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फ़तवा...फ़तवा..फ़तवा

Posted On: 12 May, 2010 Others में

मेरी आवाज सुनोमेरी आवाज़ ही पहचान है॥

razia mirza listenme

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fअब बस। बहोत हो चूका ।

किसी बात की हद होती है। हद से आगे तो फ़िर हद हो जाती है।

नाम बदनाम कर दिया है आप लोगों ने इस्लाम का।

फ़तवा..फ़तवा..फ़तवा

आप  लोगों पर ही फ़तवा जारी कर देना चाहिये।

अभी तक सब चूप्पी मारे बैठे रहे अभी तो आप लोग सर चढकर फ़तवे निकाल रहे हो उलजलुल किसम के।

क्यों फ़तवे के नाम को बदनाम करने पर तुले हो?

फ़तवा इस्लाम में एक धार्मिक किसी मान्यता प्राप्त प्राधिकारी द्वारा जारी निर्देश के लिए इस्तेमाल किया जाता है.    फतवा जारी करने का  ज्ञान अनुभव  है आपमें?

क्यों अपने मज़हब के साथ साथ अपने देश को भी 1800 की सदी की तरफ़ ढकेल रहे हो?

औरतों का मर्द लोगों के साथ काम करना हराम है ये भला कैसी बात हुई?

हम से तो वो मुस्लिम बहुमती वाले देश आगे हैं जहाँ की जनता बेनज़ीर भुट्टॉ को प्रधानमंत्री कि सीट पर बैठाती है या  बांग्लादेश में शेख हसीना जैसी महिलाओं को देश के सर्वोच्च स्थान

पर ले आते हैं। आप बताइये आप वहां के लोगों पर फतवा जारी क्यों नहिं करते?

सिर्फ भारत की महिलाओं पर ही आपके ये तालिबानी फ़तवे क्यों?

इल्म की रोशनी से ही घर व समाज को रोशन किया जा सकता है। तालीम व सच्चाई से ही कामयाबी हासिल की जा सकती है।

आज बेटीओं को इल्म की सबसे ज्यादा अहमियत है।

अब तो हँसी आती है और तरस भी आता है आप लोगों पर क्योंकि आपकी कोई सुनता ही नहिं है।

और क्यों सुने? क्या आप आकर इन सब के घरों में अनाज डाल जाते हो सालभर का या फिर आप आकर बच्चों  कि फ़ीस भर जाते हो? या फ़िर आप लोग किसी मरीज की

दवाई काख़र्च उठाते हो?

क्यों सुने आपके कोई फ़तवो6 को जो फ़तवे के नाम को बदनाम करते हैं।

अगत फतवा देना ही है तो पहले अपने आप से ही शुरुआत करो। अपने घरों में झांककर देखो कि कहीं तुम ” फ़तवों” के पैसों से तो नहिं जी रहे हो? बेटीयों पर ही फतवे क्यों?

हराम क्या हलाल क्या ख़ुद अपने में झांककर देखो।

मुझे अच्छी तरहां याद है कि सरकारी काम से मुझे ” मक्का शरीफ’ जाने का मौका मिला। मैं दिल्ही में जामा मस्जीद के पास लगे शामियाने में अपने शौहर  और भाई के साथ

:अहेराम;( उमराह-हज के दौरान सर पर बाधने का लेने दुकान पर गइ। दो तीन दुकानो6 पर जवान लडके बैठे थे और एक दुकान दार चाचा ज़ईफ थे। मैने सोचा कि चलो

बेचारे बूठे बाबा के पास से ही कुछ खरीदारी करलुं।

मैने अपने हिसाब से कपडा मांगा। बाबा कपदा कातते हुए मेरे शौहर को देखकर बोले” आप नहिं जा रहे हो मक्का?”

मेरे शौहर  बोले ये तो सर्विस पर जा रही है “। तभी दुकान वाले बाबा बोले अरे ये तो हराम है।

अभी बगल में ख़डा मेरा भाई बोला कि “चाचा आपने जो कपडा हमें दिया उसे ज़रा फ़िर से नाप लो क्योंकि आपने हमें छोटा टुकडा दिया है ये हराम नहिं क्या?

ये बात ईसलिये लिख रही हुं कि वो अपने मतलब से हराम-हलाल तय करते हैं । अगर मेरे शौहर ने कुछ ख़रीद लिया होता तो हराम -हलाल का सवाल ही नहिं होता।

और ऐसी ही लोग फतवे जारी करते हैं जो उनकी समझ से परे हैं।

मैं भी एक नौकरी पेशा महिला हुं।  मेरी “माँ” ने अनपढ होते हुए हमें बहेतर तालिम दी है जो आज मै ऐसी जगह पर हुं।

वो भी बडी नमाज़ी रोजदार औरत थी। पर उसे पता था कि लडकी की पढाई क्या मायने रखती है।

अपनी इज़्जत को बरकरार रखकर अपने घरगृहस्थी को संभालकर अगर कोई महिला काम करती है तो आप लोगों को आपत्ती क्यों?

मै एक भारतीय मुस्लिम महिला होने के नाते ऐसे  फ़तवों का बहिष्कार करती हुं।

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