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जग बौराना : हम संतन से का मतलब !

Posted On: 2 Oct, 2010 Others में

सत्यमेव .....हास्य व्यंग्य एक्सप्रेस

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लेखक – नरेश मिश्र


पांच दस नम्बरी, महापापी थे । अपराध करने से जी अघा गया । पुलिस के डंडे ने पीठ से साक्षात्कार किया, बुढ़ापा दस्तक देने लगा तो पांचों पापी गेरूआ वस्त्र पहन कर संत बन गये । तीर्थयात्रा को निकले ये संत एक गांव से गुजर रहे थे तो गांववालों की आवाज सुन कर भीड़ के नजदीक चले गये । एक झाड़ी के पास गांववाले साही को लाठियों से पीट रहे थे । साही के बदन पर कांटे होते हैं । लाठियां कांटे पर चटक रही थीं लेकिन साही का बाल बांका नहीं हो रहा था । उन संतों में जो महापापी था, उसने गांव वालों की ओर देखकर कहा – साही मरै मूड़ के मारे, हम संतन से का मतलब (साही सिर पर चोट करने से मर जाती है लेकिन हम संतों को इस बात से क्या लेना देना) । गांववालों ने संत के उपदेश का पालन करते हुये साही के सिर पर लाठियां बरसाईं, साही टें हो गयी ।


राम जन्मभूमि-बाबरी ढांचा विवाद का फैसला आने से पहले और बाद में हमने ऐसे ही मीडिया माहिर संतों के दर्शन किये । प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रिानिक मीडिया में इनदिनों ऐसे ही संतों की भरमार है जो जमालो की तरह आग लगा कर दूर से तमाशा देखते हैं । अखबार का सर्कुलेशन बढ़ना चाहिये, चैनल की टीआरपी रैंकिंग बढ़नी चाहिये । मुल्क का क्या होगा – इससे मीडिया को कुछ लेना देना नहीं । बर मरै चाहे कन्या, हमे दक्षिणा से काम ।


माननीय इलाहाबाद की लखनऊ खंडपीठ का बाबरी विवाद पर फैसला आने की खबर मिलते ही मीडिया की बांछें खिल गयीं । बिल्ली के भाग से छींका टूटा । ऐसा सुनहरा मौका बार-बार नहीं आता । प्रयागराज में कुंभ मेला बारह साल बाद जुड़ता है ।


मीडिया मुगलों को एहसास हुआ कि बेहद संगीन मामला है, मुल्क के आसमान पर संकट के बादल गहरा रहे हैं । बादल फटते हैं तो कयामत आती है । आसमान ही फट पड़ा तो क्या होगा । इस मुल्क के लोग तो जाहिल, गंवार और बर्बर हैं । धर्मनिरपेक्षता खतरे में पड़ गयी है । इस मौके पर लोकतंत्र के चौथे खंभे को टट्टर की आड़ से ऐसा तीर चलाना चाहिये कि सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे ।


सेकुलर मीडिया ने जंगल में रोने वाले सियारों को शर्मिंदा कर दिया और वे एक स्वर में हुआ हुआ करले लगे । इस सियार रोदन प्रतियोगिता का चैम्पियन कौन था, निशाने पर कौन साम्प्रदायिक तत्व थे, इसका फैसला हम पाठकों पर छोड़ देते हैं ।


बहरहाल कुछ नमूने तो पेश करने ही पडेंगे । टाइम्स नाऊ चैनल के अर्णव गोस्वामी के चैनल में भाजपा नेता और पेशे से माननीय सुप्रीम कोर्ट के वकील रविशंकर प्रसाद तशरीफ लाये । गोस्वामी ने उन्हें देख कर कमर के नीचे चोट करने का मन बनाया । ऐसे मौकों पर खास तौर से अंग्रेजी सेकुलर मीडिया के निशाने पर भाजपा का होना लाजिमी है । गोस्वामी ने रविशंकर से पूछा – फैसला आने पर भाजपा का अगला कदम क्या होगा ?

रविशंकर ने छूटते ही सवाल किया – आपने मुझे बतौर वकील परिचर्चा में बुलाया है । अगर आप चाहते हैं कि मैं भाजपा नेता के रूप में जवाब दूं, तो मुझे कुछ नहीं कहना है । आप मुझे गलत रास्ते पर जाने के लिये उकसा रहे हैं ।


गोस्वामी ने होशियारी से अपना बचाव करते हुये कहा – मेरा यह मकसद नहीं था । रामजन्मभूमि के लिये रथयात्रा भाजपा नेता अडवाणी ने की थी । बाकी सारे पैनलिस्ट मुस्कुरा रहे थे । उस वक्त सारे सेकुलर पाखंडियों को लग रहा था कि अदालत का फैसला बाबरी मस्जिद के पक्ष में आयेगा  इसलिये लगे हाथ भाजपा, आर. एस. एस., विश्व हिंदू परिषद को लपटने में कोई हर्ज नहीं है । इसके एवज में धर्मनिरपेक्षता का गोल्डमेडल हासिल होगा । लेकिन रविशंकर, अर्णव गोस्वामी से ज्यादा तेजतर्रार निकले । उन्होंने कहा – मुकद्दमें का फैसला माननीय सुप्रीम कोर्ट से हो जाने दीजिये । इस लम्बी बहस का जवाब थोड़े में नहीं दिया जा सकता है ।


नमूना नंबर दो । जी न्यूज के महान बुध्दिजीवी पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेई ने डाक्टर मुरली मनोहर जोशी से पूछा – अदालत का फैसला आने के बाद क्या होगा ।


जोशी जी ने कहा – फैसला आयेगा तब देखा जायेगा आप अभी से अफवाह और सनसनी क्यों फैला रहे हैं ।


फैसला आया तो सारे सेकुलर पाखंडियों के कलेजे पर सांप लोट गया । आगे का कीचड़ उछालू प्लान मुलतवी करना पड़ा । टी आर पी और धंधे का भी बड़ा नुकसान हुआ । अदालत ने मान लिया था कि रामजन्मभूमि की पहचान उसी जगह के रूप में की जाती है जहां बाबरी ढांचा खड़ा था । उस जगह से मूर्तियां हटायीं नहीं जा सकती हैं ।


सेकुलर मीडिया को देख कर खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की कहावत याद आती है । देश की हिंदू-मुस्लिम जनता ने बड़े धीरज और शांति से फैसला सुना । उसने देश के सेकुलर पाखंडियों को आईना दिखा दिया । जाहिर हो गया कि अगर सेकुलर मीडिया और धर्मनिरपेक्ष पाखंडी नेता खामोश बैठे रहते तो भी देश का जनमानस इतना समझदार है कि वह अदालत के फैसले पर भड़क कर सड़कों पर नहीं आता । देश के आम लोग मीडिया और सेकुलर पाखंडी नेताओं से ज्यादा समझदार हैं ।


एक टिटिहरी आसमान की तरफ पंजे उठा कर पीठ के बल लेटी थी । उसे भरोसा था कि अगर आसमान गिरेगा तो वह उसे अपने पंजे पर रोक लेगी । टिटिहरी की गलतफहमी उसे मुबारक । ज्यादा क्या कहें, सिर्फ यही अर्ज करनी है कि इन पांखडी लीडरों और मीडिया माहिरों का नकाब हटा कर उनका असली चेहरा देखने की जहमत उठायें । ये वोटबैंक और पैसे के लिये कुछ भी करने को उधार खाये बैठे हैं ।

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