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अगली बार पत्नी के साथ ही जाइएगा मॉर्निंग वॉक करने !!

Posted On: 20 Apr, 2012 Others में

जिएं तो जिएं ऐसेरफ्तार के साथ तालमेल बिठाती जिंदगी में चाहिए ऐसे जीना जो बनाए आपको सबकी आंखों का नूर

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housewifeआपने बहुत से ऐसे परिवार देखे होंगे जिनमें पुरुष तो किसी ना किसी हेल्थ क्लब के सदस्य होते हैं या फिर जिम जाना और मॉर्निंग वॉक करना उनकी आदत में शुमार होता है. लेकिन उसी परिवार की महिलाएं व्यायाम करने या फिर वॉक करने के स्थान पर घर पर ही रहकर परिवार की देखभाल करती हैं. इन्हें देखकर आप जरूर यह सोचते होंगे कि संभवत: महिलाओं को बाहर आने-जाने की इजाजत नहीं होती इसीलिए वह हमेशा घर पर ही रहती हैं. लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि स्वास्थ्य को ताक पर रखते हुए महिलाओं का केवल घर के कामों में ही व्यस्त रहने का कारण यह है कि उन्हें और उनके परिवार के अन्य सभी सदस्यों को यह लगता है कि घर का काम ही महिलाओं को उचित व्यायाम उपलब्ध करवा देता है इसलिए उन्हें कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं है.


अगर आप भी उन्हीं लोगों में से हैं जिनके अनुसार महिलाओं को व्यायाम करने के लिए किसी जिम या पार्क जाने की आवश्यकता नहीं है तो हाल ही में हुआ एक अध्ययन आपको दोबारा सोचने के लिए विवश जरूर कर सकता है.


अध्ययन की मानें तो वे महिलाएं जो कसरत या किसी भी प्रकार का व्यायाम नहीं करतीं वह खुद को शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचाती हैं. अगर महिलाओं को ऐसा लगता है कि घरेलू काम ही व्यायाम का एक अच्छा विकल्प है तो वह बहुत ही जल्द अवसाद और मेटाबॉलिक सिंड्रोम जैसी अन्य गंभीर बीमारियों की चपेट में आ सकती हैं. जिम या वॉक जैसे व्यायाम ना अपनाकर वह खुद ही बीमारियों तक पहुंचने का रास्ता बनाती हैं.


ऑफ़िस का रोमांस छिपाए कैसे ?



morning walkओरेगान स्टेट यूनिवर्सिटी (अमेरिका) से जुड़े शोधकर्ताओं ने अपने एक अध्ययन में यह पाया कि एक सामान्य महिला को पूरे दिन में कसरत करने के लिए केवल 18 मिनट ही मिलते हैं, जबकि एक पुरुष दिन में लगभग आधा घंटा या उससे भी अधिक समय अपने व्यायाम के लिए निकाल लेता है. इससे महिलाओं में मेटाबॉलिक सिंड्रोम की संभावना बढ़ जाती है. यह एक ऐसी अवस्था में जिसमें महिला बहुत ही जल्द मधुमेह, उच्च-रक्तचाप, बढ़ते वजन और दिल की बीमारी जैसे खतरों की गिरफ्त में आ सकती है.


अगर भारतीय परिदृश्य के अनुसार इस शोध को देखा जाए तो यह बात स्पष्ट रूप से प्रमाणित होती है कि पश्चिमी देशों की अपेक्षा यहां रहने वाली महिलाएं अपने स्वास्थ्य को पूरी तरह नजरअंदाज करती हैं. घरेलू कामों में उलझकर वह अपने सेहत और जरूरी व्यायाम को नकार देती हैं. हम इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते कि विदेशी महिलाओं की तरह अधिकांश भारतीय महिलाएं भी यही सोचती हैं कि घर का काम उनके व्यायाम की सभी जरूरतें पूरी कर देता है, जबकि यह पूरी तरह गलत है. इसीलिए महिलाओं के साथ-साथ उनके परिवार वालों का भी यह दायित्व बनता है कि वह अपने परिवार के सबसे जिम्मेदार और मेहनती व्यक्ति की सेहत का पूरी तरह ध्यान रखें.


कौन सबसे ज्यादा रुलाता है महिलाओं को !!!

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