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कितना आसान है मूर्ख बनाना !

Posted On: 7 Jul, 2010 Others में

KADLI KE PAAT कदली के पातचतुर नरन की बात में, बात बात में बात ! जिमी कदली के पात में पात पात में पात !!

R K KHURANA

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कितना आसान है मूर्ख बनाना !

एक कहावत है कि दुनिया झुकती है, झुकाने वाला होना चाहिए ! यदि इस कहावत का नवीनीकरण कर दिया जाय तो हम ऐसे भी कह सकते हैं कि दुनिया बेवकूफ है, बेवकूफ बनाने वाला होना चाहिए ! इस युग में हम जिस ओर भी दृष्टि घुमाकर देख लें हमें यही दिखाई देगा कि प्रत्येक व्यक्ति दूसरे को बेवकूफ बनाने का प्रयत्न करता है !
आए दिन समाचार पत्रों में तरह-तरह के विज्ञापन छपते रहते हैं ! एक विज्ञापन था – “हमेशा एक सा समय देने वाली घडी खरीदिए ! कीमत केवल 125/- रूपये ! एक सज्जन ने फटाफट मनीआर्डर भेज दिया ! कुछ समय पश्चात उनको एक पार्सल मिला जिसमें 10 रूपये की बच्चों वाली घडी थी ! उन्होंने विज्ञापन देने वाले पर दावा ठोक दिया ! घडी विक्रेता ने कोर्ट में अपनी सफाई में समाचार पत्र में छ्पा अपना विज्ञापन जज के सामने रख दिया और बोला – “क्या मैंने विज्ञापन में नहीं लिखा था कि हमेशा एक सा समय देने वाली घडी ! देख लीजिए इस घडी की सूईंया हमेशा एक जगह पर ही ठहरी रहती हैं और एक ही समय देती हैं !”

यहां मुझे एक बात याद आ गई ! बात उस समय की है जब मैं मुम्बई में था ! मैं अपने चाचा जी के साथ एक सज्जन से मिलने गया ! वे बहुत बडे सेठ थे ! हमें बडे आदर से बिठाया झट से घंटी बजाई और नौकर के आने पर उसी तेजी से कहा – “इनके लिए दो स्पेशल कप में चाय लाओ !”

मैं बहुत देर तक उनके इस वाक्य पर विचार करता रहा कि सेठ ने स्पेशल कप के लिए कहा है या स्पेशल चाय के लिए ! चाय आने पर मेरी शंका का समाधान हो गया ! मैंने देखा के वाकई कप बहुत सुन्दर व डिज़ाईनदार थे परंतु उस कप में चाय आधी व चालू ही थी ! मुम्बई में दो तरह की चाय चलती है ! एक स्पेशल व दूसरी चालू ! बाद में जब मैंने अपने चाचा जी से इस बारे में बात की तो उन्होंने बताया कि इस सेठ के पास पैसा तो बहुत है परंतु वह एक नम्बर का कंजूस है ! यह इसी तरह से लोगों को मूर्ख बनाता था ! लोग बाग स्पेशल के नाम से प्रभावित हो जाते थे कि उनके लिए विशेष चीज़ मंगाई जा रही है ! उनके मन में वही ख्याल बना रहता था तथा वो आधा कप चालू चाय भी उन्हें स्पेशल का आभास देती थी ! मूर्ख बनाने का कितना मनोवैज्ञानिक ढंग है !

मनोविज्ञान की बात चली है तो मैं आपको यह भी बता दूं कि आजकल मनोविज्ञान का कितना दुरूपयोग होता है ! आप बाज़ार में जूते खरीदने के लिए चले जाईये ! जिस बूट या चप्पल को भी आप हाथ लगायेंगें उसका मूल्य होगा 199 रूपये या 499 रूपये ! जब ग्राहक को यह बताया जाता है कि जूते का मूल्य 499 रूपये है तो ग्राहक के मस्तिष्क में 400 रूपये यानि कि 4 का पहाडा ही घूमता है ! वह यह नही सोचता कि 500 रूपये में केवल एक रूपया ही कम है परंतु जब वो जूता पैक करवा कर पैसे देने लगता है तो उसे मालूम पडता है कि उसका पांच सौ का नोट निकल गया ! तब तक जूता पैक करके लिफाफा उसके हाथ में पकडा दिया जाता है !

मूर्ख बनाने की एक और घटना याद आ गई ! इतवार का दिन था मैं दिल्ली में चांदनी चौक में घूम रहा था ! तभी मेरी निगाह एक फलों का जूस बेचने वाले की रेहडी पर टंगे हुई बोर्ड पर पडी ! मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था – “फलों के ताज़े रस की गारंटी !”

जब मैंने बोर्ड पहली बार पढा तो मैंने उस वाक्य का अर्थ – “ताज़े फलों के रस की गारंटी से लिया !” परंतु जब मैंने दोबारा ध्यान से उस तख्ती पर लिखे वाक्य को पढा तो मुझे अपनी बुद्धि पर तरस आ गया ! मैंने अपना माथा पीट लिया ! उसने तो साफ-साफ लिखा था – “फलों के ताज़े रस की गारंटी 1” अर्थात फल चाहे बासी या गले-सडे ही हों परंतु उनका रस ताज़ा था ! अर्थात उसी समय ताज़ा निकाल कर देने की गारंटी थी ! जब मैं रेहडी के पास गया तो देखा कि सचमुच फल बासी व गले हुए थे ! एक शब्द के हेर-फेर से कितने हास्यास्पद ढंग से जनता को “पब्लिक” समझ कर बेवकूफ बनाया जा रहा था ! मज़े की बात तो यह थी कि लोग बडे चाव से उसके बासी फलों के “ताज़े” रस को चटकारे ले-ले कर पी रही थे !

लोगों को बेवकूफ बनाने का एक और ढंग व्यापारियों ने ढूंढ निकाला है ! आपको बहुत सी वस्तुयें ऐसी मिलेंगी जिस पर लिखा होगा “मेड ऐज़ जापान” या मेड ऐज़ रशिया” ! इसका सही मतलब जापान या रूस जैसी बनी होता है न कि जापान या रूस में बनी ! अर्थात जैसे जापान वालों ने बनाया उसी की नकल करके भारत में निर्मित की गई ! (अब नकल करने में तो भारतीय बहुत चतुर हैं !) परंतु जल्दी में लोग इस का अर्थ जापान में बनी से ही लेते हैं तथा आयातित (इम्पोर्टेड) समझ कर अधिक पैसे देकर भी खरीद लेते हैं !

मनोविज्ञान पर मुझे एक पुरानी कहानी याद आ गई ! एक बार एक निहत्था अपराधी एक छोटे से कमरे में घिर गया ! कमरे में एकमात्र निकलने के रास्ते पर पुलिस इंसपेक्टर पिस्तौल तानकर उसे “हैंडस अप” का आदेश दे चुका था ! उस अपराधी ने वहां भी मनोविज्ञान का सहारा लिया ! उसने एकदम चौंक कर सीधे खडे होकर बाहर की ओर देखकर कहा “अरे !”

पुलिस ईंसपेक्टर भी उस “आश्चर्यजनक” वस्तु को देखने के लिए पीछे मुडा जिसको देखकर अपराधी ने चौंक कर “अरे” कहा था ! बस यहीं पर ईंसपेक्टर मात खा गया ! जब ईंसपेक्टर पीछे की ओर मुडा उसी समय अपराधी ने फुर्ती दिखाई ! झपटा मारकर पिस्तौल छीन ली ! वास्तव में अपराधी ने चौंकने का केवल नाटक किया था ! यह मनुष्य का स्वभाव है कि वह प्रत्येक आश्चर्यजनक वस्तु के देखने की जिज्ञासा रखता है ! और उसको अतिशीघ्र शांत करने का प्रयास करता है !

मनोविज्ञान के पश्चात एक और ढंग भी है लोगों को मूर्ख बनाने का ! वो है इश्वर व धर्म के नाम पर मूर्ख बनाने का ! आजकल भी ढोंगी साधुओं की कमी नहीं है ! एक ढूंढों तो हज़ार मिलते हैं मोह माया से दूर रहने का पाठ पढाने वाले सांसारिक मोहमाया के दलदल में लिप्त साधु ! मैं आपको बहुत पुरानी बात बताने जा रहा हूं ! तब टी वी नहीं होते थे ! ट्रांज़िस्टर का जमाना था ऐसे ही एक साधु महाराज मुझे मिले ! उनके पास मरफी कम्पनी का बडा ही सुन्दर ट्रांज़िस्टर था ! मैं गलती से उनसे पूछ बैठा – “आप तो महान आत्मा हैं ! सासारिक मोहमाया से निर्लिप्त, संसार के मिथ्या आडम्बरों से बहुत दूर ! फिर आपके पास इस ट्रांज़िस्टर का क्या काम ?”
साधु महाराज जी ने छूटते ही उत्तर दिया – “क्यों, मेरे सीने में दिल नहीं है क्या ?” मैं अवाक तथा निरूत्तर हो गया ! मुझे मानना पडा कि उनके सीने में भी दिल है !

वास्तव में दिल और दिमाग उनका भी वही होता है जो आम आदमी का ! आप रोज़ टी वी और अखबार में इस बारे में देखते व पढते ही होंगे ! केवल उनके भगवा कपडे पहन लेने से हर आदमी मूर्ख बन जाता है !

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