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अदालतों ने जगाई न्‍याय की उम्मीद

Posted On: 15 Feb, 2013 Others में

बोल कि लब आजाद हैं...jagran

krishnakant

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राजधानी दिल्ली में चलती बस में युवती के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म के बाद देश भर में फैले जनाक्रोश से हमारी राजनीति का जंग खाया ढर्रा भले न बदला हो, लेकिन बदलाव जरूर आया है। उस आंदोलन के बाद जहां सत्ता के गलियारे में अपनी प्रासंगिकता साबित करने को लेकर हलचल हुई और केंद्र सरकार ने त्वरित गति से काम करते हुए महिलाओं की सुरक्षा के लिए अपेक्षाकृत कड़ा कानून बना लिया है, वहीं अदालती कार्यवाहियों में भी आमूल बदलाव दिख रहा है। अदालतों की कार्यवाही में अप्रत्याशित तेजी आई है, जिससे बहुत बड़ी उम्मीद जगी है। दिल्ली की घटना के बाद अब तक, खासकर जनवरी महीने में देश भर की निचली अदालतों ने करीब दो दर्जन मामलों को तीन से पंद्रह दिन में निपटा दिया है। इन मामलों में या तो अपराधी को फांसी हुई है या फिर उम्रकैद हुई है। खास बात यह है कि इनमें से अधिकतर अदालतें फास्ट ट्रैक श्रेणी की नहीं हैं। इसके अलावा दिल्ली में सामूहिक दुष्कर्म की घटना के बाद लगभग देश के सभी राज्यों में फास्ट ट्रैक अदालतें गठित हुई हैं, जो यौन हिंसा जैसे मामलों को देखेंगी। पिछले एक महीने में अदालती कार्यवाहियों का अंजाम काफी सुखद रहा है। यह तब है जबकि अदालतों ने मौजूदा कानून के दायरे में ही अपराधियों को सजा सुनाई है। इस गति से अपराधियों को दंडित किए जाने पर ​बेशक महिलाओं के विरुद्ध हिंसा को रोकने में कामयाबी मिलने की आशा बंधती है।
बीते मंगलवार को मध्य प्रदेश में राजगढ़ की जिला एवं सत्र अदालत ने नाबालिग के साथ हुए बलात्कार के मामले का 12 दिन में निपटारा कर दिया और दुष्कर्मी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। मध्य प्रदेश में ही एक अन्य मामले में मंडला की द्वितीय अपर सत्र अदालत ने मंगलवार को नाबालिग के साथ दुष्कर्म व हत्या के आरोपी को मृत्युदंड की सजा सुनाई। इस मामले में भी अदालत ने दो सप्ताह का समय लिया।
रीवा की फास्ट ट्रैक अदालत ने दो फरवरी को 10 दिन के अंदर नाबालिग के अपहरण के आरोपी को पांच वर्ष की सजा सुनाई और पांच हजार का अर्थदंड लगाया। मामला 20 जनवरी को मामला कोर्ट में आया था और दो फरवरी को अपराधी को सजा हो गई। इसी दिन बिहार में कटिहार जिला एवं सत्र न्यायालय ने दुष्कर्म के हत्यारे को महज चार दिन की सुनवाई में साढ़े तीन वर्ष की बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या के मामले में फांसी की सजा सुना दी।
एक फरवरी को हरिद्वार की एक स्थानीय अदालत ने दुष्कर्म मामले में आरोप तय होने के 11वें दिन दुष्कर्मी को दस वर्ष की सश्रम कैद व दस हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। इसी तरह 31 जनवरी को ओडिशा की संबलपुर फास्ट ट्रैक अदालत ने तीन साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या करने वाले व्यक्ति को मौत की सजा सुनाई। मध्य प्रदेश की बीना जिला अदालत ने 30 जनवरी को छेड़छाड़ के एक मामले को 10 दिन में निपटाते हुए दोषी को एक साल के सश्रम कारावास व 500 रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई। इस मामले में 21 जनवरी को चालान पेश हुआ और 30 जनवरी को न्यायालय ने फैसला सुना दिया। मध्य प्रदेश के ही खंडवा जिले में विशेष अदालत ने डेढ़ वर्ष की बालिका से दुष्कर्म के अपराध में 28 जनवरी को एक युवक को 14 वर्ष के कठोर कारावास और पांच हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई। मामले में 18 जनवरी को अभियोग पेश हुआ था।
पंजाब की एक अदालत ने तो महज दो दिनों की सुनवाई में फैसला सुनाकर एक मिसाल पेश कर दी। होशियारपुर जिले के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने किशोरी का अपहरण करने वाले को महज दो दिन की सुनवाई के बाद सात साल कैद की सजा सुनाई। इसी तरह लुधियाना में गठित फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 25 जनवरी को एक दिन में तीन केस निपटाए। दो मामलों में दस वर्ष और सात वर्ष कैद की सजा सुनाई और एक आरोपी के खिलाफ सबूत का अभाव होने के कारण उसे बरी कर दिया।
दिल्ली के तीस हजारी में स्थित फास्ट ट्रैक कोर्ट की न्यायाधीश कावेरी बावेजा ने 17 जनवरी को दुष्कर्म का एक मामला महज आठ दिनों में निपटाते हुए दोषी को दस साल के कारावास की सजा सुनाई और बीस हजार रुपये अर्थदंड भी लगाया। यह मामला सात जनवरी को अदालत में आया था। पंजाब में होशियारपुर के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश जेएस भिंडर ने 10 जनवरी को ऐतिहासिक फैसले में महज आठ दिन में आरोपी को दोषी करार देकर दस साल की सजा सुना दी और 90 हजार का अर्थदंड लगाया। यह मामला दो जनवरी को कोर्ट में आया।
महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामले में न्याय की यह गति कई मायनों में काफी अहम है। समाज में इस तेजी से अपराधियों को फांसी और उम्रकैद की सजा मिलने से एक तरह का भय उत्पन्न होगा, जो लोगों को अपराध करने से रोकेगा। मौजूदा स्थिति तो यह है कि ऐसे मामलों में बर्षों तक मामले अदालत में लटके रहते हैं और अपराधी छुट्टा घूमते हैं। इससे अपराधियों का हौसला बढ़ता है तो पीड़ित पक्ष का मनोबल गिरता है और उसके मन में यह धारणा घर कर जाती है कि हमें हमारी व्यवस्था व सरकारें न्याय नहीं दिला सकतीं। दिल्ली की घटना के बाद के जनाक्रोश को विश्लेषक भले ही असंगठित और बिखरा हुआ आंदोलन कहें, लेकिन उसने व्यवस्था की चूलें हिला दीं और न्यायिक प्रक्रिया में उम्मीद से ज्यादा आई है। उम्मीद करनी चाहिए आने वाला समय पीड़ित को न्याय मिलने के मामले में और बेहतर साबित होगा।

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