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फूहड़ता में भी अव्वल हैं पाश्चात्य देश

Posted On: 5 Sep, 2011 Others में

जिएं तो जिएं ऐसेरफ्तार के साथ तालमेल बिठाती जिंदगी में चाहिए ऐसे जीना जो बनाए आपको सबकी आंखों का नूर

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love relationshipभारतीय परिवेश में विवाह से पहले किसी भी प्रकार का शारीरिक आकर्षण तो छोड़िए युवक और युवती के बीच अत्याधिक निकटता को भी सहन नहीं किया जाता. जहां तक शारीरिक संबंधों की बात है तो इसे केवल पति-पत्नी के बीच का आपसी मसला ही माना जाता है. इनका सार्वजनिक प्रदर्शन समाज की नजर में घृणित और फूहड़ समझा जाता है. लेकिन अमेरिका में हुए एक नए शोध ने यह प्रमाणित कर दिया है कि ऐसी मानसिकता और मान्यताएं केवल भारत जैसे सभ्य और शालीन समाज पर ही लागू होती हैं. अत्याधुनिक हो चुके पाश्चात्य देशों में शारीरिक संबंध किसी सीमा या दायरे के मोहताज नहीं रह गए हैं. व्यक्ति सामाजिक और पारिवारिक रूप से इतने अधिक स्वतंत्र हैं कि वे जब चाहे जहां चाहे एक-दूसरे के साथ संबंध स्थापित कर सकते हैं. उन पर किसी भी प्रकार की कोई बंदिशें नहीं लगाई जाती हैं.


अमेरिका के लगभग 500 लोगों को केन्द्र में रखकर कराए गए इस शोध ने यह स्थापित कर दिया है कि पाश्चात्य देशों में शारीरिक संबंधों जैसे व्यक्तिगत संबंधों का प्रदर्शन कोई बड़ी बात नहीं है. वह शारीरिक भोग और विलास जैसी चीजों में इतने अधिक संलिप्त हो चुके हैं कि वह कब क्या कर रहे हैं, उन्हें इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता. अगर उन्हें संभोग करना है तो वह कहीं भी कर सकते हैं. ऐसे में यह कतई मायने नहीं रखता कि वह शादीशुदा हैं या नहीं. शोध में शामिल अधिकांश व्यक्तियों ने बिना किसी हिचक के यह स्वीकार किया है उन्होंने पार्क  जैसे सार्वजनिक स्थानों में भी कई बार शारीरिक संबंध बनाए हैं. इसके अलावा पब्लिक बाथरूम और कैब भी उनकी लिस्ट में सबसे ऊपर थे.


हद तो तब हो गई जब 43% लोगों ने इस बात को बड़ी रोचकता से माना कि उन्होंने एक समय में दो या दो से अधिक व्यक्तियों के साथ सेक्स, उनकी भाषा में जिसे ग्रुप सेक्स कहा जाता है, भी किया है. इतना ही नहीं, ग्रुप सेक्स उन्हें ज्यादा दिलचस्प और मनोरंजक लगता है. इस आंकड़े को देखते हुए उन लोगों के बारे में बात करने का कोई औचित्य नहीं है जिन्होंने एक ही दिन में अलग-अलग व्यक्तियों के साथ संबंध स्थापित किए हैं. हैरान कर देने वाली बात तो यह है कि ऐसे अभद्र और असभ्य शारीरिक आचरण में महिलाएं भी पूरी तरह से लिप्त हैं. वह भी इसे कोई बड़ी बात नहीं समझतीं. गौर करने वाला तथ्य यह है कि 30% लोगों ने इस प्रकार के सेक्स को गलत नहीं माना है.


उपरोक्त तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर यह कहना गलत नहीं होगा कि विदेशी लोगों ने सभ्यता और शालीनता की सारी हदें तोड़ दी हैं. वह खुद को कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र महसूस करते हैं. इसमें कुछ हद तक गलती उनके परिवार और समाज की भी है, क्योंकि वह उन्हें ऐसा करने की इजाजत देता है. सार्वजनिक स्थानों पर यह सब करना उन्हें भद्दा नहीं मॉडर्न लगता है. शारीरिक संबंध उनके लिए मात्र जीवन शैली के एक हिस्से से ज्यादा और कुछ नहीं है.


लेकिन ऐसी परिस्थितियां भारतीय समाज और उसकी संस्कृति के लिए बेहद घातक सिद्ध हो सकती हैं. प्राय: यहां भी देखा जाता है कि युवा प्रेमी जोड़े पार्क जैसे सार्वजनिक स्थानों पर एक-दूसरे के प्रति प्रेम-प्रदर्शन कर रहे होते हैं. समाज द्वारा लगाए गए बंधन उन्हें अपनी सीमा लांघने नहीं देते, लेकिन फिर भी कभी-कभार वह फूहड़पने की सारी हदें पार कर लेते हैं. हैरत की बात है कि उन्हें यह सब गलत नहीं लगता. लेकिन अगर विदेशों के साथ तुलना की जाए तो कहा जा सकता है कि हमने आधुनिकता की बयार और मॉडर्न लाइफ स्टाइल को अपनाने के बाद भी अपनी संस्कृति और मान्यताओं को नहीं छोड़ा है. हालांकि अपवाद तो सभी जगह होते हैं, इसीलिए हम इन्हें पूरी तरह संतोषजनक हालात तो नहीं कह सकते.


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