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आपसी झगड़ों को सुलझाना बेहतर जानते हैं विदेशी पुरुष!!

Posted On: 30 Nov, 2011 Others में

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dispute in coupleविवाहित जोड़ों में अनबन और मनमुटाव होना स्वाभाविक माना जाता है. इसके पीछे हमारी यह धारणा विद्यमान रहती है कि छोटे-मोटे झगड़े दंपत्ति को एक-दूसरे के और निकट ले आते हैं. निश्चित रूप से यह कथन उपयुक्त है. प्राय: देखा जाता है कि अनबन के बाद नाराज साथी को मनाने के लिए दूसरा व्यक्ति उसे मनाने की पूरी कोशिश करता है. अपनी गलती की माफी मांगने से लेकर भावनाओं का इजहार करने तक वह लगभग सभी हथकंडे अपना लेता है.


लेकिन कभी आपने यह सोचा है कि विवाहित दंपत्ति या फिर किसी प्रेमी जोड़े में कितने ही संजीदा मसले पर अनबन क्यों ना हो, उन्हें जल्द ही कैसे सुलझा लिया जाता है?


एक नए अध्ययन की मानें तो एक रोमांटिक संबंध में रह रहे लोग बहस के दौरान एक-दूसरे के भावों और विचारों को देखकर ही यह समझ जाते हैं कि उनका साथी कैसा व्यवहार करने वाला है. परिणामस्वरूप वह परिस्थिति के अनुसार ही व्यवहार और क्रोध करते हैं. इसीलिए उनका झगड़ा ज्यादा बढ़ता ही नहीं है और अगर बढ़ भी जाए तो उसे जल्द ही नियंत्रित कर लिया जाता है.


बेलर विश्वविद्यालय (अमेरिका) से जुड़े वैज्ञानिकों ने रोमांटिक संबंध में रह रहे 105 कॉलेज के छात्रों को शामिल कर आठ सप्ताह तक उन पर पूर्ण निरीक्षण किया. अपनी इस स्टडी के दौरान उन्होंने यह देखा कि जब उन दोनों के बीच कोई बहस होती है तो वह किस प्रकार एक-दूसरे के साथ व्यवहार करते हैं.


इस अध्ययन से जुड़े मुख्य शोधकर्ता और चिकित्सीय मनोवैज्ञानिक डॉ. कीथ सैनफोर्ड के अनुसार प्रेमी जोड़े जब एक-दूसरे के साथ समय बिताने लगते हैं तो वह एक-दूसरे के भावों और विचारों को भी परख लेते हैं. इसीलिए जब भी उन दोनों में कोई झगड़ा या विवाद उत्पन्न होता है, तो वह कभी अपने तो कभी दूसरे के भावों में बड़ी चालाकी के साथ हेर-फेर कर देते हैं.


सैनफोर्ड का कहना है कि प्रेमी जोड़े में झगड़े के समय दो प्रकार के नकारात्मक भाव उत्पन्न होते हैं. पहला नम्र और दूसरा कठोर. जहां कठोर भाव एक-दूसरे पर जरूरत से ज्यादा चिल्लाने और क्रोध करने जैसी क्रियाओं को बढ़ावा देते हैं वहीं नम्र भाव संवेदशीलता प्रदर्शित करते हैं.


शोधकर्ताओं के अनुसार प्रेमी जोड़ों में दो परिस्थितियों में झगड़ा उत्पन्न होता है. पहला जब किसी एक को अपना साथी दमनकारी और शत्रु लगने लगे. व्यक्ति को लगे कि अब परिवार और वैवाहिक जीवन में उसकी महत्ता समाप्त हो चुकी है. तो वह उग्र या कठोर व्यवहार करने लगता हैं. वहीं दूसरी ओर जब व्यक्ति अपने साथी द्वारा स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगे, कहीं ना कहीं जब दांपत्य जीवन में निरसता और असुरक्षा की भावना विकसित हो जाए तो फिर वही साथी रोष उत्पन्न करने लगता है.


जब व्यक्ति को लगने लगे कि उसका साथी बहुत कठोर हो रहा है, क्रोध और आक्रोश  भरा व्यवहार कर रहा है तो वह स्वयं अपने क्रोध और नकारात्मक विचारों पर नियंत्रण पा लेते हैं. इसके विपरीत जब साथी द्वारा नम्र व्यवहार किया जाए तो वह अपने अनुसार व्यवहार करता है. क्योंकि वह जानता है कि बात ज्यादा नहीं बढ़ेगी.


अगर इस अध्ययन को भारतीय परिवेश के अनुसार देखा जाए तो यहां भी ऐसे ही समान हालात देखे जा सकते हैं. प्राय: देखा जाता है कि जब भी पति-पत्नी में झगड़ा होता है तो दोनों में से कोई एक झगड़े को नियंत्रित करने की पूरी कोशिश करता है. जब तक संभव हो पाता है, अनबन को टालने की पूरी कोशिश की जाती है.


हालांकि हम इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते कि भारतीय पुरुष अपेक्षाकृत अधिक आक्रोशित होते हैं. यही कारण है कि घरेलू हिंसा और स्त्री दमन जैसी घटनाएं भी भारत में मुख्य रूप से देखी जाती हैं.


कहते हैं सच हमेशा कड़वा ही होता है. भारतीय परिदृश्य के अनुरूप हमारे पारिवारिक और सामाजिक हालातों के अनुसार स्त्री का सम्मान भी एक कड़वा सच ही है.


हम भले ही समानता के तमाम दावे कर लें लेकिन आज भी पत्नी के अस्तित्व को चोट पहुंचाना और परिवार में उसकी उपस्थिति का निरादर करना पुरुषों का स्वभाव बना हुआ है. छोटी-छोटी बात पर झगड़ा और गाली-गलौज करना पुरुषों की आदत में शुमार है. ऐसे में अनबन को सुलझाना या अपने ऊपर नियंत्रण करने जैसी बातें सिर्फ अपवाद के रूप में ही सामने आती हैं. हो सकता है कि विदेशी लोगों के दांपत्य जीवन पर किया गया यह अध्ययन जाने-अनजाने ही सही भारतीय पुरुषों को कोई सीख दे जाए.


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