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बेटियों की सुरक्षा हेतु सामाजिक उपाय अपनाने होंगे

Posted On: 25 Apr, 2018 Others में

मुद्दे की बात, कुमारेन्द्र के साथ

डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

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इन दिनों रेप की घटनाओं की बाढ़ सी आई हुई है। कोई दिन ऐसा नहीं निकल रहा है जबकि रेप की घटनाओं से सामना न होता हो। शर्मनाक है ऐसी स्थिति। इससे ज्यादा चिंताजनक स्थिति यह भी है कि अब ऐसा कृत्य करने वाले मासूम बच्चियों को भी यौन शोषण का शिकार बनाने लगे हैं। दो-दो, चार-चार महीनों की बच्चियों के साथ रेप किया जा रहा है, रेप के प्रयास किये जा रहे हैं। घृणित कृत्य के साथ जघन्यता की पराकाष्ठा दिखाई जाने लगी है। ऐसा लगने लगा है जैसे समाज से संवेदनशीलता, मानवीयता पूरी तरह समाप्त हो गई है। यौन-कुंठा का इतना वीभत्स रूप शायद की कभी देखने को मिला हो। दिनों-दिन बढ़ती बलात्कार की घटनाएँ समाज में आ रहे मानवीय मूल्यों के अवमूल्यन का दुष्परिणाम हैं। एक एजेंसी के आँकड़ों के अनुसार देश में प्रतिदिन पचास से अधिक महिलाएं बलात्कार का शिकार होती हैं, लगभग पाँच सौ महिलाएँ छेड़खानी का शिकार होती हैं। कार्यशील महिलाओं पर किये गए एक सर्वेक्षण के पश्चात् सामने आई एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार पचास प्रतिशत कामकाजी महिलाओं को अपने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। लगभग पच्चीस प्रतिशत महिलाएँ स्पर्श जैसे उत्पीड़न की पीड़ा सहती हैं। एक अध्ययन के अनुसार अस्सी प्रतिशत बलात्कार के मामले दस वर्ष से लेकर तीस वर्ष की युवतियों के साथ होते हैं। इसमें भी चौंकाने वाला तथ्य यह है कि दस वर्ष कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार के मामले भी चार प्रतिशत के आसपास पाये गये हैं। ये आँकड़े भले हों मगर दिखाते हैं कि यौन पिपासा में हमारा समाज कितना पतितशील हो चुका है।

इस पतन के लिए वर्तमान में सामाजिक जीवन-शैली बहुत अधिक जिम्मेवार है। सेल्युलाइड पर बिखरती रंगीनियों ने, टी०वी० कार्यक्रमों की नग्नता ने एक कुंठित वर्ग को जन्म दिया है। अश्लीलता घर-घर परोसी जा रही है। मोबाइल के कारण हर हाथ में पोर्न सहजता के साथ उपलब्ध है। पुरुषों के उपभोग की वस्तु हो, बच्चों की आवश्यकता सम्बन्धी हो या फिर महिलाओं की जरूरत, नारीदेह दर्शन बिना किसी भी तरह का विज्ञापन पूरा नहीं होता है। अधोवस्त्रों के विज्ञापन हों, सौन्दर्य प्रसाधनों के विज्ञापन हों, गर्भनिरोधकों के विज्ञापन हों, पेयपदार्थों के विज्ञापन हों, बॉडी स्प्रे हो, वाहन का विज्ञापन हो या फिर कोई अन्य उत्पाद सबका प्रस्तुतीकरण अश्लीलता-नग्नता से भरपूर रहता है। विज्ञापनों के अलावा फिल्मों, धारावाहिकों, म्यूजिक एल्बम, लाइव शो यहाँ तक कि कॉमेडी शो तक में महिलाओं को अशालीन, अर्द्धनग्न रूप में प्रदर्शित किया जा रहा है। उनकी भावभंगिमा, गीतों के बोल, आपसी बातचीत, संवाद अदायगी कहीं न कहीं शारीरिकता का बखान करती दिखती है। जिससे आभास होता है कि जीवन का एकमात्र उद्देश्य सेक्स की प्राप्ति है। इससे कामुक प्रवृत्ति के व्यक्ति को नारीदेह के बिना, सेक्स के बगैर अपना जीवन अधूरा सा लगने लगता है। ऐसी स्थिति में वह अपनी यौनेच्छा को पूरा करने के लिए किसी न किसी माध्यम की तलाश करता है। अश्लील, नग्नता सम्बन्धी दृश्य सामग्री देखने के बाद ऐसे कामातुर जिनके पास कामेच्छा संतुष्टि का साधन है वे सहज भाव से अपनी संतुष्टि प्राप्त कर लेते हैं किन्तु जिनके पास ऐसी सुविधा नहीं है वे अपनी यौनेच्छा की संतुष्टि का साधन खोजने निकल पड़ते हैं। ऐसे समय में ही उसकी यौनेच्छा का शिकार असहाय, कमजोर महिला वर्ग होता है। बच्चियाँ ऐसे लोगों को सबसे आसान शिकार जान पड़ती हैं। महिलाओं के साथ शारीरिक संबंधों की कठिनाई अथवा बाधा उत्पन्न होने पर इसका विकृत रूप सामूहिक बलात्कार, मासूम बच्चियों के शोषण के रूप में सामने आ रहा है। आज आधुनिकता के नाम पर सेक्स को प्रमुखता से स्वीकार करके देह की नुमाइश, खुलेआम शारीरिक सम्बन्धों की ओर मुड़ने, विवाहपूर्व-विवाहेतर शारीरिक सम्बन्ध बनाने की संस्कृति जिस तेजी से फ़ैल रही है वह आधुनिक उच्छृंखल महिला-पुरुष को तो दैहिक आवश्यकता की पूर्ति के रास्ते उपलब्ध करवा रही है किन्तु यौन-कुंठित वर्ग को यौन अपराधोन्मुख कर रही है।

फिल्मों, टी०वी० धारावाहिकों में प्रेम करना, दैहिक संबंधों की सहजता का दिखाया जाना एकमात्र कार्य बनता जा रहा है। कहानी भले ही किसी शैक्षिक संस्था से आरम्भ हो, भले ही किसी परिवार या अन्य जगह से शुरू हो पर जल्द ही वह प्यार करने, प्यार होने, शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाने के आसपास घूमने लगती है। प्यार के नाम पर सेक्स को, नारी देह को दिमाग में इस तरह प्रत्यारोपित किया जा रहा है कि ‘राजी, राजी नहीं तो गैर-राजी’ की अवधारणा पर बस प्रेम करना है, शारीरिक सम्बन्ध बनाने हैं। प्रेम का किशोरवय अथवा युवाओं से सम्बंधित स्वरूप ही सामने नहीं रखा जा रहा है वरन विवाहेतर संबंधों को, जबरन प्रेम सम्बन्ध स्वीकार करवाए जाने को भी स्थापित सा किया जा रहा है। इसी का दुष्परिणाम है कि आये दिन बच्चियाँ तेजाबी हमले का शिकार हो रही हैं, कहीं किसी बच्ची के साथ बलात्कार किया जा रहा है तो कहीं किसी विवाहित महिला को जबरन प्रेम सम्बन्ध स्वीकारने को मजबूर किया जा रहा है। अत्याधुनिक समाज के चाल-चलन के अनुसार गर्लफ्रेंड, बॉयफ्रेंड जैसी अवधारणा अनिवार्य सी समझी जाने लगी है। आधुनिक बनने के इन क़दमों ने इन बच्चों को ही संकट में डाला है। बच्चियाँ आपराधिक प्रवृतियों के चंगुल में फँस जा रही हैं; कुत्सित मानसिकता के लड़कों के बहकावे में आकर या तो गर्भवती हो जा रही हैं या फिर गैंग रेप का शिकार बन रही हैं; बहला-फुसला उनको देह-व्यापार के दलदल में भी धकेला जा रहा है; प्रेम के नाम पर असफलता हाथ लगने वाले सिरफिरों के हमलों का शिकार बन रही हैं।

ऐसे विषम समय में हमें स्वयं तय करना है कि हमारे लिए प्राथमिकता क्या है, देह-दर्शना वस्त्र, यौनेच्छा को बढ़ाने वाली स्थितियां अथवा सुरक्षित समाज, सुरक्षित बच्चियां, सुरक्षित महिलायें? असल सुधार तो इस प्राथमिकता को निर्धारित करने के बाद ही होगा। सुरक्षा अपने हाथ में है क्योंकि विकृत मानसिकता, यौन-कुंठित व्यक्ति सिर्फ बच्ची के लिए नहीं, महिलाओं के लिए नहीं पूरे समाज के लिए घातक है। महिलाओं के विरुद्ध हो रहे अपराधों को रोकने अथवा कम करने का उपाय कानूनी दृष्टि से ज्यादा सामाजिक और सांस्कृतिक है। केंद्र सरकार द्वारा बारह वर्ष से कम आयु की बच्चियों के साथ रेप के मामले में फाँसी की सजा से ऐसी घटनाओं के रुकने की सम्भावना बहुत कम है। इसके उलट आशंका इसकी अवश्य है कि कहीं ये दरिन्दे अपनी हवस का शिकार बच्चियों की हत्या करना न शुरू कर दें। कानून अपना काम करता ही है मगर समाज का भी अपना दायित्व होता है। कुछ वर्ष पहले इसी केंद्र सरकार ने पोर्न साइट्स पर प्रतिबन्ध लगाया था तो सरकार विरोधी लोग इस प्रतिबन्ध के विरोध में सडकों पर उतर आये थे। उस समय इन लोगों का कुतर्क था कि सरकार कैसे और क्यों निर्धारित करेगी कि कोई क्या देखे। ये ठीक उसी तरह से है जैसे कि नारीवादियों द्वारा कुतर्क किया जाता है कि देह उनकी है, वे चाहे जैसे दिखाएँ। यहाँ सोचना होगा कि जो सक्षम है, जो कपड़ों के भीतर से झांकती देह को सुरक्षा घेरे में लिए घूम रहा है, जिसके आसपास दैहिक सम्बन्ध बनाये जाने के तमाम विकल्प उपलब्ध हैं वे कभी भी रेप का शिकार नहीं होती हैं पर उनकी अश्लील भाव-भंगिमाओं का खामियाजा बच्चियों को उठाना पड़ता है।

न केवल सरकार को वरन समाज को अब जागने की ही नहीं बल्कि सख्ती दिखाने की आवश्यकता है। किसी भी तरह से विज्ञापनों, धारावाहिकों, फिल्मों, कार्यक्रमों आदि में अनावश्यक रूप से नारीदेह की कामुक छवियों के चित्रण, प्रदर्शन आदि पर रोक लगाई जाए। किसी भी स्त्री को बाजार में उत्पाद की तरह से प्रस्तुत करने से बचना होगा। इसके साथ-साथ देश भर में सख्ती से पोर्न साइट्स पर पूर्णरूप से प्रतिबन्ध लगाया जाए। अब ऐसा इसलिए भी आवश्यक हो गया है क्योंकि मोबाइल के कारण बच्चों-बच्चों के हाथों में पोर्न साइट्स खेलने में लगी हैं। यही कारण है कि आज कम उम्र के बच्चों द्वारा भी शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाने की घटनाएँ सामने आने लगी हैं। विद्यालयीन पाठ्यक्रमों में नैतिक शिक्षा के साथ-साथ यौन शिक्षा को भी अनिवार्य रूप से शामिल किया जाये। बालक-बालिकाओं को संस्कारवान बनाये जाने की आधारभूमि उनके विद्यालय से ही आरम्भ की जाये। इसी तरह से बच्चियों को शारीरिक सुरक्षा सम्बन्धी प्रशिक्षण अनिवार्य रूप से विद्यालयों में दिया जाना चाहिए। एक कदम सरकार को सख्ती से उठाये जाने की आवश्यकता है और वह है वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता देना। ये कहने-सुनने में भले ही असहज लगे मगर आज जिस तरह से घर-घर में, गली-गली में यौन-कुंठित व्यक्ति जन्म ले रहे हैं उनकी यौनेच्छा दमन के लिए कोई न कोई जगह अवश्य होनी चाहिए। यदि आधुनिकता का तकाजा देह-दर्शन है, छोटे वस्त्र हैं, यौन-सम्बन्ध हैं तो उसी आधुनिकता को सही दिशा देने के लिए यौन-कुंठित व्यक्तियों की यौनेच्छा शमन की व्यवस्था बनाये जाने के लिए वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता देनी होगी।

इसके साथ-साथ हम सबको ध्यान रखना होगा कि बलात्कार के मूल में यदि नारीदेह की कामुक छवि का प्रदर्शन है तो संस्कृति से विमुख होना भी एक अन्य कारण है। भारतीय संस्कृति के गौरवमयी आँचल की छाँव को त्यागकर मांसलता, अश्लीलता की चकाचौंध भरी धूप को स्वीकारने से रिश्तों की गर्माहट, भावनाओं की पवित्रता को सुखाने के अतिरिक्त और कुछ प्राप्त होने वाला नहीं और इसका खामियाजा हमारी बेटियों को उठाना पड़ रहा है। नारी देह दर्शन की वकालत करने वालों को समझना होगा कि हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, हिन्दू दत्तक पुत्र एवं अनुरक्षण अधिनियम, बाल विवाह प्रतिरोध अधिनियम, मातृत्व हितलाभ अधिनियम, मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेगनेंसी एक्ट, दहेज निरोध अधिनियम, अनैतिक व्यापार अधिनियम, परिवार न्यायालय, महिलाओं के प्रति अभद्र प्रस्तुतीकरण अधिनियम जैसे अनेक अधिनियमों के अलावा लड़कियों का अल्पायु में विवाह प्रतिबन्धित करने, तलाक लेने, पिता, पति और पुत्र की संपत्ति पर अधिकार पाने का हक, समान अवसर, कार्यस्थल पर सुरक्षा, मातृत्व अवकाश का अधिकार आदि महिलाओं के देह-विमर्श का, अश्लील आधुनिक बनने का परिणाम नहीं हैं।

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