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कुछ साल पहले नववर्ष पर इस चीज का बेसब्री से इंतजार किया करते थे हम

Posted On: 1 Jan, 2016 Others में

जिएं तो जिएं ऐसेरफ्तार के साथ तालमेल बिठाती जिंदगी में चाहिए ऐसे जीना जो बनाए आपको सबकी आंखों का नूर

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नववर्ष का स्वागत और 2015 को अलविदा कहने को हम सब तैयार हैं. गुजरा साल 2015 की खट्टी–मीठी यादें हमारे मन के चित्रशाला में हमेशा गुलजार रहेंगे. हम सभी को बड़ी बेसब्री से 2016 का इंतजार है.  सभी ने अपने-अपने तरीके से नया साल मनाने का सोचा होगा. भले ही इस अवसर पर लोग कितने भी मौज-मस्ती कर लें पर बीते दिनों की यादें जहन में हमेशा बसा रहता है. छोटे शहरों में सीमित संसाधनों के बीच भी दुनिया भर की खुशी हमारे पास हुआ करती थी. आइए इस अवसर पर गुजरे हुए कल को अपने यादों के झरोखे से देखते हैं…


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सुबह की शुरुआत

नववर्ष का इंतजार कई दिनों से रहता था और क्यों न रहे भला. साल का पहला दिन जो होता था. दिन की शुरुआत घर में बड़ों के आशीर्वाद से होता था. सुबह से ही हम सभी पुरे जोश में रहते थे. इस कड़ाके की ठंड में नहाना सुहाता नहीं, लेकिन तब पूजा करने के लिए नहाना ही पड़ता था. रसोईघर में माँ, दीदी और भाभी तरह-तरह के लजीज खाना बनाने में लगी रहती. घर के बड़े ‘आज जो करोगे पुरे साल वही होगा की तर्ज पर’ खूब पढ़ने और खुश रहने की सलाह देते.


दोस्तों के साथ पिकनिक

नए साल में अपने दोस्तों की टोली के साथ पिकनिक का मजा ही निराला होता था. हमसब अपने-अपने घर से खाने-पिने का सामान लेकर पिकनिक के लिए जाते जिसमें हर किसी का अपना योगदान रहता. घर के लजीज खाने को छोड़ पिकनिक में बना कच्चा-पक्का खाकर ही दिल खुश हो जाता. म्यूजिक सिस्टम हो तो ठीक वरना झूमने के लिए विविध भारती के सदाबहार गानें ही काफी होते थे.


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ग्रिटिंग्स कार्ड का जमाना

वाट्सएप और फेसबुक की दुनिया में आज लोग घर पर बैठे-बैठे नए साल की शुभकामनाएं देते हैं लेकिन आज से कुछ साल पहले ग्रिटिंग्स कार्ड का जमाना था. दुकानों पर बहुत पहले ही ग्रिटिंग्स कार्ड सज जाया करते थे. पहली जनवरी पर हर किसी के घर में यही ग्रिटिंग्स कार्ड देखने को मिल ही जाते थे. उस दौरान आपके चेहरे भी खिल उठते थे जब आप ग्रिटिंग्स कार्ड में लिखे संदेश को पढ़ते. यही नहीं, अपने नाम का पहला ग्रिटिंग्स कार्ड मिलते ही आपको बहुत ही गर्व महसूस होता था.


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दूरदर्शन पर कार्यक्रम

तब छोटे शहरों में आज की तरह मजोरंजन के साधन नहीं थे. साल के आखिरी दिन सपरिवार टेलीविजन के पास बैठकर दूरदर्शन पर आनेवाले सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं हिंदी के लोकप्रिय गाने का लुफ्त उठाते थे. तब मजोरंजन के लिए दूरदर्शन और रेडियो ही एक मात्र सहारा हुआ करता था.

आज नववर्ष को सेलिब्रेट करने का अंदाज बदल गया है. आज दोस्तों के साथ पिकनिक की जगह डीजे नाइट्स, क्लब में लाउड म्यूजिक और एल्कोहल ने ले लिया है. नववर्ष के उपलक्ष्य पर क्लब और डीजे नाइट्स के शोर-गूल में वह बड़ों के साथ शिष्टाचार तथा दोस्तों के बीच हंसी ठिठोली कही गुम हो गई है. Next…



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