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मै चिकना घड़ा हूं

Posted On: 16 Jul, 2015 Others में

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krishna kumar pandey

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समाज की कुरीतियों दूषित नीतियों से जुड़ा हूं।
मुझे फर्क नहीं पड़ता मैं चिकना घड़ा हूं।।

चॉद पर पहुंच गये हैं दुनिया के कदम,
मैं असहाय आलस की बैशाखी पर खड़ा हूं।
मुझे फर्क नहीं पड़ता मैं चिकना घड़ा हूं।।

बेईमानी की रोटी ठुंसी हुई गले तक,
प्यास बुझती नही भ्रष्ट दलदल में फंसा पड़ा हूं।
मुझे फर्क नहीं पड़ता मैं चिकना घड़ा हूं।।

देखी बहुत गरीबी अब धन दौलत देखी है,
मुड़कर नही देखना वहां पलकर हुआ बड़ा हूं।
मुझे फर्क नहीं पड़ता मैं चिकना घड़ा हूं।।

आजाद देश में गुलाम बन कर रह गया,
धर्म जाति के कत्लखानों में आरी सा जड़ा हूं।
मुझे फर्क नहीं पड़ता मैं चिकना घड़ा हूं।।

कुचल के रख दिया स्वाभिमान का दामन,
कल पैदल आज अभिमान के अश्व पर चढ़ा हूं।
मुझे फर्क नहीं पड़ता मैं चिकना घड़ा हूं।।

लुटती है आबरू लुट जाने दो नारी की,
यहॉ देश लुट रहा है और मैं सोया पड़ा हूं।
मुझे फर्क नहीं पड़ता मैं चिकना घड़ा हूं।।

समाज की कुरीतियों दूषित नीतियों से जुड़ा हूं।
मुझे फर्क नहीं पड़ता मैं चिकना घड़ा हूं।।

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