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डिम्पल का निर्विरोध निर्वाचन

Posted On: 13 Jun, 2012 Others में

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kpsinghorai

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Dimple yadav
कन्नौज से डिम्पल यादव के निर्विरोध निर्वाचन को अखबारों ने ऐतिहासिक घटना बताया है। यह स्पष्ट नहीं किया गया कि अखबारों का आशय ऐतिहासिक के पीछे सामान्य व्याख्या है या उन्होंने अभिभूत करने वाले विशेषण के रूप में इस शब्द का इस्तेमाल किया है। डिम्पल यादव के निर्विरोध निर्वाचन के निहितार्थ क्या हैं, इसे लेकर अखबारों में कोई बहस भी नजर नहीं आई, क्या माना जाए कि यह कोई मुद्दा नहीं है या अखबार जो अपने आपको लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहते हैं, लोकतंत्र की गुणवत्ता से जुड़े इस प्रश्न पर बच निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं। लालबहादुर शास्त्री, अटल बिहारी वाजपेई और तमाम अजातशत्रु नेताओं को यह सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ कि उनके खिलाफ कोई उम्मीदवार न बनता बल्कि अटलजी के खिलाफ तो १९८४ में कांग्रेस ने ग्वालियर से माधवराव सिंधिया को आखिरी मौके पर इसलिए उतार दिया था ताकि उन्हें संसद में प्रवेश करने से रोका जा सके और कांग्रेस इस मकसद में कामयाब भी रही थी। १९७७ में जबकि मध्य प्रदेश की ४० में से ३९ सीटें जनता पार्टी ने उसके प्रत्याशियों द्वारा ढंग से प्रचार न करने के बावजूद जीत ली थीं उस समय गुना सीट से नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज के कर्नल ढिल्लन के खिलाफ माधवराव सिंधिया ने न केवल कांग्रेस के समर्थन से उम्मीदवार न होने में संकोच नहीं किया था बल्कि वे एक महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के खिलाफ कांग्रेस पार्टी के विरुद्ध उस समय व्याप्त माहौल और उनके खानदान पर प्रथम स्वाधीनता संग्राम को लेकर लगे कलंक के बावजूद विजयी हुए थे। ऐसे में डिम्पल यादव या उनके पति अखिलेश यादव जिन्हें उत्तर प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री होने का गौरव प्राप्त है, उनके ऐसे क्या पुण्य हैं जिसके कारण सारे विरोधियों ने उनका इतना लिहाज किया कि अपना उम्मीदवार उतारने की जरूरत महसूस नहीं की। याद आता है जीवाजीराव सिंधिया के निधन के बाद जब विजयाराजे सिंधिया गुना सीट से उपचुनाव में कांग्रेस की उम्मीदवार घोषित हुईं तो उनके लिए सहानुभूति का ऐसा सैलाब उमड़ रहा था कि कितना भी दिग्गज खड़ा होता उसकी जमानत जब्त होना तय थी। उस समय डा. राममनोहर लोहिया जीवित थे और उन्होंने लोकतंत्र का वजूद बचाने के लिए एक अनोखी पहल की। वाल्मीकि समुदाय की एक महिला को उनके सामने उम्मीदवार बनाकर घोषित किया कि यह पैमाना है कि महारानी के मुकाबले महत-रानी को कितने मत मिलते हैं। इसके आधार पर हम अपने संघर्ष को आगे बढ़ाते जाएंगे और एक वो दिन आएगा जब महत-रानी महा-रानी के खिलाफ चुनाव जीतकर साबित करेगी कि देश में सच्चा लोकतंत्र आ गया है, लेकिन लोहियाजी के विचारधारा पर चलने वाली पार्टी की उम्मीदवार जिन्हें आधुनिक महारानी कहा जाए तो अन्यथा न होगा, निर्विरोध निर्वाचित हुई हैं, इसे उक्त घटना के संदर्भ में किस प्रकार व्याख्यायित किया जाए। क्या लोकतंत्र इतने वर्षों बाद नये शिखर पर पहुंचा है या नई तलहटी में धंस गया है। हालांकि यह सवाल उसी समय पूछा जाना चाहिए था जब छोटे लोहिया यानी जनेश्वर मिश्र जिंदा थे और उन्होंने मुलायम सिंह के होनहार पुत्र अखिलेश यादव को उनकी राजनीति के आगाज के लिए साइकिल यात्रा पर हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था। वंशवाद के जीवन भर विरोधी रहे लोहियाजी का छोटे लोहिया द्वारा यह श्राद्ध उस समय शायद अंकुरण की अवस्था में था और डिम्पल की बिना चुनाव लड़े जीत से अब वटवृक्ष के रूप में पल्लिवित हुआ है। भले ही अखिलेश और डिम्पल में कोई व्यक्तितगत बुराई अभी तक नजर न आई हो फिर भी जिस तरह से बिना किसी पुरुषार्थ के लोहिया के नाम का जाप करने वाली पार्टी में अखिलेश को मुख्यमंत्री पद मिला और उनकी पत्नी को निर्विरोध निर्वाचन का सम्मान, इसे लेकर सहिष्णुता के नाम पर सवाल न उठाने वालों को इतिहास शायद ही कभी माफ करे।
केपी सिंह, उरई

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