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दिया तले अंधेरा ही साबित हुआ स्वीप प्लान!

Posted On: 13 Apr, 2014 Others में

समाचार एजेंसी ऑफ इंडियाJust another weblog

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(लिमटी खरे)

सिवनी जिले में मतदाताओं को मतदान के प्रति जागरूक करने और मतदान के इस महापर्व में लोगों की भागीदारी बढ़ाने के लिए स्वीप प्लान चलाया गया। स्वीप प्लान के वाहन जिले भर में धूल उड़ाते घूमते रहे। कभी कवि सम्मेलन तो कभी स्वीप होली का आयोजन किया गया। लग रहा था मानो इस बार स्वीप प्लान के कारण सिवनी जिले में मतदाता अपने-अपने मताधिकार के प्रति जागेंगे और मतदान का प्रतिशत पिछली विधानसभा के मुकाबले कुछ हद तक बढ़ जाएगा।

स्वीप प्लान के तहत न जाने कितनी टी शर्ट जिस पर वोट देने के लिए प्रेरित करने के कोटेशन लिखे हुए थे, पहनकर अधिकारी कर्मचारी और शहर के लोग घूमते दिखे। स्वीप होली में भी बड़ी तादाद में श्वेत धवल टीशर्ट्स को रंग दिया गया। ये शर्ट्स सरकारी स्तर पर खरीदी गई होंगी। कुछ अधिकारी मन ही मन इस तरह की कथित बर्बादी को लेकर अंदर ही अंदर नाराज भी दिख रहे थे।

स्वीप में हुए खर्च की जानकारी मांगेंगे

जिला न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता पंकज शर्मा का कहना है कि वे स्वीप प्लान के तहत हुए इस आयोजन में कितना व्यय हुआ इस बात की जानकारी सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त करने का प्रयास अवश्य करेंगे ताकि वे इस बात का आंकलन कर सकें कि स्वीप प्लान में सरकारी स्तर पर हुए व्यय के क्या प्रतिसाद सामने आए हैं।

कर्मचारी ही वोट देने से रहे वंचित

अधिवक्ता पंकज शर्मा ने यह भी कहा कि उनको समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया की खबरों के मार्फत इस बात की जानकारी मिली है कि जिले के हजारों कर्मचारियों को वोट देने ही नहीं मिला है। इसका कारण उन्हें ईडीसी (इलेक्शन ड्यिूटी प्रमाण पत्र) नहीं मिलना बताया जा रहा है। दरअसल अगर किसी सरकारी कर्मचारी को उसकी मतदाता सूची के बाहर वाले लोकसभा क्षेत्र में तैनात किया जाता है तो उसे निश्चित तौर पर पोस्टल वैलट दिया जाएगा, पर अगर वह अपने ही लोकसभा क्षेत्र में तैनात रहता है (भले ही विधानसभा बदल जाए) तो भी उसे तैनाती वाले मतदान केंद्र में ईडीसी के जरिए वोट देने दिया जाता है।

नहीं मिले ईडीसी

बताते हैं कि अनेक कर्मचारियों को ईडीसी ही प्राप्त नहीं हो सके हैं। पहले और दूसरे प्रशिक्षण में अनेकानेक प्रपत्र भरवाए जाने के बाद कर्मचारियों को कहा गया था कि उन्हें बाद में पॉलीटेक्निक कॉलेज से मतदान सामग्री के वितरण के समय प्रथक काउंटर बनवाकर ईडीसी दे दिया जाएगा। जब कर्मचारी सामग्री लेकर उस काउंटर पर पहुंचे तो वहां उन्हें ईडीसी नहीं मिला। बाद में यह कहा गया कि उन्हें ईडीसी सेक्टर मजिस्ट्रेट के माध्यम से मतदान केंद्र में ही सीधे भिजवा दिया जाएगा। विडम्बना ही कही जाएगी कि कर्मचारियों को ईडीसी न मिल पाने के कारण वे मतदान से वंचित ही रह गए।

जोर शोर से चला स्वीप प्लान

जिले भर में स्वीप प्लान को जोर शोर से सरकारी स्तर पर चलाया गया था। प्रशासनिक अधिकारियों का यह प्रयास था कि स्वीप प्लान के जरिए वे जिले भर में लोगों को मतदान के लिए जागरूक करें। लोगों को मतदान के फायदे भी बताए गए। इसके लिए कवि सम्मेलन का आयोजन भी किया गया। इतना ही नहीं मिशन उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में स्वीप होली का आयोजन भी किया गया, जिसमें शहर के अनेकानेक लोगों ने शिरकत भी की। स्वीप प्लान जिस स्तर पर चलाया जा रहा था उससे लग रहा था कि इस बार विधानसभा चुनावों से ज्यादा मतदान हो सकता है।

विधानसभा से कम हुआ मतदान!

पर यह क्या? जब मतदान के बाद शाम छः बजे का आंकड़ा जिला जनसंपर्क कार्यालय द्वारा जारी किया गया तो उसमें मतदान का प्रतिशत विधानसभा चुनावों से कमतर ही रहा। यह अलहदा बात है कि जनसंपर्क विभाग द्वारा जारी आंकड़ों में मतदान के प्रतिशत को वर्ष 2009 के लोकसभा चुनावों से ज्यादा दर्शाया गया। वस्तुतः यह आंकड़ों की बाजीगरी से ज्यादा कुछ नहीं माना जा सकता है। वर्ष 2009 की तुलना में इस बार मतदाताओं की संख्या में इजाफा हुआ है। इस लिहाज से मतदान का प्रतिशत बढ़ना ही था, पर हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों के आंकड़ों पर अगर गौर फरमाया जाए तो यह आंकड़ा उससे कम ही आया है।

यह है आंकड़ा!

पिछले साल नवंबर में संपन्न विधानसभा चुनावों में 114 बरघाट विधानसभा में 80.50 प्रतिशत पुरूष, 80.95 प्रतिशत महिलाओं के साथ कुल 80.72 प्रतिशत मतदान हुआ था। इसके जवाब में महज पांच माह बाद संपन्न हुए लोकसभा चुनावों में बरघाट विधानसभा में 72.85 प्रतिशत पुरूष, 72.59 प्रतिशत महिलाओं के साथ कुल 72.72 प्रतिशत मतदान हुआ था। क्या पांच माह के बाद स्वीप प्लान के प्रयासों के बाद मतदान का प्रतिशत बढ़ पाया! जाहिर है आंकड़ों के अनुसार आठ फीसदी मतदान में कमी ही आई है।

सिवनी विधानसभा पर नजर डाली जाए तो 115 सिवनी विधानसभा में विधानसभा चुनावों में 77.45 प्रतिशत पुरूष, 77.45 प्रतिशत महिलाओं के साथ कुल मतदान 76.97 प्रतिशत हुआ था। वहीं, इस बार लोकसभा चुनावों में 67.70 प्रतिशत पुरूष, 62.61 प्रतिशत महिलाओं के साथ कुल मतदान 65.22 प्रतिशत हुआ है। इस तरह सिवनी विधानसभा में लोकसभा चुनावों में विधानसभा चुनावों की तुलना में निश्चित रूप से 11.75 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।

वहीं 116 केवलारी विधानसभा में विधानसभा चुनावों के दौरान 82 प्रतिशत पुरूष, 82.12 प्रतिशत महिलाओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। केवलारी विधानसभा में मतदान का कुल प्रतिशत 82.06 रहा था। इस बार लोकसभा चुनावों में यह प्रतिशत घट गया। इस बार 70.20 प्रतिशत पुरूषों एवं 66.46 प्रतिशत महिलाओं के साथ कुल 65.22 प्रतिशत मतदान हुआ है। इस तरह देखा जाए तो केवलारी विधानसभा क्षेत्र में लोकसभा चुनावों में चलाए गए स्वीप प्लान के बाद भी 13.68 प्रतिशत कम मतदान हुआ है।

इसी तरह 117 लखनादौन विधानसभा में विधानसभा चुनावों के दौरान 77.54 प्रतिशत पुरूषों और 78.68 प्रतिशत महिलाओं के साथ कुल 76.33 प्रतिशत मतदान हुआ था। इस बार लोकसभा चुनावों में 67.47 प्रतिशत पुरूषों और 69.02 प्रतिशत महिलाओं के साथ कुल 65.85 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया है। इस तरह यहां भी स्वीप प्लान के अभियान के बाद भी 10.48 प्रतिशत कम ही मतदान हुआ है।

गिरा है मतदान का प्रतिशत

विधानसभा चुनावों में जहां 76.4 प्रतिशत मतदान हुआ था वहीं, लोकसभा चुनावों में मतदान का प्रतिशत गिरकर 68.04 हो गया है। इस तरह स्वीप प्लान के झंके-मंके के बाद भी जिले में विधानसभा चुनाव की तुलना में मतदान का प्रतिशत 8.36 गिरा है। क्या इसे स्वीप प्लान की सफलता माना जा सकता है?

आंकड़े बाजी का खेल

हमारी नितांत निजी राय में जिस तरह के आंकड़े जनसंपर्क विभाग द्वारा जारी किए गए हैं वह महज आंकड़ों के खेल से कम नहीं है। 2009 में संपन्न लोकसभा चुनावों के बाद मतदाताओं की तादाद में इजाफा हुआ होगा। चुनाव वही है चाहे लोकसभा का हो या विधानसभा का, मतदाता कमोबेश वही हैं। स्वीप प्लान पूरे शवाब पर था, फिर क्या कारण था कि विधानसभा के मुकाबले मतदान का प्रतिशत गिरता चला गया। अमूमन इस तरह की आंकड़े बाजी सियासी दलों में देखने को मिलती है। जब भी किसी प्रदेश में कोई सियासी दल की हार होती है तो उसके प्रदेश स्तरीय क्षत्रपों द्वारा वोट के प्रतिशत आदि के आंकड़े आलाकमान के समक्ष रखकर उन्हें भरमाने का प्रयास किया जाता है कि हम फलां प्रदेश में कम सीटें जीते हैं तो क्या हुआ हमारा वोट प्रतिशत तो बढ़ा है, इस तरह आलाकमान या शीर्ष नेता उनकी दलील सुनकर संतुष्ट हो जाते हैं। वहां कोई यह सवाल नहीं करता कि वोट परसेंटेज का क्या करेंगे भई? हम प्रदेश में सरकार तो नहीं बना पाए न!

पता नहीं किसके खाते के रहे होंगे वोट!

सरकारी कर्मचारियों में जिन कर्मचारियों को मतदान करने का अवसर नहीं मिला उन्हें अब शायद ही यह मौका मिल पाए। जानकारों का कहना है कि मतदान के पूर्व तक पोस्टल वेलेट जारी किए जा सकते हैं। मतदान के उपरांत पोस्टल वेलेट शायद जारी नहीं किए जा सकते हैं। हां, मतगणना के पूर्व पोस्टल वेलेट स्वीकार अवश्य ही किए जा सकते हैं। अब समस्या यह है कि मतदान से वंचित कर्मचारियों को वोट डालने का अवसर मिल पाएगा या नहीं? साथ ही साथ मतदान से वंचित इन कर्मचारियों के वोट किसके खाते में जाने वाले थे यह भी रहस्य ही बना हुआ है।

दिया तले अंधेरा

कितने आश्चर्य की बात है कि सरकारी स्तर पर स्वीप प्लान चलाया जा रहा था वह भी वोट परसेंटेज को बढ़ाने के लिए। पर यह क्या सिवनी में विधानसभा के मुकाबले 10.48 प्रतिशत कम मतदान हुआ। क्या इसे तर्क संगत ठहराया जा सकता है कि जो सरकारी कर्मचारी मतदान का प्रतिशत बढ़ाने के लिए एड़ी चोटी एक कर रहे हों उन्हें ही मतदान से वंचित रहना पड़ जाए? जाहिर है नहीं। इसके लिए जिला निर्वाचन अधिकारी और जिला कलेक्टर को संज्ञान लेना होगा। जिन कर्मचारियों को ईडीसी नहीं मिला है उनको यह न मिल पाने के लिए जवाबदेह कौन हैं? इन सारे जवाबदेहों को ढूंढकर उनके खिलाफ कठोर कार्यवाही जरूरी है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो हो सकता है कि आने वाले चुनावों में कामचोर कर्मचारियों के हौसले बुलंदी पर आ जाएं और अराजकता फैलने लगे, इसलिए जिला कलेक्टर भरत यादव को कठोर कदम उठाकर एक नजीर पेश करना आवश्यक है, ताकि भविष्य में इस तरह की गड़बड़ियों को रोका जा सके।

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