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मौत का दुख

Posted On: 1 Nov, 2010 Others में

KADLI KE PAAT कदली के पातचतुर नरन की बात में, बात बात में बात ! जिमी कदली के पात में पात पात में पात !!

R K KHURANA

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मौत का दुख

राम कृष्ण खुराना

घर में बडा होना भी पाप है ! आफिस से आओ तो घर की चिंता ! इस मंह्गाई में घर चलाना कितना मुशिकल है ? वो तो भला हो वर्मा जी का जिन्होंने पिता जी की “डेथ आन ड्यूटी” दिखा कर पेंशन लगवा दी है ! थोडा सा सहारा मिल जाता है ! वरना……..!

आफिस से थके हारे घर में आओ तो घर का सामान जुटाने दौडो ! नमक-तेल के चक्कर ने घनचक्कर बना दिया है ! त्यौहार मनाना तो दूर दो जून की रोटी के भी लाले पडे हुए हैं ! 15 तारीक के बाद से ही जेब खनकने लगती है ! यदि कोई बिमारी-रिश्तेदारी टपक पडे तो राम ही मालिक ! खेलने खाने की जवानी इन्हीं धंधों में खप रही है ! पिताजी थे तो कोई चिंता नहीं थी कहां से क्या प्रबन्ध करते हैं, यह उनका सिरदर्द था ! हम तो आर्डर देने के आदी थे !

थका-हारा दफ्तर से आया हूं ! लंच बाक्स मेज पर पटक कर मां को चाय बनाने को कहा ! मां रसोई में चली गई ! मैं धम्म से खाट में धंस जाता हूं ! बूट उतार कर उसमें जुराबें खोंस देता हूं ! आज शरीर टूटा सा है ! आफिस में भी सारा दिन मूड खराब रहा ! कुछ भी करने को दिल नहीं करता था ! फाईल उठाता तो लगता जैसे उसमें मनों वज़न हो !

ठांय ………!

दरवाजा खुला होने के कारण पटाखे की आवाज़ अन्दर आ जाती है !

प्रत्येक दीवाली की तरह पिछ्ली दीवाली को भी पिता जी पटाखों का ढेर उठा लाए थे ! पप्पू को गोदी में उठाकर तथा उसे दिखा-दिखा कर पटाखे चलाते ! फुलझडी जला कर उसके हाथ में पकडा देते ! वह थोडा-थोडा डरता व आनन्द लेता हुआ हो-हो करके फुलझडी को उपर-नीचे घुमाता और खुश होता ! पिताजी कभी बम चलाते तो कभी चकरी ! पप्पू जब उछल-उछल कर तालियां बजाता तो पिता जी भी खुशी से झूम उठते ! ऐसे ही हंसी खुशी के वातावरण में दीवाली कब चली गई पता ही न चला !

ठांय ……..!

बाहर किसी बच्चे ने पटाखे के पलीते को आग दिखा दी थी !

मेरा ध्यान टूट जाता है ! परसों दीवाली है ! सभी घरों में चहल-पहल है ! परंतु हमारे यहां मातम का सा सन्नाटा है ! भीतर भी, बाहर भी ! इसी वर्ष पिता जी की मृत्यु हुई है ! उनकी मृत्यु के पश्चात यह पहली दीवाली है ! भगवान भी बडा बेरहम है ! यदि उसे मेरा ख्याल नहीं था तो भोली-भाली मां का तो ख्याल किया होता ! 10 वर्ष की गुड्डी पर तो निगाह डाली होती ! साढे चार साल के पप्पू पर तो तरस खाया होता !

“ठांय…….!”

तभी पप्पू मेरे सामने आ जाता है ! वह फिर पटाखों की मांग करता है ! मैं उसे बुरी तरह से डांट देता हूं ! मैं तो पहले ही सारे दिन का परेशान बैठा हूं ! पिताजी सिर पर नहीं हैं ! इसे पटाखों की सूझ रही है ! लोग क्या कहेंगे, बाप की मौत का ज़रा सा भी गम नहीं ?

पप्पू चकित सा निर्मिमेष मेरी ओर देखता खडा रहता है ! मां चाय का कप लेकर आती है तथा पप्पू को इस प्रकार खडा देखकर बडे प्यार से पूछ्ती है – “क्या बात है पप्पू ?”

मां का ममता भरा स्वर सुनकर जैसे लावा सा फूट पडता है ! वह अपने नन्हें से हाथ से मेरी ओर इशारा करता है ! उसकी आंख में दो बूंद आंसू टपक पडते हैं ! वह गुस्से से भर कर कहता है – “मां, भैया बहुत गन्दे हैं !” अत्यधिक क्रोध के कारण उसका चेहरा तमतमाने लगता है ! गला अवरुध हो जाता है ! थोडी सांस लेकर वह फिर कहता है – “भैया बहुत गन्दे हैं ! मुझे पटाखे लेकर नहीं देते !”

फिर मां की ओर मुड कर कहता है – “मां, तुम भी बहुत गन्दी हो ! तुम झूठ बोलती हो कि पिताजी टूर पर गए हैं ! सभी मोहल्ले वाले कहते हैं कि पिता जी मर गए हैं !”

मां उसकी बात सुनकर उसे सीने से चिपटा लेती है ! मां की आंखों से टप-टप आंसू गिरने लगते हैं !

पप्पू मां की पकड ढीली करके फिर पूछता है – “मां पिता जी जिन्दा नहीं हो सकते ? भैया तो जिन्दा हैं ! पर बहुत गन्दे हैं ! मुझे पटाखे नहीं लेकर देते ! आज पिता जी होते तो मैं बन्दूक लेता !”

पप्पू का यह वाक्य मेरे दिल पर हथौडे सा लगा ! मैं उस भूत की याद में इस वर्तमान को भुला बैठा था ! पिताजी के मरने का दुख शायद मुझे भी इतना नहीं हुआ होगा जितना इस मासूम हृदय को हुआ है !

मैं चाय का प्याला मेज पर रख देता हूं ! दौड कर पप्पू को गोद में उठा लेता हूं ! उसके गालों, माथे और गर्दन को बदहवास सा चूमने लगता हूं ! पप्पू मेरे इस अप्रत्याशित व्यवहार को  समझ नहीं पाता ! मैं उसे उसी प्रकार उठाये-उठाये ही बाहर की ओर दौड पडता हूं ! मां मुझे बुलाती रहती है मां कहती है चाय तो पी जाओ, ठंडी हो जायगी ! परंतु मुझे मां की आवाज़ सुनाई नहीं देती ! मैं नंगे पांव ही पप्पू को उसी प्रकार उठाए बाज़ार की ओर दौड पडता हूं !

उसे बन्दूक दिलवाने के लिए !

राम कृष्ण खुराना

9988950584

khuranarkk@yahoo.in

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