसी विपरीत लिंगी दोस्त से संबंध रखता /रखती हूँ। मेरा एक सीधा सा प्रश्न है उन सभी लोगों से कि आपने जिस इंसान को, चाहे वह लड़का हो या लड़की, एक भरोसा दिया सात फेरों के रूप में कि आप जीवनभर सिर्फ और सिर्फ उसके ही बन कर रहेंगे, क्या उसे इतना भी बताने का अधिकार नहीं कि वह किन चीजों को नापसंद करता है? आपने उसपर बहुत आसानी से “शक” करने का आरोप लगा दिया लेकिन कभी उसके प्रति अपने समर्पण की समीक्षा की? अपने अंदर झाँक के देखिए कि आपका यह दावा कि आप उससे बहुत “प्यार” करते हैं, यह कितना सही है? प्यार का ये कैसा संसार है आपका जिसमें कोई तीसरा भी महत्व रख रहा? आप अपने जीवनसाथी के प्रति अपने प्रेम को तौल कर देखिए। आप तो उसे अपने एक “साधारण से दोस्त” के आगे छोटा बना रहे। यहाँ सिर्फ यही कहा जा सकता है कि आपका जीवनसाथी यदि आप पर “शक” कर रहा है तो आप भी उससे कोई “प्यार” करनेवाले दूध के धुले नहीं हैं।

मेरा यहाँ यह कहने का अर्थ बिल्कुल भी नहीं है कि हर कोई किसी एक तरीके से ही जीवनयापन करे। अभिप्राय सिर्फ इतना है कि हर चीज को पा लेने की या कहें तो हरम में डाल के रखने की मानसिकता ही जीवन को बर्बाद कराती है। आपको कैरियर भी चाहिए, दोस्त भी चाहिए, जीवनसाथी भी चाहिए, आजादी भी चाहिए, बच्चे भी चाहिए, पुराना परिवार भी चाहिए, ये कैसे होगा? प्रेम पर लंबे-लंबे आलेख, बड़ी-बड़ी बातें कर देना बहुत आसान है लेकिन किसी से सच्चा प्यार कर पाना बेहद कठिन। इच्छा मनुष्य को किस रूप में दास बना रही, खुद बननेवाले को भी पता नहीं चलता। जिसके भी साथ जाइए, अपना शत प्रतिशत देकर जाइए। जिन परिस्थितियों को पसंद नहीं करते, उनमें महज शौक के लिए घुसकर उस रिश्ते को ही गाली देने का आपको कोई नैतिक अधिकार नहीं। लिंग कोई भी हो, हर किसी को अपनी सहजता के अनुसार जीने का हक है। अपनी पसंदीदा बात को किसी खोल में लपेट कर थोपना बहुत निंदनीय। समय दीजिए, समर्पण दीजिए, प्यार दीजिए फिर देखिए आपका वह एक रिश्ता ही आपको किसी अन्य रिश्ते की जरूरत महसूस नहीं होने देगा। अन्यथा मनपसंद संबंध/ हालातों की तलाश में जीवन गुजर जानेवाला है

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