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एनकाऊंटर को क्यों मिल रहा जन समर्थन!

Posted On: 8 Dec, 2019 Common Man Issues में

समाचार एजेंसी ऑफ इंडियाJust another weblog

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आखिर क्या वजह है कि हैदराबाद में पुलिस के द्वारा चार आरोपियों के एनकाऊॅटर को देश भर विशेषकर सोशल मीडिया पर व्यापक जनसमर्थन मिल रहा है! देश की सबसे बड़ी पंचायत में गुजरे जमाने की अदाकारा जया बच्चन के द्वारा बलात्कारियों को जनता के हवाले कर दिए जाने की बात पर शेम शेम के नारे लगने के बजाए मौन रहकर इसका समर्थन किया गया! जाहिर है सिस्टम के दोष को सभी स्वीकार कर रहे हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि जनता खुले रूप से तो जनता के चुने हुए प्रतिनिधि मौन रहकर इस बात को समर्थन देतेे दिख रहे हैं। मानवाधिकार की दुहाई देने वालों को भी सोशल मीडिया पर आड़े हाथों लिया जा रहा है। हालात देखकर यही लग रहा है कि आम जनता बलात्कार के मामले में अब बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं रह गई है। अब जनता आर पार की स्थिति से दो चार होने को खड़ी दिखाई दे रही है।

 

 

1978 के संजय गीता चौपड़ा हत्याकाण्ड के बाद 2012 में निर्भया मामले में देश उबल पड़ा था। निर्भया काण्ड में जस्टिस वर्मा समिति की रिपोर्ट के आने से लोगों में आस बंधी थी कि महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों पर नकेल कसी जा सकेगी। समय बीता लोगों का आक्रोश ठण्डा पड़ा, फिर हुक्मरानों ने भी इस तरह के मामलों में तवज्जो देना बंद कर दिया। एक समय था जब बलात्कार के मामले प्रकाश में आते थे पर बलात्कारी पुरूष अकेला होता था। कुछ समय से सामूहिक रूप से बलात्कार के मामले प्रकाश में आ रहे हैं जो चिंता का विषय है। समाज को किस ओर ले जाया जा रहा है इस बारे में विचार करने की महती जरूरत है।

 

 

आखिर पुरूष वर्ग की मानसिकता में इस तरह का विकृत परिर्वतन क्यों आ रहा है! हमारी नितांत निजि राय में इसके लिए टीवी पर दिखाए जाने वाले धारावाहिक जिनमें विवाहेत्तर संबंधों को जमकर उकेरा जाता है के साथ ही साथ इंटरनेट पर पसरी अश्लीलता काफी हद तक जिम्मेदार है। अस्सी के दशक तक सिनेमा ही मनोरंजन का साधन हुआ करता था। इस दौर में इश्क, मुश्क, प्रेम, प्यार की फिल्मों में जमकर ब्रांडिंग की जाती थी। उस दौर में बलात्कार जैसी घटनाओं से ज्यादा प्रेम प्रसंग सामने आते थे।

 

 

कालांतर में जबसे देश में छोटे पर्दे ने घरों घर आमद दी और इसमें धारावाहिकों का प्रसारण आरंभ हुआ, उसके बाद से सीरियल्स में विवाहेत्तर संबंधों, बलात्कार, जुर्म, कत्ल आदि पर आधारित सीरियल्स की बाढ़ सी आ गई। इसके चलते देश की युवा पीढ़ी अपनी वास्तविक परंपराओं से बहुत दूर चली जाती गई। आज युवाओं के हाथ में मोबाईल है। सस्ते इंटरनेट पर अश्लील फिल्में अनेक वेब साईट्स पर आसानी से उपलब्ध हैं। सरकारों के द्वारा इन साईट्स को बैन किया गया है, पर कुछ साफ्टवेयर इस तरह के आ चुके हैं जिनके जरिए आप अपनी लोकेशन किसी अन्य देश में दर्शाकर अश्लील वेब साईट्स को आसानी से खोल सकते हैं। इंटरनेट पर अनेक वेब साईट्स में देश के ही युवक युवतियों के अश्लील वीडियो यहां तक कि शालाओं के वीडियो भी आसानी से देखे जा सकते हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि समाज में बच्चे और युवा किस कदर दिशाहीन हो चुके हैं।

 

 

 

देश में अपराध विशेषकर बलात्कार बढ़ने के प्रमुख कारकों में बेरोजगारी, नशे की लत और शिक्षा व्यवस्था में लगातार होने वाले प्रयोग ही माने जा सकते हैं। आजादी के उपरांत देश में शिक्षा का मूल उद्देश्य विद्यार्थियों को सही और गलत का ज्ञान देना होता था। हितोपदेश, पंचतंत्र आदि की कहानियों के जरिए विद्यार्थियों के मानस पटल पर आदर्श समाज की तस्वीर उकेरने का प्रयास किया जाता था। वर्तमान शिक्षा प्रणाली विद्यार्थियों के लिए बहुत ज्यादा उबाऊ, रोजगारपरक हो गई है। इसमें प्रेरणास्पद, उपदेशात्मक, समाज सुधार जैसी चीजें गौड़ हो चुकी हैं।

 

 

 

बहरहाल सोशल मीडिया पर हैदराबाद में हुए चार आरोपियों के एनकाऊॅटर में अगर कानूनी पक्ष की कोई बात करता नजर आता है तो उसे तरह तरह की बातें सुनने पर मजबूर होना पड़ रहा है। कोई भी इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस की कमी या गलति को सुनने को तैयार नहीं है। जाहिर है लोगों में गुस्सा है और वे धीमी न्याय प्रक्रिया से संतुष्ट नहीं हैं। इसके पहले भी अनेक मामलों में लोगों ने आरोपियों और अपराधियों को बचते हुए देखा है।

 

 

 

देश के नीति निर्धारकों, हुक्मरानों को इस बात पर विचार करना होगा कि आखिर क्या वजह है कि हैदराबाद के एनकाऊॅटर का सोशल मीडिया पर इस कदर समर्थन क्यों मिल रहा है। जिस तरह की कहानी पुलिस के द्वारा बताई जा रही है उससे कोई भी संतुष्ट नहीं दिख रहा है पर इसके बाद भी पुलिस की कार्यवाही को लोग आंख बंद करके समर्थन देते नजर आ रहे हैं। इससे साफ हो जाता है कि लोगों में इस तरह की घटनाओं से गुस्सा जमकर भर चुका है। अब लाग बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं दिख रहे हैं। यह गुस्सा अजय देवगन अभिनीत गंगाजल सिनेमा के मानिंद ही नजर आ रहा है। इस गुस्से में देश का शायद ही कोई वर्ग शामिल न हो। संसद तक में इस तरह के मामलों में इक्का दुक्का सांसद ही इससे खफा नजर आ रहे है, बाकी सबका मौन समर्थन भी मिलता ही दिख रहा है।

 

 

 

06 दिसंबर को जैसे ही चारों आरोपियों को ढेर किए जाने की खबरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं उसके बाद की प्रतिक्रियाओं पर अगर गौर किया जाए तो यही बात उभरकर सामने आ रही है कि लोगों को लगा उन्होंने मैदान मार लिया हो। हैदराबाद पुलिस को जिस तरह से पलक पांवड़ों पर बिठाया जा रहा है उसे देखकर तो यही लग रहा है कि लोग इस तरह के कृत्य को अंजाम देने वाले दोषियों के साथ ही साथ धीमी न्यायिक प्रक्रिया के खिलाफ ही है। पुलिस की कार्यप्रणाली को सही ठहराने की कवायद पर भी विचार की जरूरत है। यह भी एक संकेत है जिसे सरकारों को भांपने की जरूरत है।

 

 

 

इस पूरे मामले में एक बात पर गौर करना जरूरी है। वह यह है कि जिन चार आरोपियों को पुलिस ने पकड़ा था वे वास्तविक दोषी या आरोपी थे या नहीं यह बात अभी साबित नहीं हो पाई है। सब कुछ पुलिस की कहानी के आधार पर ही है। पुलिस की कहानी के आधार पर ही लोग इन चारों को आरोपी मान रही है। इन चारों का एनकाऊॅटर करने पर देश में जश्न जैसा माहौल है, भले ही ये असली आरोपी हों या न हों। इससे यह बात भी स्थापित होती दिख रही है कि देश की जनता चाह रही है कि इस तरह के एनकाऊॅटर से देश भर में एक संदेश जाए ताकि आने वाले समय में इस तरह की पैशाचिक हरकतें करने के पहले कोई भी व्यक्ति सौ मर्तबा विचार जरूर करे।

 

 

 

इस पूरे घटनाक्रम में एक बात और उभरी है वह यह कि जनता के द्वारा पुलिस के एनकाऊॅटर का स्वागत करने के पीछे शायद यह मंशा भी है कि देश की न्याय व्यवस्था में जब तक पीड़िता को न्याय मिलता तब तक उसे या उसके परिजनों को यह लगने लगता कि अब शायद न्याय नहीं मिलने वाला या मिलेगा भी तो तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। 2012 के निर्भया काण्ड के दोषी आज भी जेल में बंद हैं, उन्हें अब तक फांसी के फंदे पर नहीं लटकाया गया है। जिस बेटी के साथ इस तरह की पैशाचिक हरकत की गई होगी उसके परिवार के लोगों पर क्या गुजर रही होगी। निश्चित तौर पर अगर देश की न्याय व्यवस्था के द्वारा समय सीमा में कार्यवाही करने पर सरकारों को मजबूर कर दिया गया होता तो इस तरह के एनकाऊॅटर पर जश्न का माहौल कतई नहीं रहता।

 

 

 

आज जरूरत देश के सिस्टम को सुधारने की है। शायद ही कोई सियासी दल ऐसा होगा जहां, बलात्कार, हत्या आदि जघन्य अपराधों के आरोपियों को पार्टी ने टिकिट देकर विधान सभा या लोक सभा की दहलीज तक न पहुंचाया हो। जब तक इस तरह के लोगों का महिमा मण्डन किया जाता रहेगा तब तक देश में होने वाले इस तरह के एनकाऊॅटर्स पर लोग खुशी मनाकर अपनी भावनाएं प्रकट करते नजर आएं तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। अब समय आ गया है जब सरकारों को जघन्य अपराधों के मामलों को समय सीमा में बांधकर इनका निपटारा करने की व्यवस्था करना ही होगा, वरना आने वाले समय की तस्वीर और भी भयावह हो जाए तो . . .!

 

 

 

 

नोट : यह लेखक के निजी विचार हैं, इससे संस्‍थान का कोई लेना-देना नहीं है।

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