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जानलेवा साबित हो सकता है जीवन-साथी का बिछड़ जाना

Posted On: 12 Aug, 2011 Others में

जिएं तो जिएं ऐसेरफ्तार के साथ तालमेल बिठाती जिंदगी में चाहिए ऐसे जीना जो बनाए आपको सबकी आंखों का नूर

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old age coupleकिस्से कहानियों में तो हमने अकसर ऐसा देखा या सुना होगा कि अगर प्रेमी जोड़े में से किसी एक की मृत्यु हो जाती है तो उसके शोक में दूसरा व्यक्ति भी जल्द ही अपने प्राण त्याग देता है. लेकिन क्या सच में ऐसा होता है, या ऐसी प्रेम कहानियां, इतनी मजबूत भावनाएं, मन बहलाने के लिए ही सुनाई जाती हैं. वैसे आजकल की जीवनशैली में लोगों की प्राथमिकाएं इस हद तक बदल चुकी हैं कि उनके भीतर प्रेम और भावनाओं के लिए कोई जगह ही नहीं बची. अब ऐसे में अपने साथी के मरने के बाद अकेला व्यक्ति उसकी याद में अपना जीवन त्याग दे, ऐसा सोचना भी काल्पनिक प्रतीत होता है.

लेकिन हाल ही में हुए एक शोध के नतीजे हमारी इस मानसिकता पर गहरा आघात करते हुए यह साबित करते हैं कि प्रेम में अपनी जान गंवा देना मनगढ़ंत कहानी नहीं बल्कि हकीकत है.


सेंट ऐंड्रूज यूनिवर्सिटी द्वारा कराए गए इस सर्वेक्षण की मानें तो लगभग 40% महिलाओं और 26% पुरुषों ने अपने साथी के गुजर जाने के तीन वर्षों के भीतर ही अकेलेपन और उसके बिछड़ जाने के गम में अपना दम तोड़ दिया. जब उनके मौत के कारणों की पुष्टि हुई तो अपने साथी की याद में जान देने वाले लोगों में से अधिकतर लोगों ने आत्महत्या की, जबकि कुछ लोग दिल की बीमारियों और दुर्घटनाओं का शिकार हो गए. यह कहना गलत नहीं होगा कि उनके भीतर का अकेलापन ही उनके जीवन की समाप्ति का कारण बन गया.


एक अनुमान के मुताबिक जिन परिवारों पर यह शोध किया गया है, उनमें से अधिकतर लोगों का देहावसान साथी के मरने के छ: महीने के अंदर-अंदर हो गया यानि चालीस व्यक्तियों ने अपने साथी के चल बसने के 10 दिनों के भीतर ही अपना जीवन त्याग दिया. इतना ही नहीं बारह लोग उसी दिन मृत्यु को प्राप्त हो गए जिस दिन उनके साथी का देहांत हुआ था.


हैरानी वाली बात तो यह है कि यह आंकड़ा केवल वृद्ध दंपत्तियों से ही संबंधित नहीं है बल्कि 30-40 वर्ष की आयु वर्ग के लोग, जिन्होंने साथी के मौत के गम में अपना जीवन त्याग दिया, भी इस शोध में सम्मिलित किए गए हैं. यह साफ प्रमाणित करता है कि हम जिन युवाओं को असंवेदनशील और रिश्तों के प्रति लापरवाह कहते हैं वह भी अपने साथी से भावनात्मक रूप से इतना अधिक जुड़ जाते हैं कि उनके बिना जीने की सोचना भी उनके लिए दुखद हो जाता है.


शोधकर्ताओं का कहना है कि पारिवारिक-सामाजिक कारक हमारी आयु सीमा पर बहुत अधिक प्रभाव डालते हैं. खासतौर पर किसी प्रियजन के बिछुड़ने का दर्द सहन करना कठोरतम व्यक्ति के लिए भी बहुत मुश्किल है. इसीलिए उन्होंने यह सुझाव दिया है कि अगर कोई व्यक्ति ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति से गुजर रहा है तो उसे अकेला नहीं छोड़ना चाहिए. क्योंकि यही अकेलापन उसे अंदर ही अंदर कचोटता रहता है. हालांकि जो चला गया उसकी जगह तो दूसरा कोई नहीं ले सकता लेकिन हम उनका खयाल रख, उनकी खुशियों का ख्याल रख परिवार में उनकी अहमियत से उन्हें अवगत करवा सकते हैं.


हालांकि यह शोध एक ब्रिटिश संस्थान द्वारा करवाया गया है, इसीलिए इसे भारत के संदर्भ में जोड़कर देखना भी बहुत जरूरी है. विवाह जैसे संबंध विदेशों से कहीं ज्यादा अहमियत भारत में रखते हैं. वैवाहिक दंपत्ति तन, मन से एक-दूसरे के हो जाते हैं. ऐसे में अगर किसी अप्रिय घटना की वजह से एक की मृत्यु हो जाए तो निश्चय ही दूसरा व्यक्ति अकेला पड़ जाता है. उसे अपना खुद का जीवन भी बोझ लगने लगता है. ऐसे हालातों में हम इस सर्वेक्षण में संलिप्त वैज्ञानिकों के सुझावों पर अमल कर अकेलेपन में जीने के लिए विवश लोगों को कुछ ना सही अपना नैतिक समर्थन तो दे ही सकते हैं.


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