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पकौड़ा पॉलिटिक्‍स

Posted On: 12 Feb, 2018 Others में

सर-ए-राहजैसा देखा-सुना

madan mohan singh,jagran

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बड़ी मुश्किल है। गरीब की हर चीज हाईजैक हो जा रही है। कभी रोटी पर नमक तेल लपेटकर खाते थे। आज वह रोल की शक्ल में मार्केट पर काबिज हो गया। फारा-गोझा भी मोमो बनकर छा गया है। हर गली-नुक्कड़ पर एक रुपये में भी सुलभ हो जाने वाला पकौड़ा भी अब जाने की राह पर है। इसको डायन सियासत की नजर लग गई है। जैसे कौवा कांव-कांव करता है, उसी तरह इन दिनों जिधर देखो नेतवे सब पकौड़ा-पकौड़ा की बांग लगा रहे हैं। और तो और, जहां-तहां दुकान लगाकर मुफ्त में मिल-बांटकर खा ले रहे हैं, बगल वाले की दुकानदारी चौपट कर रहे हैं।


इन सोशल गब्बरुओं, पॉलीटिकल जबरूओं की जिसको नजर लग जाती है, वो गरीब की नजर से दूर जाता है। प्याज-टमाटर महंगा देते हैं, अब पकौड़ा भी महंगा जाएगा। वो दिन दूर नहीं जब पकौड़े को भी ब्रांड नेम मिल जाएगा-भाजपा का पकौड़ा, कांग्रेस का पकौड़ा या फिर सपा का पकौड़ा। वो दिन भी दूर नहीं, जब अंबानी-अडानी भी खास किस्म के पकौड़े लांच कर दें। बरसात के मौसम के लिए खास पकौड़ा, रमजान के इफ्तार के लिए खास पकौड़ा। ठिठुराती सर्दी के लिए खास पकौड़ा। चखने के लिए बेमिशाल क्रिस्पी-क्रंची पकौड़ा। ऑयल फ्री पकौड़ा, लो-फैट वाला पकौड़ा। इटैलियन डिश फ्रिटो मिस्टो जैसा पकौड़ा, इस तरह पकौड़ा हो जाएगा मल्टीनेशलन प्रोडक्ट।


बाजार के नुक्कड़ से लगते पाकड़ के पेड़ के नीचे खौलती कड़ाही के आगे बैठे छब्बन हलवाई कल तेल से ज्यादा नजर गरम नजर आ रहे थे। कह रहे थे-‘जी में आ रहा है कि पकौड़ा छान रहे नेताओं की पीठ पर गरम छनौटे से चुनाव निशान बना दूं। ‘दरअसल, छब्बन की चिंता दूसरी है। अगर पकौड़े का बाजारीकरण हो गया तो पता नहीं कब वित्त मंत्री जी को भी आमदनी की एक अलग राह नजर आने लगे और वो इसपर भी जीएसटी न लगा दें।


मगर किसान इस बात को लेकर खुश हैं कि अगर पकौड़ा बाजार पकड़ जाए तो शायद आलू-प्याज और हरी सब्जियों के उपज की कीमत पर कुछ चटनी चढ़ जाए। कुल मिलाकर समाज का हर तबका पकौड़े की उछाल पर उछल रहा है। बनाने, बेंचने से लेकर खाने, पकौड़ा-पकौड़ा का सियासी सुर अलापने वाला तक अपने-अपने एंगल से ट्विस्ट तलाश रहा है। इसे ऐसे भी कह सकते हैं, जिस तरह घूरे के भी दिन बहुरते हैं, उस तरह पकौड़े के दिन भी बहुरने वाले हैं और यह ख्‍याल गालिबन दिल को बहलाने के लिए अच्‍छा है।

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