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इन रिश्तों को तपने दो

Posted On: 27 Jun, 2012 Others में

बोल कि लब आजाद हैं...jagran

krishnakant

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इन रिश्तों को तपने दो
खूब तपेंगे, कुंदन होंगे
इन्हें जिस्म पर घिसने दो
महकेंगे तो चन्दन होंगे
रोम रोम से बंध जाने दे
जकड़ गए, निर्बन्धन होंगे
छू-छू कर ये गुज़र गए तो
कण कण में स्पंदन होंगे
कभी सामने तुम आये तो
नेत्र बंद कर वंदन होंगे
तुम्हें बनाऊं अगर राधिका
तो हम जसुदानंदन होंगे

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