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लाकडाउन की चुनौतियां

Posted On: 27 Apr, 2020 Politics में

loksangharshaजनसंघर्ष को समर्पित

loksangharsha

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नये लाकडाउन का यह दौर मजदूरों, प्रवासी मजदूरों, गरीबों, किसानों, छोटे व्यापारियों, लघु उद्यमियों, वरिष्ठ नागरिकों और बीमारों के लिये और अधिक कठिनाइयों भरा रहने वाला है। प्रवासी मजदूरों को घर पहुंचाने की व्यवस्था कर दी गयी होती तो न तो  उन प्रवासी मजदूरों की कठिनाइयाँ बढ़तीं न उस राज्य की जहां वे लगभग एक माह से कोरोंटाइन जैसी स्थिति में कैद हैं। उनको लाकडाउन से पहले उनके घरों तक पहुंचा कर 14 दिन तक कोरोंटाइन में रखना मौजूदा व्यवस्था से सस्ता और सुविधाजनक होता। पर तब सरकार चूक गयी और नतीजा सभी के सामने है।

 

 

दूसरे राज्यों में फंसे प्रवासी मजदूर दोहरी समस्याएँ झेल रहे हैं। उनमें से अनेक फुटकर मजदूर हैं जो लाकड़ाऊन से पहले ही काम से हाथ धो बैठे थे। छोटे बड़े उद्योगों में कार्यरत मजदूरों को काम पर से हटा दिया गया है और उन्हें भुगतान तक नहीं किया। मोदीजी बड़े भोलेपन से बार बार अपील कर रहे हैं कि मजदूरों को काम पर से हटाया न जाये और उन्हें उनके वेतन का भुगतान किया जाये। पर जो उद्योगपति सामान्यकाल में मजदूरों को काम का पूरा मेहनताना नहीं देते वे भला बिना काम के मजदूरों का भुगतान करेंगे यह एक कोरी कल्पना मात्र है। छोटे व्यापारी और उद्यमी तो उन्हें भुगतान करने की स्थिति में भी नहीं हैं।

 

 

 

मजदूरों पर जो धनराशि थी वो अब पूरी तरह खर्च होचुकी है।स्थानीय मजदूर और किसान भी संकट में हैं। हर तरह के रोजगार समाप्त होगए हैं। मनरेगा का काम भी ठप पड़ा है। अलबत्ता फसल की कटाई चालू है जिससे ग्रामीण मजदूर और किसानों को कुछ राहत मिली है। परंतु सरकार के तमाम दाबों के बावजूद औसत गरीब परिवारों तक खाद्य पदार्थ पहुँच नहीं सके हैं। गोदामों में पर्याप्त अनाज भरे होने के दाबे अभावग्रस्तों को और भी मुंह चिढ़ा रहे हैं।मौजूदा सामाजिक व्यवस्था में अधिकांश सीनियर सिटीजन्स अकेले रहने को अभिशप्त हैं। उन्हें तमाम नसीहतें दी जारही हैं। लेकिन उनकी जरूरतों को पूरा करने को कोई सिस्टम तैयार नहीं किया गया। वे दवा, फल सब्जी और दूसरी जरूरत की चीजों को हासिल नहीं कर पारहे। उनमें से कई तो धनाभाव की पीड़ा झेल रहे हैं।

 

 

कोरोना के संक्रमितों की संख्या बढ़ने से लाक डाउन बढ़ाना आवश्यक था यह सभी समझ रहे थे। लेकिन इस फैसले को दो दिन पहले भी तो सुनाया जा सकता था। इससे अचानक घोषणा से फैली अफरा- तफरी से बचा जा सकता था। घोषणा से दिन दो दिन पहले राज्य सरकारों को भी बता दिया जाना चाहिए था। लेकिन सभी को दुविधा में रखा गया। इससे मुंबई और सूरत जैसी घटनाएँ सामने आयीं।। छोटे व्यापारियों, उद्यमियों और फुटकर व्यापार करने वालों को राहत की घोषणा कीजिये। नियंत्रित हालातों में उद्योग खुलवाने और प्रवासियों को घर पहुंचाने की व्यवस्था कीजिये।

 

अतएव समय की मांग है कि आप एक व्यापक और समग्र पैकेज की तत्काल घोषणा करें। सभी की मुफ्त जांच और इलाज की घोषणा कीजिये। मनरेगा सहित सभी कामकाजी लोगों को अग्रिम वेतन भुगतान कराइए और करिए। सभी को बीमा संरक्षण की व्यवस्था करिए। संगठित और असंगठित सभी क्षेत्रों के मजदूरों की नौकरियों और वेतनों की सुरक्षा करिए। सभी के लिये सभी जरूरी चीजें सार्वजनिक प्रणाली से मुफ्त उपलब्ध करने की व्यवस्था कीजिये। वरिष्ठ नागरिकों के लिये विशेष रक्षा दल गठित कीजिये। किसानों की फसलों की कटाई और फसल की सही कीमत दिलाने की गारंटी कीजिये।

 

 

मोदी जी खुद ही हर चीज की घोषणा करते हैं। अपने मंत्रिमंडल में भी शायद ही विचार करते हों। अचानक टीवी पर प्रकट होते हैं और एक लच्छेदार भाषण हमारे कानों में उंडेल दिया जाता है। पहले दो बार हमें तंत्र थमाये गये तो इस बार सात मंत्र। पर तंत्र- मंत्र से न पेट भरता है न इलाज होता है। कोरोना से लड़ाई देश के लोग मुस्तैदी से लड़ रहे हैं। पर उन्हें पर्याप्त भोजन, इलाज दवाएं जरूरी सामान और रहने की उचित व्यवस्था भी तो चाहिये। ये सब भाषण से नहीं मिलते। अच्छा होता आप एक समग्र राहत पैकेज के साथ सामने आते।

  1. मोदी सरकार ने विभिन्न श्रेणियों के गरीबों के लिये रु॰ 500 उनके खातों में डाल दिया। अनेक लोग खाता अथवा रजिस्ट्रेशन न होने के कारण इस लाभ से वंचित रह गये। लेकिन जिनके खातों में पैसा आया वे अपनी जरूरतों को पूरा करने को पैसा निकालने को बैंकों और जनसेवा केन्द्रों लाइनों में खड़े होगए। शारीरिक दूरी बनाए रखने की धज्जियां तो बिखर ही गईं, अनेक जगह उन्हें पुलिस की लाठियां तक खानी पड़ीं। अनेक जगह संघ के कार्यकर्ताओं की लाठियाँ भी गरीबों पर बरसीं। इस धन को डाक विभाग के माध्यम से घर घर भिजवाने का विकल्प सरकार को सूझा ही नहीं।
  2. कोरोना से निपटने में जांच और चिकित्सा संबंधी उपकरणों की कमी की खबरें सुनने के हम अब आदी हो चले हैं। लेकिन दूसरे मरीजों की दुर्दशा की खबरें दिल दहलाने वाली हैं। गंभीर रूप से बीमारों को अस्पताल तक लाने को एंबुलेंस नहीं मिल पारही हैं। हताश परिजन गंभीर मरीजों यहाँ तक कि प्रसव पीडिताओं को ठेले, साइकिल अथवा कंधे पर लाद कर ला रहे हैं। टीवी, ह्रदय, किडनी आदि के गंभीर मरीज दवा और इलाज के अभाव में जीवन से हाथ धो रहे हैं। घर तक दवा पहुंचाने और टेलीफोन पर दवा पूछने के दाबे भी हवा हवाई साबित होरहे हैं।  निजी अस्पताल और नर्सिंग होम जो आम दिनों में मरीजों की खाल तक खींच लेते हैं, शटर गिरा कर भूमिगत होगये। सरकार ने निजी चिकित्सकों और उनके अस्पतालों से इस आपात्काल में सेवायेँ लेने का कोई प्रयास नहीं किया।
  3. अधिकांश प्रवासी मजदूरों को खाने योग्य और भरपूर खाना नहीं मिल पारहा। अधिकतर जगह यह एक पहर ही मिल पारहा है। हर राज्य वहां प्रचलित खाने के पैकेट सप्लाई कर रहे हैं जिसे वे लगातार खाने से ऊब गये हैं। वे दाल, आटा, आलू, चावल की मांग कर रहे हैं ताकि अपना भोजन खुद पका सकें। उनके रहने, नहाने- धोने की भी उचित व्यवस्था नहीं है।   इसके अलाबा दूर दराज गांव, शहर, कस्बों में रह रहे उनके परिवार भी संकट में आगए हैं। परदेश में बेरोजगार बने ये मजदूर अपने घरों को वह धन नहीं भेज पारहे। उन्हें उम्मीद थी कि 14 अप्रेल को लाकडाउन खुल जायेगा और वे घर जाकर फसल की कटाई करके कुछ कमाई कर लेंगे। लेकिन उनकी यह चाहत भी पूरी नहीं होसकी।
  4. अब एक बार फिर सरकार ने एक और बड़ी चूक की है। सरकार ने रेलवे का आरक्षण खोल दिये। लगातार इस आशय की खबरें मीडिया में आती रहीं कि 15 अप्रेल से रेल, बस और हवाई सेवाओं के चालू होने की पूरी तैयारी है। अतएव तमाम प्रवासी मजदूरों ने घर पहुँचने के लिये टिकिटें आरक्षित करा लीं। मुंबई में तो वे स्टेशनों पर पहुँच गये और शारीरिक दूरी का उल्लंघन हुआ। रेलवे ने टिकिटें क्यों बुक कीं इसकी जबावदेही सरकार की है। लाकडाउन खुलने के आभास से मुंबई में तमाम मजदूरों ने घर आने को सामूहिक रूप से बसें तक तय कर ली थीं।
  5. केन्द्र और राज्य सरकारों की आधी अधूरी तैयारियों और युद्धदकाल सरीखे मनमाने फैसलों से अनेक कठिनाइयाँ पैदा होरही हैं जिसका सारा खामियाजा आम जनता और कोरोना से जूझ रहे सेवकों को भुगतना पड़ रहा है। लेकिन अब लाकडाउन-2 से यह सब असहनीय स्थिति में पहुँच चुका है। इन कठिनाइयों से जनता को उबारने के लिये तत्काल आवश्यक कदम उठाने की जरूरत है।

 

 

 

 

नोट : ये लेखक के निजी विचार हैं और इसके लिए वह स्वयं उत्तरदायी हैं।

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