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अन्यायमूर्ति

Posted On: 7 Apr, 2013 Others में

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विजय कुमार सिंघल

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यह शब्द ‘अवकाशप्राप्त न्यायमूर्ति’ अथवा ‘अभूतपूर्व न्यायमूर्ति’ का संक्षेप नहीं है, बल्कि इसका तात्पर्य किसी न्यायमूर्ति का न्याय से विश्वास हट जाने से है। जी हाँ, मैं मार्कण्डेय काटजू की बात कर रहा हूँ। कई लोगों का यह अनुमान है कि इनको किसी पागल या सेकूलर जूं ने काट लिया था, इसलिए इनका नाम ‘काटजूं’ पड़ा था, जो बिगड़कर ‘काटजू’ रह गया है। काटने की यह घटना भले ही हुई हो, लेकिन उनके नामकरण का कारण यह नहीं है। वास्तव में उनके पूरखे कश्मीरी पंडित थे, जो मध्यप्रदेश में जावरा में आकर बस गये। उनके बाबा कैलाशनाथ काटजू प्रख्यात वकील थे, जिन्होंने लालकिले में आजाद हिन्द फौज के सेनानियों पर चले मुकदमे में सेनानियों का बचाव किया था। बाद में वे नेहरू मंत्रिमंडल में कानून मंत्री बने और आगे चलकर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री तथा उड़ीसा और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल भी रहे। उनके सुपुत्र शिव नाथ काटजू इलाहाबाद हाईकोर्ट में न्यायाधीश रहे। उनके भी सुपुत्र ये मार्कंडेय काटजू भी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश पद को सुशोभित कर चुके हैं।

इतनी प्रबल कानूनी पारिवारिक परम्परा होने के बाद भी मैं इन काटजू को अन्यायमूर्ति कह रहा हूँ तो इसके पर्याप्त कारण हैं। पहली बात तो यह कि वे प्रेस परिषद के अध्यक्ष होते हैं। उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे प्रेस की स्वतंत्रता और नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करेंगे। पर लगता है कि वे केवल अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा कर रहे हैं। तभी तो आये दिन एक से एक विलक्षण बयान दागते रहते हैं। एक बार उन्होंने देश की 90 प्रतिशत जनता को मूर्ख बताया था। हालांकि उनके निष्कर्ष से किसी को असहमति नहीं है, लेकिन जो कारण वे समझ रहे हैं, वह सही नहीं है। लेकिन इस बयान का यह अर्थ तो निकलता ही है कि वे स्वयं को उन 90 प्रतिशत में शामिल नहीं मानते, बल्कि 10 प्रतिशत उस विशिष्ट वर्ग में शामिल मानते हैं, जो मूर्ख नहीं है।

फिलहाल इन अन्यायमूर्ति की चर्चा इसलिए की जा रही है कि उन्होंने मुम्बई के बम धमाकों में सह-अपराधी पाये गये अभिनेता संजय दत्त को माफ करने की अपील की है, जिनको सर्वोच्च न्यायालय ने मात्र 5 वर्ष की कड़ी कैद की सजा सुनायी है। अन्यायमूर्ति ने संजय को माफ करने के तीन कारण बताये हैं। आइये इन कारणों की जाँच पड़ताल करें-

1. अपराध के समय संजय दत्त ‘केवल’ 33 वर्ष का मासूम था। वाह, मासूमियत की क्या विलक्षण परिभाषा है! उस समय तक यह मासूम अभिनेता दो शादियां और एक तलाक कर चुका था, एक बच्चा भी पैदा कर चुका था और तमाम फिल्में भी कर चुका था। बम धमाकों के हथियार उसने मासूमियत में नहीं जानबूझकर अपने घर में छुपाये थे और पोल खुलने की संभावना नजर आते ही उनको नष्ट करने का आदेश अपने गुर्गों को दिया था। समझना कठिन है कि उसे किस आधार पर मासूम कहा जा सकता है? अभी कुछ दिन पहले तक ऐसे ही सज्जन 16 साल के बच्चों को शारीरिक सम्बंध बनाने लायक परिपक्व बता रहे थे। अब उससे दूने से भी अधिक आयु के व्यक्ति को मासूम बता रहे हैं।

2. संजय दत्त ने पिछले 20 वर्ष में बहुत भुगता है। क्या भुगता है? उसने कई फिल्में की हैं, तीसरी शादी की है और दो बच्चे भी पैदा किये हैं। इतने कष्ट भुगते हैं! वाह!! अगर यही भुगतना कहा जाता है, तो फिर मजा लेना किससे कहते हैं? उससे ज्यादा तो उन 300 लोगों के परिवारों ने भुगता होगा, जिनकी मौत उन धमाकों में हुई। इन अन्यायमूर्ति को उनकी चिन्ता बिल्कुल नहीं है।

3. संजय दत्त के परिवार ने देश की बहुत सेवा की है। क्या देश की तथाकथित सेवा करने वाले को अपराध करने का भी अधिकार मिल जाता है? इस हिसाब से तो सभी देशसेवकों के ऊपर से सभी मामले हटा लेने चाहिए और उनको खुलकर अपराध करने और देश को लूटने का अधिकार दे देना चाहिए।

स्पष्ट है कि इन अन्यायमूर्ति को न्याय से कुछ लेना-देना नहीं हे। वे केवल एक कांग्रेसी परिवार के चिराग को उसके अपराध की सजा से मुक्त कराना चाहते हैं। वैसे स्वयं संजय दत्त ने माफी की अपील करने से मना कर दिया है, फिर भी ये अन्यायमूर्ति राष्ट्रपति को इस हेतु पत्र लिख चुके हैं। ‘मुद्दई सुस्त गवाह चुस्त’ वाली कहावत यहाँ चरितार्थ हो रही है।

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