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अन्तर्राष्ट्रीय भद्र लोक के सर्टिफिकेट की लोलुपता मोदी में क्यों

Posted On: 8 May, 2015 Others में

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kpsinghorai

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अन्तर्राष्ट्रीय भद्रलोक में मान्यता पाना देश के अन्दर गौरव हासिल करने का अचूक फार्मूला है। सदियों तक गुलाम रहने के कारण भारत ने जो आत्मबोध खोया उसकी भरपाई आजादी के इतने वर्षों बाद तक नहीं हो पायी है। उधार के चिंतन पर अग्रसर रहना यहां की कमजोरी या विशेषता जो कहें नियति है जबकि अन्तर्राष्ट्रीय भद्रलोक का कोई मूल्यांकन या धारणा निरपेक्ष अथवा वस्तुपरक नहीं होती। अन्तर्राष्ट्रीय भद्र लोक शैतानी ताकतों का गिरोह है जो अपनी वैचारिक सम्मोहन शक्ति से उपनिवेशवादी स्वार्थों के लिये दुनिया को इस्तेमाल करता है। ग्लोबल पुरस्कार जैसी मान्यतायें इसके वितंडा का हथियार है। जिनके इस्तेमाल से इसने सोवियत संघ के टुकड़े टुकड़े कर दिये। सूचना साम्राज्यवाद इस भद्रलोक के शैतानी पंजे का वर्तमान में सबसे मजबूत नाखून है। तथ्यों को संदर्भ से काटकर, तोड़ मरोड़ कर और अविश्वसनीय निष्कर्षों से जोड़कर यह भद्रलोक दुनिया को किस तरह गुमराह करता है इसके हर रोज सैकड़ों उदाहरण गिनाये जा सकते हैं।
बहरहाल खबर यह है कि इन वैश्विक श्रीमानों की सबसे बड़ी पत्रिका यानि अमेरिकी मैगजीन टाइम में तीसरी बार हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कवर पेज पर प्रकाशित हुए हैं। यह पत्रिका कितनी विश्वसनीय है इसके लिये ध्यान दिलाना चाहते हैं कि पटना के जिस कलक्टर के बारे में कुछ वर्ष पहले इसने यह छापा था कि बाढ़ नियंत्रण में उसने करिश्माई क्षमता का प्रदर्शन किया है। वह कलेक्टर बाद में बाढ़ राहत के बजट में भारी गबन की वजह से जेल पहुंचा। उसकी अब मौत हो चुकी है। इसलिये उसका नाम लिखना शील के खिलाफ होगा। बहरहाल टाइम मैग्जीन भारत जैसे किसी दूसरे देश के नेता पर लट्टू होने का दिखावा करे तो समझो दाल में कुछ काला है। मनोवैज्ञानिक ब्रह्म्ïाास्त्र जितना कारगर होता है उतना कारगर हथियार दुनिया में कोई नहीं हो सकता यह तथ्य प्रपंची अन्तर्राष्ट्रीय भद्र लोक ने अपनी कारगुजारियों से बखूबी स्थापित कर दिखाया है। मनोवैज्ञानिक ब्रह्म्ïाास्त्र जब किसी को भेदता है तो दर्द होने की बजाय नशीली बेखुदी उसके दिमाग पर तारी हो जाती है जिसका अनुभव ऊपरी तौर पर मीठी झपकी देने वाला होता है लेकिन जो समाज और देश इसकी गिरफ्त में आया समझो उसका बेड़ा गर्क हो गया।
जो भी हो फिलहाल हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस टाइम मैग्जीन को दो घंटे लंबा इंटरव्यू दिया जिसमें उन्होंने सवालों के उत्तर हिन्दी में दिये। यह जानकारी देकर उनके मीडिया मैनेजरों ने इस इंटरव्यू का आभा मंडल और चमकदार बनाने की कोशिश की है। उक्त साक्षात्कार में नरेन्द्र मोदी ने डींग हांकी कि भारत दुनिया में सबसे तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्था का लाइट पोस्ट बन गया है। दूसरी ओर कुछ ही समय पहले खुशहाली सूचकांक जारी हुआ है जिसमें बताया गया है कि भारत 158 देशों में इस सूचकांक में 117वें स्थान पर है और यह खुशहाली के मामले में पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी पीछे है। उधर अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष ने भारत द्वारा नये मानकों पर आंकलित की गयी अपनी जीडीपी दर को संदिग्ध माना है और इसे लेकर भारत सरकार से कुछ स्पष्टीकरण मांगे हैं।
एक संयोग की ओर इस संदर्भ में ध्यान दिलाना चाहते हैं। सोवियत संघ के विघटन में अमेरिकी मोहरे की भूमिका अदा करने वाले उसके अंतिम राष्ट्रपति गोब्र्याचोव को जब सब कुछ करने धरने के बाद जनमत संग्रह का सामना करना पड़ा तो उन्हें चुका हुआ मानकर अमेरिका ने उनसे मुंह मोड़ लिया और सोवियत संघ को मदद देने के जो वायदे उसने किये थे उन्हें पूरा करने से साफ मुकर गया। गोब्र्याचोव हताश थे लेकिन अमेरिका से उलाहना देने की स्थिति में भी नहीं रह गये थे। इसी बीच जनमत संग्रह के पूर्व अनुमानों के बारे में खबरें आयीं जिनमें कहा गया कि सोवियत संघ में कम्युनिस्ट शासन की बहाली के आसार बन रहे हैं। इन खबरों से अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के पैरों तले की जमीन खिसक गयी। उन्होंने अपना रुख तत्काल बदला और गोब्र्याचोव के साथ शिखर वार्ता इस आभास को देते हुए फिक्स कर दी कि अगर गोब्र्याचोव के हाथ में सोवियत संघ की सत्ता बनी रही तो सोवियत जनता की सारी मुश्किलें दूर करने के लिये अमेरिका दोनों हाथों से उसकी मदद करेगा। सोवियत जनता पर इस मनोवैज्ञानिक मोहपाश का जो प्रभाव हुआ वह सर्वविदित है लेकिन सोवियत हित में इसके नतीजे कितने उल्टे निकले यह बात अब इतिहास में दर्ज हो चुकी है। अगर पुतिन जैसा नेतृत्व रूस को न मिला होता तो वह अपनी पूरी धाक गंवाकर अभी तक अमेरिका का दुमछल्ला भर बना रह गया होता और उसकी दशा गरीबी, बेरोजगारी व भुखमरी के नाते बहुत दयनीय हो गयी होती। अमेरिका जब किसी दूसरे देश के नेता पर जिसे वह अपना चारागाह समझता हो मेहरबान होने लगे तो समझो कि उस देश की किस्मत अच्छी नहीं है। क्या मोदी पर अमेरिका की मेहरबानी गोब्र्याचोव के जमाने में सोवियत संघ पर उसकी हुई नजरे इनायत से जोड़कर देखी जानी चाहिये।
16वीं लोकसभा चुनाव के पहले नरेन्द्र मोदी को जिस तरह मार्केटिंग गुरुओं ने नाटकीय ढंग से राजनीतिक रंगमंच पर पेश किया था उससे वे अïवतारी पुरुष से उस समय कम नजर नहीं आ रहे थे। अगर फिल्मी भाषा में बात की जाये तो मनमोहन सरकार आर्ट मूवी यानि समानांतर सिनेमा थी। जिसकी मंथर पटकथा लोगों में चरम दर्जे की ऊब पैदा कर चुकी थी। इसके बरक्स मोदी एक्शन फिल्म के हीरो की तरह लाये गये। जिससे जनमानस थ्रिल से आलोडि़त हो उठा। उत्तरप्रदेश जैसे राज्य में 80 लोकसभा सीटों में से भाजपा को सहयोगी दल के साथ 73 सीटें मिल जाना अभूतपूर्व उपलब्धि थी जबकि उसके पहले देश के सबसे बड़े सूबे में भाजपा का अस्तित्व लगभग समाप्त प्राय हो गया था। प्रधानमंत्री बन जाने के बाद भी मोदी अपने नाटकीय प्रभाव को बनाये रखने में सफल रहे लेकिन अब जबकि उनकी सरकार का एक वर्ष पूरा होने को है। उनका जीरो बटा जीरो आउट पुट लोगों को मोहभंग की वेदना से व्यथित कर रहा है। पश्चिम बंगाल के नगर निगम चुनाव में ममता बनर्जी की भारी सफलता हो या उत्तरप्रदेश में फरेंदा के हालिया विधानसभा उपचुनाव में न केवल सपा की जीत बल्कि भाजपा का तीसरे स्थान पर पहुंच जाना हो। मोदी के छीजते आभामंडल की यथार्थ बयानी करने वाले प्रसंग के रूप में चिन्हित किये जा रहे हैं। ऐसे में अमेरिकी मीडिया मोदी को संजीवनी देने के लिये आगे आयी है तो इसके निहितार्थ पर गौर करना ही होगा। इस समय हालत यह है कि पिछले एक वर्ष से भारत का निर्यात लगातार घट रहा है। प्रवंचनाओं से कुछ हासिल नहीं होता बल्कि प्रवंचनाओं पर विश्वास करना आत्मघात के बराबर है। कुछ वर्ष पहले सूचना साम्राज्यवाद से प्रेरित होकर यह खबरें भारतीय मीडिया में छपी थीं कि चीन भारत से डर रहा है क्योंकि उसे मालूम है कि भारतीयों को बेहतर अंग्रेजी आती है जबकि चीनी अंग्रेजी जानने के मामले में बहुत पिछड़े हुए हैं और अर्थ व्यवस्था की वैश्विक प्रतिस्पर्धा में चीन के लिये इससे बेहद प्रतिकूल स्थिति निर्मित हो रही है लेकिन यथार्थ क्या निकला। चीन इन वर्षों में विश्व व्यापार में जितना आगे निकल गया है भारत उसमें पासंग भर नहीं ठहरता।
मोदी सरकार को पेट्रोल डीजल की कीमतें बढ़ानी ही पड़ी हैं। सब्जी व दाल की महंगाई फिर शिखर छूने लगी है। विदेशी बैंकों में जमा भारतीयों के काले धन की आवक के सपने अब छलते नजर आ रहे हैं। भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के मामले में यह सरकार कोई खास पुरुषार्थ नहीं दिखा पायी है। उस पर तुर्रा यह कि मोदी ने मेक इन इंडिया का नारा दिया है जबकि 1970 के बाद अमेरिका ने खुद ही अपने यहां विनिर्माण बंद कर दूसरी जगह फैक्ट्रियां स्थापित कराने का सिलसिला चलाया था जिसकी वजह वहां बढ़ता प्रदूषण था। इसके बावजूद उसका विश्व व्यापार में प्रभुत्व इसलिये बढ़ता गया क्योंकि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जरिये दुनिया के दूसरे देश के लोगों की बचत खींचकर अमेरिका अपने यहां ला रहा है। ऐसे में मेक इन इंडिया का नारा देना क्या अमेरिका के हाथों में खेलना नहीं है। अमेरिका ने पहले उद्योगों से हाथ खींचा और व्यापार शुरू किया। इसके बाद उसने व्यापार से भी छुटकारा पा लिया। आज उसकी ताकत वित्तीय जोड़ तोड़ है। यह संयोग नहीं है कि मेक इन इंडिया का नारा देने के बाद मोदी सरकार के कार्यकाल में डालर के मुकाबले भारतीय रुपया एकदम नीचे जा गिरा है। मोदी जिस पार्टी से आये हैं वह अपनी प्राचीन संस्कृति का जबर्दस्त गुणगान करती है। दुनिया की कोई भी प्राचीन संस्कृति न तो उपभोगवाद का समर्थन करती है और न ही यह मानती है कि आर्थिक व्यापारिक क्षेत्र उन्मुक्त होना चाहिये। व्यापार के लिये भी नैतिक लक्ष्मण रेखा हो जबकि उन्मुक्तता की हामी अमेरिका पोषित शेयर बाजार आधारित अर्थ व्यवस्था इसे प्रगति में बड़ी रुकावट करार देती है। अपने धूर्त विश्वास के कारण ही अमेरिका में तो पहले से ही यह होता रहा है कि निवेशकों का पैसा हड़पकर कंपनियां चलाने वालों ने अपनी कंपनी का दिवाला निकलवा लिया लेकिन उसके अनुकरण की वजह से सत्यम इंफो कंपनी के हश्र से यह छूत भारतीय अर्थ व्यवस्था को भी लग चुकी है। इसका अनुमान मोदी के सरकार में आने के पहले ही हो चुका था। फिर भी मोदी ने इस देश के सांस्कृतिक विश्वासों और मूल्यों पर आधारित अर्थ व्यवस्था का नया माडल खड़ा करने की प्रतिभा नहीं दिखाई। बहरहाल जो भी हो लेकिन यह बात देश के सामने साफ हो जानी चाहिये कि अमेरिका और उसके गिरोह की वैश्विक ताकतों का सर्टिफिकेट लेकर इतराना ठीक नहीं है और इस सर्टिफिकेट के आधार पर यहां की सच्चाई को दफन किया जाना अब संभव नहीं रह गया।

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