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बच्चों को सुधारने के लिए डांटते हैं या उन्हें आहत करने के लिए?

Posted On: 4 Mar, 2012 Others में

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हर माता-पिता का यह सपना होता है कि उनकी संतान एक सुखमय और सफल जीवन व्यतीत करे. अपने इस सपने को हकीकत में बदलने के लिए प्राय: सभी अभिभावक कोई भी कसर नहीं छोड़ना चाहते. संतान की शिक्षा-दीक्षा से लेकर उसकी हर छोटी-बड़ी जरूरतों को पूरा करना उनकी पहली प्राथमिकता बन जाती है क्योंकि वह कदापि यह नहीं चाहते कि उनकी ओर से कोई कमी रह जाए जिसका खामियाजा उनके बच्चों को निराश या फिर असफल कर दे.


parents scoldingइन सब जिम्मेदारियों को निभाते हुए अभिभावक अनजाने में ही सही कुछ बड़ी गलतियां भी कर जाते हैं. जिनका पता उन्हें तब चलता है जब सुधार की गुंजाइश लगभग समाप्त हो जाती है. अकसर देखा जाता है कि जब बच्चा कोई गलती करता है या परीक्षा में वह कम अंकों से उत्तीर्ण होता है तो अभिभावक उसे समझाने या फिर मौका देने की बजाए डांटने और फटकारने लगते हैं. इतना ही नहीं कुछ अभिभावक तो पूर्णत: तुलनात्मक रवैया अपना लेते हैं और अपनी संतान की तुलना उन बच्चों से करने लगते हैं जो उनसे ज्यादा अंक लाते हैं. हो सकता है उनके दृष्टिकोण से ऐसा करना सही हो लेकिन एक अध्ययन द्वारा यह प्रमाणित किया गया है कि माता-पिता को बच्चों की पढ़ाई और अन्य भौतिक जरूरतों को पूरा करने के अलावा उन्हें भावनात्मक रूप से भी मजबूती देनी चाहिए. लेकिन अगर उन्हें हर समय डांटेंगे और तुलनात्मक व्यवहार अपनाएंगे तो ऐसा करना उनके मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव ही डालेगा.


अमेरिका स्थित हार्वर्ड विश्वविद्यालय द्वारा संपन्न इस अध्ययन में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि जिन बच्चों के साथ उनके अभिभावक दुर्व्यवहार करते हैं उनके मस्तिष्क के महत्वपूर्ण भाग सिकुड़ जाते हैं, परिणामस्वरूप वे बच्चे आगे चलकर अवसाद जैसी मानसिक परेशानियों के शिकार हो सकते हैं. इतना ही नहीं यह बच्चे नशे के आदी भी बन सकते हैं.


वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि मस्तिष्क के एक महत्वपूर्ण भाग हिप्पोकैम्पस के द्रव्य में कमी और बचपन में हुए दुर्व्‍यवहार के बीच संबंधों का पता लगाकर ऐसे बच्चों की सहायता की जा सकती है जो मानसिक रूप से परेशान रहते हैं या फिर धीरे-धीरे अवसाद जैसी हालातों की ओर बढ़ रहे हैं.


लाइव साइंस नामक पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार इस शोध के अंतर्गत 18 से 25 साल की उम्र के 193 व्यक्तियों के मस्तिष्क का एमआरआई किया गया और इसके बाद इन लोगों के हिप्पोकैम्पस के भागों के आकार का विश्लेषण किया गया. अध्ययन के परिणामों से यह पता चल सकता है कि बचपन में हुए दुर्व्‍यवहार के कारण मनोविकारों या नशीली दवाओं के सेवन का खतरा क्यों बढ़ जाता है?


विदेश में हुए इस अध्ययन को अगर हम भारतीय परिदृश्य के अनुरूप देखें तो इसकी स्थापनाओं को नकारना शायद हमारे लिए संभव नहीं है. यह बात सर्वमान्य है कि विदेशी लोगों की तुलना में भारतीय अपेक्षाकृत अधिक भावुक और पारिवारिक होते हैं. बच्चों और माता-पिता का आपसी संबंध बेहद नजदीकी और परस्पर सद्भावना पर आधारित होता है. अगर माता-पिता अपने बच्चों को हर समय डांटेंगे और उनके साथ तुलनात्मक व्यवहार रखेंगे तो निश्चित ही बच्चों के भावुक मन पर इसका गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. इसीलिए अभिभावकों को चाहिए कि वह पहले अपने बच्चों को समझें, उनकी इच्छाओं और जरूरतों का आंकलन करें, इसके बाद ही उनसे अच्छे अंक या फिर खेलकूद से जुड़ी अपेक्षाएं रखें. क्या पता जिस बच्चे से आप पढ़ाई में अव्वल आने की उम्मीद कर रहे हैं वह खेलकूद में सबसे अच्छा हो. वहीं स्पोर्ट्स में पीछे रहने वाला बच्चा भी पढ़ाई में अतुलनीय साबित हो सकता है.


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