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मानव जीवन का उद्देश्य

Posted On: 24 Dec, 2016 Others में

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कोमल

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मैं एक संगोष्ठी के लिए गई थी। वहाँ यह चर्चा चल रही थी कि भगवान ने हमें यह मनुष्य जीवन क्यों प्रदान किया है? आखिर हमारे जीवन का असल उद्देश्य क्या है ?
मैंने कई मित्रों से पूछा, “क्या आप जानते हैं कि आपके जीवन का मुख्य उद्देश्य क्या है?”
एक ने कहा कि पैसा, दुसरे ने कहा संवर्धन, तीसरे ने कहा कि बच्चे, और चौथे ने बोला परिवार। अन्य सभी ने अपनी-अपनी निष्ठा और समझ के अनुसार उत्तर दिया।
उसके बाद प्रश्न उठा, “आप सबको यदि अपनी इच्छानुसार सब मिल जाए तो क्या होगा?”
जवाब मिला, “जीवन में सुख, शांति, सद्भाव, आत्म-विश्वास और स्वतंत्रता। ”
उसके बाद प्रश्न आया, ” क्या आप उन सभी प्रिय वस्तुओं के प्राप्ति से संतुष्ट हैं?
उत्तर मिला, “नहीं, बिल्कुल नहीं। ”
” तो अब क्या समस्या है? आपके पास वह सबकुछ है जो कुछ भी आप अपने जीवन में चाहते हैं। अब, आप खुश क्यों नहीं हैं?’, मैंने पूछा।
सबने एक स्वर में उत्तर दिया, “हमें अब प्राप्त वस्तुओं के खो जाने का भय सताता है। आज जो कुछ भी हमारे पास है कहीं वह सब हमसे छिन ना जाए।
मैंने कहा, ” अब सोचो कि दिक्कत कहां है?”
सभी जानते हैं कि मनुष्य जीवन के तीन प्रमुख चरण हैं – बचपन, जवानी, और बुढ़ापा। बचपन में हमारा मन इतना विकसित नहीं होता है। एक बच्चा अपने जीवन को सहजता से व्यतीत करता है। किसी भी कार्य को करने के पीछे उसका कोई उद्देश्य नहीं होता , वह सिर्फ अपनी सरलता और मासूमियत से ही प्रत्येक कार्य करता है। वह केवल अपने माता पिता, अपने आसपास के माहौल से जो भी देखता है उसी का अनुसरण करता है। अगर कहीं भी उसे कोई लुभावनी वस्तु दिख जाए तो वह उसे पाने की जिद करता है। जब वह वयस्क हो जाता है, तब उसे मनुष्य जीवन के कई पहलुओं का सामना करना पड़ता है। जर, जोरू, और जमीन ही उसके जीवन का मुख्य मकसद बन जाता है और जैसे जैसे समय गुज़रता जाता है, वह इतनी तेजी से बुढ़ापे की ओर अग्रसर हो जाता है कि उसे समय का बोध ही नहीं हो पाता कि कब उसका शरीर जीर्ण शीर्ण हो गया और वह अपनी दैनिक जरूरतों को भी पूरा करने में सक्षम नहीं रहा। अब उसके पास मृत्यु का इंतज़ार करने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं रह जाता है।
वास्तव में, यह इन्सान का प्राकृतिक स्वभाव है कि यदि उसे एक वस्तु प्राप्त हो जाए, तो उसमें दुसरे को पाने की लालसा पैदा हो जाती है। दूसरी के मिल जाने के बाद, तीसरी को पाने की लालसा उसके मन को घेर लेती है। इस प्रक्रिया में मनुष्य उलझता चला जाता है और वह मायाजाल में फंस जाता है। यह क्रम तब तक चलता रहता है जब तक हम परम सत्य को पहचान नहीं लेते। श्री मद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार करना है। मनुष्य की आत्मा परम सत्य को जानने के बाद जीवन मुक्ति की अधिकारी हो जाती है और मनुष्य इस संसार समुद्र से पूर्णतया मुक्त होकर पुनः संसार चक्र में नहीं फँसता। अध्यात्म हमारे जीवन की दिशा ही बदल देता है और हमें आत्मा की उन ऊँचाइयों तक ले जाता है जो अकथनीय है। आत्मबोध ही केवल ऐसा मार्ग है जिसके जरिये हम अपना जीवन अधिक कुशलतापूर्वक और प्रभावी ढंग से अपना जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

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