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बड़े वसूक से ये सियासतदां फरेब करते हैं...

Posted On: 5 Feb, 2017 Others में

सर-ए-राहजैसा देखा-सुना

madan mohan singh,jagran

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clip1‘बड़े वसूक से दुनिया फरेब करती है, बड़े खुलूस से हम एतबार करते हैंÓ-है तो ये गुलाम अली साहब की गाई एक गज़ल की लाइन। लेकिन सौ फीसद मौजू है मौजूदा सियासत पर। दिल्ली की सत्ता तक पहुंचाने में सबसे बड़ा किरदार निभाने वाला अपना सूबा इनदिनों विधानसभा चुनाव के दौर से गुजर रहा है। इसके साथ ही फिर हवा में तामीर किए जा रहे हैं बेहिसाब वादों-इरादों के पिरामिड। ये मिस्र के पिरामिड से तनिक भी कमतर अजूबा नहीं है। ये कब तक कायम रहेंगे या कब अचानक काफूर हो जाएंगे, कहा नहीं जा सकता। पिछले दिनों एक पार्टी के घोषणा पत्र का एलान हुआ। बोतल में बंद जिन्न की तरह राम मंदिर के निर्माण का सशर्त वादा भक्क से बाहर आ गया। यह वादा सालों से गूंजता और गुम होता रहा है। इससे बड़े-बड़े कद्दावर नाम जुड़ते-पल्ला झाड़ते रहे हैं। वादा करने वाले वातानुकूलित हवेलियों में खुद को महफूज किए हुए हैं। लेकिन हमारे रामजी को गरमी-सर्दी और बरसात टेंट में गुजारनी पड़ती है। आलम यह है कि टेंट कहीं से दरक-चटक जाए तो बदलने के लिए कागजी घोड़े दौड़ाए जाते हैं। हफ्तों लगते हैं तब कहीं सुनवाई होती है। इस हालात पर आप सिर्फ इतना ही कह सकते हैं…हे राम।
अभी-अभी एक बबुआ का उदय हुआ है। अपने पिताजी के जूते को फाड़कर निकला इनका कदम दनादन सुर्खियां बटोरे हुए हैं। यह मेधावियों को स्मार्टफोने देने की बात तो करते हैं। लेकिन मेधावी पैदा करने वाले स्कूल और अध्यापकों की बात नहीं करते। एयर एंबुलेंस की बात करते हैं। लेकिन बुनियादी अस्पतालों की बात नहीं करते, जहां गांव-गिराव की गरीब, किसान-मजदूर मर्ज-दर्द दूर करता। इनकी नजर में सिर्फ एक ही समुदाय की हक तल्फी हुई है, होती है या हमेशा से होती रही है। कैराना इन्हें लेंस लगाने के बाद भी नजर नहीं आता।
दलितों-पिछड़ों का मुहाफिज होने का रट्टा मारते-मारते अरबों-खरबों के ढेर पर जा बैठने वाले भी पुरानी राह पर है। आरक्षण इनके लिए तुरुप का पत्ता है। लोगों का डराया जा रहा है….’अगर वो सत्ता में आ गए तो गरीबों-पिछड़ों का आरक्षण खत्म हो जाएगा।Ó इसके साथ सवर्णों के सामने चारा भी फेंका है-हम आए तो सवर्णों में गरीबों को भी मिलेगा आरक्षण। किसानों के एक लाख तक के कर्जं माफी का जुमला भी उछला जा रहा है। किसान कैसे अपना कर्ज चुकता करने लायक बनेगा, इसकी सोचना इनके वश में नहीं। इनके लिए फायदेमंद भी नहीं। किसानों के कर्ज की माफ रकम किसके सिर पर पहाड़ बनकर टूटेगी, इससे इनका कोई लेना-देना नहीं। किसानों को अफीमची की तरह ‘ऋण लेकर घीÓ पीने का आदी बनाते रहेंगे।
सबसे ज्यादा दिनों तक देश में सत्ता की बागडोर संभालने वाले अब जाकर गरीबी भगाने और विकास की बातें करेंगे तो हंसी आना लाजिमी है। ….बहरहाल, बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी, इसलिए बहुत ज्यादा लिखना। आप ज्यादा समझदार हैं। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि इस सियासी हमाम में तमाम छोटे-बड़े ऐसे हैं, जो वादे फेंके-झोंके जा रहे हैं। लेकिन इन वादों का क्या होगा….या ‘वादें हैं वादों क्याÓ की राह पर नामुराद हो जाएंगे। फिर भी एक आम आदमी रूप में यही कहूंगा-बड़े वसूक (आत्मविश्वास) से ये सियासतदां फरेब करतें है, बड़े खुलूस (साफदिली) से हम आम आदमी एतबार करते हैं। वोट तो देने जाएंगे ही, इन्हीं में से किसी एक को।
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