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क्या कहते हैं दुनियाभर के कैलेंडर, किसने की शुरूआत! 

Posted On: 3 Apr, 2019 Hindi News,Others में

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चैत्र मास प्रारंभ होते ही हिंदू नववर्ष, जिसे विक्रम संवत् के नाम से भी जाना जाता है, के स्वागत की तैयारियां की जाने लगती हैं। ऐसे में बात आती है दुनियाभर के संवतों और कैलेंडर की। हालांकि विक्रम संवत् लगभग 57 ईसा पूर्व हिंदू शासक सम्राट विक्रमादित्य द्वारा प्रवर्तित किया गया था, जिसे विश्व का प्राचीन संवत् माना जाता है लेकिन समूचे विश्व में कालगणना को लेकर कई ऐस संवत् व कैलेडंर प्रचलित हैं जिनका अपना महत्व रहा है। इनमें कुछ एतिहासिक घटनाओं पर आधारित रहे हैं तो कुछ धर्मचरित्रों से संबंधित रहे हैं। सामान्यतौर पर हम कालगणनाओं को कल्प,मन्वन्तर,युग और संवत्सर या संवत् व कैलेंडर ईयर के तौर पर जानते हैं।
इस तरह के पंचांगों, कैलेंडर्स व संवतों को हम देखते हैं –
ग्रेगोरियन कैलेंडर
ग्रेगोरियन कैलेंडर लगभग 1582 ई में प्रारंभ हुआ था। यह कैलेंडर मौजूदा समय में काफी उपयोग में लिया जाता है। इस कैलेंडर को लेकर ब्रिटेन के लोगों ने मांग की कि उनका जीवनकाल 11 दिन कम हो गया जिसके कारण उन्हें 11 दिन का जीवनकाल लौटाया जाए। दरअसल ग्रेगोरियर कैलेंडर के पूर्व यहाँ, जूलियन कैलेंडर प्रचलन में था। जब जूलियन कैलेंडर के स्थान पर इसे अपनाया गया तो, करीब ग्यारह दिनों तक ब्रिटेन के इतिहास में कुछ भी अंकित नहीं हुआ। जिसके कारण लोगों को यह अनुभव हुआ कि उनका जीवनकाल ग्यार दिन कम हो गया है।
रोमन कैलेंडर
इस कैलेंडर को राजा नूमा पोम्पिलियस ने स्थापित किया था। इस कैलेंडर में भी जनवरी की शुरूआत से ही नववर्ष मनाया जाता था। हालांकि यह कैलेंडर चंद्रमा की कलाओं पर आधारित था लेकिन जिस तरह की गणना इसमें की गई थी, इससे चंद्रमा की वास्तविक कलाऐं मिल नहीं पाईं, जिसके कारण इसमें दिए गए मौसमी चक्र का मिलान वास्तविक मौसम से नहीं हो पाया। जूलियस सीजर ने इसमें आवश्यक सुधारों पर बल दिया और इस कार्य में उसने खगोलविद सोसिजीन्स की सहायता ली।
सृष्टि संवत् – यह संवत् भारतीय पद्धति पर आधारित है। इसका उल्लेख आर्यसमाज के ग्रंथों में मिलता है। इस संवत् की मान्यता है कि 14 मन्वन्तरों की एक सृष्टि होती है, इस मानव सृष्टि के बाद प्रलयकाल होता है। अभी तक 1960853118 वर्ष व्यतीत हुए हैं और लगभग 2333226882 वर्ष तक यह सृष्टि रहेगी। सृष्टि संवत् में वेदों की उत्पत्ति का उल्लेख भी मिलता है।
कृष्ण संवत् – यह भी एक भारतीय संवत् है, इसे युगाब्द संवत् या कलि संवत् भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण का इस धरती से निर्वाण हुआ था, माना जाता है कि महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद के कालक्रम में भगवान श्रीकृष्ण को जरा नामक एक शिकारी का बाण अनजाने में लग जाता है और बाण से घायल भगवान श्रीकृष्ण अपनी देह को त्यागकर देवलोक गमन करते हैं। दूसरी ओर पांडवों द्वारा राजा परीक्षित को राजपाट सौंपने और राजा परीक्षित द्वारा जा करने का काल भी इसी संवत् के अंतर्गत माना जाता है।
सप्तर्षि संवत् – भारतीय धर्मग्रन्थों में जानकारी मिलती है कि लगभग 3076 ईपू से संवत् प्रारंभ हुआ था। हालांकि बाद में इसका प्रचलन कम हो गया। इस संवत् में कालगणना सप्तर्षि तारों की गति के आधार पर की गई। इस पर आधारित गणना का सिद्धांत था कि सप्तर्षि अपना एक चक्र करीब 2700 वर्ष में पूर्ण करते हैं यदि इसमें 18 वर्ष जुड़ जाऐ तो यह सौर वर्ष से गणना योग्य हो जाता है। इस तरह से लगभग 18 वर्ष के कालक्रम को एकत्रित कर गिना जाता था।
युधिष्ठिर संवत् – युधिष्ठिर संवत् का काल 2448 ईपू माना जाता है। यह हिंदू वैदिक पद्धति पर आधारित संवत् है। इसे महाभारत संवत् भी कहा जाता है। कई ज्योतिष ग्रन्थों में इस संवत् का उल्लेख मिलता है। कई एतिहासिक शिलालेखों में इसका उल्लेख मिलता है।
सेल्युसिडियम संवत्
एतिहासिक मान्यता है कि लगभग 312 ईपू में सेल्युकस निकेटर ने एशियाई क्षेत्र में अपने नाम से संवत् प्रवर्तित किया। सेल्युकस निकेटर, महान योद्धा सिकंदर का सेनापति था। एशियाई क्षेत्रों में इस संवत् का अधिक प्रभाव रहा। यह एक विदेशी संवत् माना जाता है।
शक संवत्
लगभग 78 ईसा पूर्व शक राजा कनिष्क ने इस संवत् का प्रारंभ किया। इसे राष्ट्रीय पंचांग माना जाता है। काठियावाड़ व कच्छ से मिले शिलालेखों में और शक शासकों के सिक्कों पर इसका उल्लेख मिलता है। यह संवत् भारत के साथ नेपाल में भी प्रचलित था।
गुप्त संवत् – इस संवत् का प्रारंभ गुप्त शासक चंद्रगुप्त प्रथम ने लगभग 319 ई में किया था। यह बंगाल, सौराष्ट्र, नेपाल आदि क्षेत्रों में अधिक प्रचलित रहा।
चालुक्य विक्रम संवत् – इसका प्रारंभ लगभग 1076 ई में सोलंकी राजा विक्रमादित्य ने किया था। यह भारत के दक्षिणी व पश्चिमी क्षेत्र में अधिक प्रचलित रहा।
हिजरी संवत्
यह संवत् चंद्रमा पर आधारित संवत् है। इसका उपयोग विश्वभर के मुसलमान धर्मावलंबी करते हैं। यह संवत् में कालगणना 354 व 355 दिवस और बारह मास पर आधारित होती है। इस संवत् का प्रारंभ इस्लाम धर्म के संस्थापक पैगम्बर हज़रत मुहम्मद के काल से माना गया है। इसका पहला वर्ष हज़रत मुहम्मद की मक्का से मदीना की ओर की गई यात्रा से जुड़ा है।
ईस्वी संवत्
ईस्वी संवत् का प्रारंभ ग्रेगोरियन कैलेंडर पर आधारित है। इस कैलेंडर की शुरूआत पोप ग्रेगोरी अष्ट द्वारा की गई मानी जाती है। इसमें लीप ईयर का प्रावधान है अर्थात् फरवरी मास में 28 अथवा 29 फरवरी की तारीख तक ही मास रहता है। इस कैलेंडर के अनुसार समय की गणना मध्यरात्रि 12 बजे से आरंभ मानी गई है। इसका अर्थ यह है कि, अंग्रेजी नया दिन रात्रि बारह बजे से प्रारंभ होता है।
माया कैलेंडर
इस कैलेंडर का प्रारंभ माया सभ्यता में हुआ। लगभग 300 से 900 ईस्वी में मैक्सिको में यह सभ्यता अस्तित्व में थी। इस सभ्यता के लोगों ने जब कालगणना की तो इसे माया कैलेंडर कहा गया। यह गणितीय और खगोलीय आधार पर आधारित कालगणना थी। इस सभ्यता को इसलिए जाना जाता है क्योंकि इसमें 21 दिसंबर 2012 के बाद की तिथि नहीं दी गई है। ऐसे में इसका अर्थ लगाया जाता रहा है कि, माया कैलेंडर इस दिन के बाद दुनिया की तबाही की ओर संकेत करता है।
विक्रम संवत्
विक्रम संवत् लगभग 57 ई.पू. प्रवर्तित हुआ माना जाता है। माना जाता है कि इस संवत् की कालगणनाऐं शक संवत् पर आधारित गणनाओं की ही तरह हैं। एतिहासिक उल्लेख मिलता है कि उज्जयिनी के सम्राट विक्रमादित्य ने इस संवत् का प्रवर्तन किया था। विक्रमादित्य से जुड़े शिलालेखों, सिक्कों व मुद्राओं आदि में उल्लेख मिलता है कि शकों से हुए युद्ध के बाद मिली जीत को लेकर इस संवत् को प्रारंभ किया गया था। विक्रमादित्य को भारतीय शासक कहा गया है, एतिहासिक उल्लेख मिलता है कि विदेशी आक्रमणकारी शकों को राजा विक्रमादित्य ने परास्त किया था। इसी सफलता के उत्सव में विक्रमोत्सव का आयोजन भी किया गया ।

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