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"क्षितिज" के उस पार या इस पार????

Posted On: 9 Sep, 2010 Others में

मेरी आवाज सुनोमेरी आवाज़ ही पहचान है॥

razia mirza listenme

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xitij ki us par

मैंने जब अपनी पहली काव्य/गज़ल की पुस्तिका “क्षितिज” 1995 में लिखी थी तब पुस्तिका का टाईटल संजोग से ही “क्षितिज” रख़ा था।

मेरा मन जब भी क़ुदरत की हर भेंट को निहारता तब मैं बहोत ही झुमझुम जाया करती।

आकाश-धरती के मिलन की रेखा को देख मुझे लगता काश!!! मैं “क्षितिज” के उस पार पहोंच पाउं?????

“क्षितिज” के उस पार पहोंच ना नामुमकीन है ये तो सभी जानते हैं

……पर मेरी दुनिया अचानक इस तरहाँ बदल जाएगी मुझे ये तो मालुम ही नहिं था!!!! क्योंकि लगातार हर रोज़ एक पोस्ट लिखनेवाली मैं “मेरी आवाज़ सूनो” को कहाँ छोड आई?

जी हाँ मैं “क्षितिज” के उस पार अपनी निगाहों को ढूंढते ढूंढते “ क्षितिज” के “इस पार” पहोंच गई!!!!!! कैसे??????

जाना तो तय था ही मेरा। अपने वतन से दूर, अपने घर से दूर, अडोसी-पडोसी से दूर जा रही थी मैं।

ख़ासकर “जागरण जंकशन” तो मेरे जीवन का एक सदस्य बन चूका था।

तभी मेरा जाना बडा ही दर्द भरा लगने लगा। और “क्षितिज” के इस पार ना तो कोई संदेशव्यव्हार था ना तो इंटरनेट कि सुविधा!!!!!

मेरा पहला क़दम वो बडे गेट पर आकर रुक गया।

कहाँ से आयेहो? पहला सवाल!!!

जी! मैं यहां पेटलाद से आई हुं। मेरा जवाब।

किससे मिलना है? दुसरा सवाल।

मैं अपना ओर्डर लेकर आईहुं मुझे आज यहाँ डीस्पेंसरी में अपनी जोब के लिये रीपोर्टींग करना है। मेरा जवाब।

”ठीक है आईये मेडम।

मैं अंदर दाखिल हुई। रीपोर्टींग करके मुझे अपनी सीट तक जाने के लिये एक छोटा किवाड पार करना था। अंदर जाते ही एक बडा मैदान और बगीचा नज़र आया जहाँ बिल्कुल सफ़ेद कपडे पहने कुछ लोग काम कर रहेथे। मुझे अजनबी समझकर देखने लगे पता नहिं मेरे बारे में क्या सोच रहेथे?

मेरे साथ एक कोंस्टेबल आया मेरी जगह तक पहोंचाने के लिये।

कुछ दूरी पर ही एक “बडा-सा” दरवाज़ा था। उसपर बडे अक्षरों से लिखा था “स्त्री विभाग”

बाहर गेट पर बैठे सफेद कपडेवाले बूढे बाबा ने एक मोटी-सी रस्सी ख़ींची।

ट्न…ट्न… ज़ोर से अंदर बेल बजने की आवाज़ आई।

थोडी ही देर में किसी की आहट सुनाई दी । शायद कोई ये बडे दरवाज़े को ख़ोल रहा था।

सफ़ेद ख़ादी की साडी पहनी एक अधेड महिला ने मुझे औपचारिक तौर पर “नमस्ते”का इशारा किया।

….और मैं “अंदर” पहुंच गई।

“क्षितिज” के इस पार………

इसके आगे इंतेज़ार करना कल फ़िर वापस आउंगी “क्षितिज” के इस पार कि कहानी/वास्तविकता के साथ………..

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