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उनकी धर्मनिरपेक्षता का गंगा में विसर्जन

Posted On: 17 May, 2014 Others में

सर-ए-राहजैसा देखा-सुना

madan mohan singh,jagran

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धर्मनिरपेक्षता! यही एक ऐसा चक्रव्यूह था, जिसे पूरे देश में नरेंद्र मोदी को घेरने के लिए रचा जा रहा था। लेकिन मोदी अभिमन्यु नहीं, अर्जुन साबित हुए। बंगाल और तमिलनाडु को दरकिनार कर दिया जाए तो आज इस चक्रव्यूह का चातुर्दिक ध्वअस्तीकरण हुआ है। सोनिया, राहुल, मुलायम, मायावती और नीतीश जैसे महारथी धराशायी हैं। पूरे चुनाव अभियान के दौरान मुलायम और मायावती यही दुहाई देते रहे कि सांप्रदायिक शक्तियों को रोकना होगा। डराते रहे कि अगर मुस्लिम वोटों का बिखराव हुआ तो देश भर में दंगे होंगे। सोनिया भी समाज में सांप्रदायिकता के जहर का खतरा दिखाती रहीं। लेकिन चुनाव नतीजों की आंधी में सब हवा हो गए। इसके साथ ही एक सवाल भी उठा- क्या है सांप्रदायिकता। क्या है धर्मनिरपेक्षता। अगर गैर भाजपाई जिसे धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता बताते हैं, वह सही होता तो आज का जनादेश गलत है। लेकिन अगर जनादेश सही है, पूरे देश का फैसला सही है तो जाहिर है कि गैर भाजपाइयों द्वारा परिभाषित धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिक कतई खारिज। आलम यह है कि 100 का आंकड़ा छूने की दौड़ में भी सोनिया और राहुल मुंह के बल हैं।
मुलायम, मायावती और नीतीश को दहाई का आंकड़ा छूने के लिए तरसा दिया है। इसके साथ ही तथाकथित धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता को पूरे देश ने नरेंद्र मोदी की अगुवाई में काशी किनारे गंगा में विसर्जित कर दिया है। जातीय राजनीति का दौर भी अलविदा कहता नजर आ रहा है। इसे अच्छे दिन आने वाले हैं का संकेत कह सकते हैं। बाकी तो मोदी मैजिक सत्ता-शासन की कसौटी पर कितना खरा उतरता है, यह आने वाले सौ दिन बताएंगे।

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