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मिटती भौगोलिक दूरियाँ, मिटते भावनात्मक सम्बन्ध

Posted On: 3 Mar, 2018 Others में

मुद्दे की बात, कुमारेन्द्र के साथ

डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

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आधुनिक होकर हम सभी विस्तारित होते जा रहे हैं. इसमें तकनीक भी सहायक सिद्ध हो रही है. तकनीकी विकास ने इंसानों के बीच, शहरों के बीच, राज्यों के बीच, देशों के बीच दूरियों को कम किया है. इंसानों को छोड़ कर बाकी तत्वों के लिए दूर या पास होने का बहुत भावनात्मक स्तर नहीं रहता है. इन्सान एकमात्र ऐसा तत्त्व है जो भौगोलिक दूरी के साथ-साथ भावनात्मक दूरी का एहसास रखता है. तकनीक के विकास ने भौगोलिक दूरियों को लगभग समाप्त सा कर दिया है. मोबाइल क्रांति ने जहाँ पल भर में एक-दूसरे को एक-दूसरे के सामने खड़ा करने की क्षमता को विकसित किया है वहीं यातायात सुविधा ने दूरियों को घंटों में समेट दिया है. अब हम दूरियों की बात किमी में नहीं वरन समय के अनुपात में करने लगे हैं. मोबाइल क्रांति के साथ-साथ सोशल मीडिया के तमाम सारे मंचों ने दूरियों को मिटाते हुए सबको एक-दूसरे से मिलने का अवसर दिया है. देशों की सीमाओं को लाँघते हुए समूचे विश्व को एक गाँव में परिवर्तित कर दिया है.
दूरियों के भेद को भौगोलिक रूप से मिटाने के बाद भी इंसानों ने दिल के भेद को मिटाने में सफलता हासिल नहीं कर पाई है. तकनीकी विकास ने लोगों को परदे पर एक-दूसरे के सामने जरूर बैठा दिया है मगर वास्तविक रूप से आमने-सामने बैठने की मानसिकता में लगातार गिरावट आती जा रही है. सामान्य दिनों की मेल-मिलाप वाली प्रक्रिया, दोस्त-यारों की घंटों के हिसाब से लगने वाली बैठकी, दर्जनों की संख्या में एकत्र होकर जमघट लगाने की सोच भी अब देखने को नहीं मिल रही है. सामान्य दिनों के मेल-मिलाप में आने वाली इस गिरावट को पर्व-त्योहारों के अवसर पर भी देखा जा रहा है. अब पर्व-त्यौहार भी औपचारिकता में संपन्न या कहें कि निपटाए जाने लगे हैं. दोस्तों के हुजूम के हुजूम अब सड़कों पर, बाजार में, घरों में देखने को नहीं मिलते हैं. हँसी-मजाक की महफ़िलें अब जमती नहीं दिखाई देती हैं. कई-कई परिवारों के बीच दिखाई देने वाले आत्मीय रिश्तों का भी लोप होता दिखाई देने लगा है. त्योहारों के अवसर पर मिलने-जुलने की परम्परा को अब बोझिलता से निपटाने का उपक्रम किया जाने लगा है. अब आपस में मिलने-जुलने के बजाय लोग मोबाइल के माध्यम से मिलने को ज्यादा सुविधाजनक समझने लगे हैं. सोशल मीडिया मंचों का अधिकाधिक उपयोग करके वे पर्व-त्योहारों की औपचारिकता का निर्वहन करने लगे हैं. इत्तेफाक से मिलने-मिलाने की स्थिति यदि कभी, कहीं अपवादस्वरूप बनती दिखती भी है तो वहां मोबाइल का हस्तक्षेप सबसे ज्यादा रहता है. आमने-सामने बैठे लोग भी आपस में बातचीत करने से ज्यादा पल-पल मोबाइल को निहारने में लगे रहते हैं. जरा-जरा सी देर में इस तरह मोबाइल खंगाला जाता है जैसे अत्यंत महत्त्वपूर्ण मसला हल किया जा रहा हो.
सामान्य रूप से इस तरह की हरकतें असामान्य हरकतों में, बुरे बर्ताव के रूप में देखी जानी चाहिए मगर आधुनिकता के वशीभूत सब इसको सामान्य सी घटना, सामान्य सी प्रक्रिया, दैनिक चर्या मानकर सहज रूप में स्वीकार करने लगे हैं. असल में लगभग सभी कहीं न कहीं इस हरकत से खुद भी ग्रसित हैं, ऐसे में उनके द्वारा किसी दूसरे को दोष देने की हिमाकत भी नहीं की जा सकती है. तकनीक के विकास ने जहाँ बहुत सारे सार्थक परिणाम समाज को दिए हैं, उसी तकनीक ने इस तरह का नकारात्मक माहौल भी समाज में बनाने में सहायक भूमिका निभाई है. इंसानों के बीच भौगोलिक दूरियों के मिटने से जहाँ समूचा विश्व एकसूत्र में बंधा दिखाई देता है वहीं दो इन्सान कोसों दूर दिखाई देते हैं. ऐसा लगता है कैसे आमने-सामने बैठे दो इंसानों के बीच बहुत ऊंची दीवार उठी हुई है या फिर वे दोनों बहुत दूर बैठे हुए हैं. यह तकनीकी विकास भले ही आभासी रूप में, सोशल मीडिया के चमकते परदे पर एक-दूसरे को आमने-सामने खड़ा कर रहा हो मगर उसी तकनीक ने दो इंसानों को आपस में बहुत-बहुत दूर कर दिया है. ये दूरी न केवल मानसिक, शारीरिक रूप से परिलक्षित होने लगी है वरन संवेदनात्मक रूप से भी इंसानों में दूरियाँ आने लगी हैं.

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